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तीर्थ में गंदगी दर्शन

विवेक सक्सेना
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इतने दिनों के अपने निजी अनुभवों के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि स्वच्छता ओर हम भारतीयों के बीच 36 का आंकड़ा है। नरेंद्र मोदी सरीखे नेता तो दूर रहे अगर खुद हनुमानजी भारत में आकर लोगों से सफाई करने का अनुरोध करें तो भी जनता खासतौर से उनके भक्त उनकी हंसी ही उड़ाएंगे। 

हाल ही में पत्नी के अनुरोध पर दशकों बाद वृंदावन गया। पहले भी लिख चुका हूं कि एक बार राजस्थान के बाबाजी मंदिर में गंदगी और धक्का-मुक्की का सामना करने के बाद कसम खाई थी कि भविष्य में कभी किसी मंदिर मं नहीं जाऊंगा। वहां इतनी ज्यादा मनमानी थी कि भगवान को चढ़ाने के लिए ले गया राशि भी नहीं चढ़ा पाया और दिल्ली आकर उसे जानवरों की देखभाल करने वाले एनजीओ संस्थान को दान में दे दिया। चूंकि इतनी लंबी दूरी पर पत्नी को अकेले भेजना ठीक नहीं समझ और वहां जाने का रास्ता भी काफी अच्छी था इसलिए इस मंदिर चला गया। 

पूरी हाईवे बहुत अच्छी है मगर सड़क से मंदिर तक जाने का रास्ता बेहद खराब व टूटा-फूटा है। उसे देख कर वहां लगता है कि जानी-मानी अभिनेत्री हेमामालिनी के चुनाव क्षेत्र में आने वाले वृंदावन में कोई नगर पालिका तो यह कैसी? वहां किसी ने नरक पालिका भी कहा है। रास्ते से ही पंडे घेरना शुरू कर देते हैं। मंदिर के अंदर लिखा हुआ है कि भगवान के सामने सिर्फ  दर्शनार्थी, उनके परिवार के लोग जैसे नाती, पोता, चेवता आदि ही अंदर जाकर दर्शन कर सकते हैं। बाकी सबको काफी दूर से दर्शन करने के लिए अपनी आंख को कैमरे का लेंस बनाना पड़ता है। 

मगर एक परिचित पुजारी ने अंदर जाकर दर्शन करवाने का भरोसा दिलाया। हालांकि पता नहीं क्यों मेरे मन में भगवान श्रीकृष्ण को लेकर श्रद्धा नहीं आती है। मुझे वे लालू यादव व मुलायम सिंह यादव के परिवार के सदस्य लगने लगते हैं। वह कुछ सीढि़या चढ़ कर मुझे मुख्य मूर्ति में कमरे के बाहर तक ले गया और मत्था टिकवाने के बाद कहने लगा कि बाहर लाइन में लग कर दर्शन कर लो। कुछ देर बाद धक्के खाने के बाद मैं नीचे आ गया और उसने मुस्कुराते हुए पत्नी से कहा कि मैंने साहब को क्या गजब के दर्शन करवाए हैं। 

अब मैं सच्चाई बता कर उनका मूड़ क्यों ऑफ करता क्योंकि उन्हें लगता कि दर्शन आधे-अधूरे हैं। खैर उसकी फीस देने के बाद बाहर निकला तो पतली सड़को की गलियो वाले वृदांवन के इलाके में दोनों और भिखारी बैठे रहते हैं। उन्हें पैसे या केले दान में देने पड़ते हैं। 

एक बुजुर्ग भिखारी ने मुझसे अपना चश्मा जेब में रखने की हिदायत देते हुए कहा कि यहां बंदर बहुत परेशान करते हैं। मैंने उसकी इस सलाह की कीमत चुकाई और आगे बढ़कर राधाजी के मंदिर में चला गया। वहां हर दूसरा आदमी झांकी पर टीका लगाकर अपनी टिप मांग रहा था। राधा मंदिर के परिसर में मैंने बड़ी अजीब चीज देखी क्योंकि एक कमरे के बाहर बोर्ड लगा था कि यहा अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर का कमरा है। जाहिर था कि मंदिर को लेकर विवाद चल रहा होगा। 

वहां मौजूद पुजारी ने इस बारे में कोई भी जानकारी देने से मना कर दिया। तब तक भूख लग चुकी थी। सारा रास्ता बेहद गंदा व बदबू भरा था। जगह-जगह पतल, गोबर पड़ा हुआ था। ऐसा लग रहा था कि जैसे वहां रहने वाली गायो को पेट खराब हो व उन्हें पेचिश हो गई है। रास्ते में जितने भी रेस्टोरेंट मिले सबके बाहर नाली बह रही थी व कलकल कर बहती इस नाली से दुर्गंध सब और व्याप्त थी। दुकान में बैठे या उसके बाहर खड़े लोग मजे से समोसे, कचौड़ी खा रहे थे।

सिल्ली से बर्फ तोड़ कर सीधे लस्सी में डाली जा रही थी। वहां खाना तो दूर रहा खड़ा होना तक दूभर था फिर भी डायबिटीज का मरीज होने के कारण एक गिलास लस्सी पी ली। तब लगा कि हमारे धार्मिक स्थानों का भगवान ही मालिक है क्योंकि उनकी स्वच्छता को लेकर कोई चिंतित नहीं है। प्रसाद की दुकानों पर 200 रुपए से लेकर 350 रुपए किलो तक पेड़े मिल रहे थे। 

कहने की जरूरत नहीं कि सस्ते पेड़ो में मैदा मिलाई गई होगी। लोग रास्ता चलते खड़े-खड़े थूक रहे थे। रास्ते में कुछ लोग नंगे पैर ही टहल रहे थे। पता चला कि बाहर से आए वे लोग परिक्रमा कर रहे हैं। उन्हें देखकर लगा कि नरेंद्र मोदी की जीत की असली वजह गरीबी और धार्मिकता से सीधा संबंध होना है। जो जितना गरीब होगा व उतना ही धार्मिक होगा और वहीं मंदिर, मस्जिद व वोटो के फेर में पड़ेगा। वहां जब एक दुकानदार से गंदगी व दुर्दशा के बारे में बात की तो उसने कहा कि वृंदावन में ज्यादातर ब्राह्मणों व बनियो की भरमार है जिनको व्यवस्था की जगह धर्म से प्यार है। उसने बताया कि जो एक ठीक-सी सड़क थी उसे भी मायावती सरकार ने बनवाया है। 

उसने कहा कि यहां उम्मीदवार जनता के नहीं भगवान भरोसे जीतते हैं। यहां की जनसंख्या 50 हजार व मतदाता 55 हजार है। वहां के हालात देखकर समझ नहीं पा रहा था कि इसे क्या कहूं। तभी एक परिचित ने कुछ ऐसी बात सुनाई कि अपने देश की इस विचित्र हालात को देखकर मैं और ज्यादा असमंजस में पड़ गया। उन्होंने कहा कि पिछले दिनों विदेश से उनका पांच वर्षीय पोता आया तो यहां के हालात देखकर चहकने लगा। उसने जब यहां सड़कों पर कुत्तो, गायो को घूमते देखा तो उसे लगा कि मानों जूरासिक पार्क में घूम रहा है। उसके लिए वह सब यही था जैसे हमारे लिए सड़को पर शेर, चिते आदि को विचरते देखना। उल्टे जाने के पहले कहा कि मैं अपनी एक इच्छा और पूरी करता चाहता हूं। दीवार पर खड़े होकर पेशाब करने का मजा लेना चाहता हूं। यह सुख व मजा मुझे विदेश में नहीं मिलेगा।

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