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न अखबार, न पोस्टर, न नारेबाजी!

विवेक सक्सेना
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आजकल मौसम हल्का सा बदलने लगा है। जब घूमने जाता हूं तो अंतर महसूस होता है। अब पहले के जैसी कंपंकपी, गलन महसूस नहीं होती है। हालांकि तापमान अब भी सात डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास रहता है। पिछले दिनों तो दिल्ली तक में इतना तापमान चला गया था। मगर यहां बारिश बहुत होती है। अतः रोज घूमने नहीं जा पाता हूं। सुबह उठने के बाद करीब दो ढाई किलोमीटर टहलता हूं। रविवार को छुट्टी वाले दिन लोग अपनी गैराज खोलकर गाड़ी साफ करते नजर आते हैं। 

मौसम के साथ-साथ पेड़-पौधे में भी बदलाव आ रहा है। यहां ज्यादातर चारों और देवदार के पेड़ लगे हैं जोकि 30 से 300 फीट तक ऊंचे होते हैं। कुछ पेड़ तो 10 फुट व्यास तक के हैं। इनका जीवन काफी लंबा 50 से 1000 साल तक होता है। इससे तारपीन का तेल निकलता है और इसकी लकड़ी काफी मजबूत व मुलायम होती है। अतः इसका उपयोग घर व फर्नीचर बनाने में किया जाता है। स्काटलैंड के जीव वैज्ञानिक डगलग सरकार ने 1700 में इसकी खोज की थी। तब से इसे डगलस फर कहा जाने लगा है। हालांकि इसमें फर जेसी कोई चीज नहीं होती है। आपसी बोलचाल की भाषा में इसे क्रिसमस ट्री कह सकते हैं। 

यहां भी चारों मौसम होते हैं मगर बारिश बहुत ज्यादा होती है। अतः पेड़ों से गिरने वाली पत्तियां पानी से सड कर अच्छी खाद में बदल जाती है। यहां लगे देवदार के सारे पेड़ हरे-भरे हैं जबकि कुछ पेड़ 10 से 30 फीट तक ऊंचे हैं। जोकि पतझड़ का शिकार हो चुके हैं। उनके पत्ते गिर चुके हैं। 

वैसे यहां बसंत नवंबर-दिसंबर से शुरू हो जाता है और मार्च तक चलता हे। बसंत को आप सर्दी की समाप्ति का संकेत मान सकते हैं। जबकि मधुमास को गर्मी की शुरुआत माना जाता है। दोनों ही समय तापमान काफी अच्छा रहता है। पेड़ो पर नई कोयलें व कलियां आने लगी है तभी छोटे पेड़ व झाडि़यां लाल, पीले, सफेद, मोतियों जैसे फलों से लदी हैं और काफी सुंदर लगती है। हर तरफ देवदार के पेड़ छटा बिखेर रहे हैं। 

कभी-कभार कुछ चिडि़या भी चहचहाती नजर आ जाती है। लगता है कि अगले आने वाले दिनों में मौसम और अच्छा हो जाएगा। हालांकि हवा काफी ठंडी रहती है। लोगों के घर के पेड़ों की चारदिवारी काफी सुंदर तरीके से काटी गई हैं। घर के लॉन भी बहुत सुंदर है। उनका बहुत अच्छे ढंग से रखरखाव किया जाता है। घास काफी अच्छी तरह से काटी जाती है।

यहां के घरों के बीच 10 नंबर का अंतर होता है और दो घरों के आमने-सामने की दूरी 50 से 100 फुट तक होती है। ताकि उनके बीच धूप हवा रोकने वाली कोई रूकावट पैदा न हो। उनके बीच की दूरी 10-20 फीट तक होती है। सभी घर एक मंजिले हैं व पहले तल पर मुख्यद्वार के साथ ही 2-3 गैराज तक होते है। घर के बाहर चारदिवारी जैसी कोई चीज नहीं होती है जिससे कि काफी खुला-खुला लगता है। 

वैसे यहां सबसे मुश्किल स्थिति बीमार पड़ने पर होती है। ईश्वर ना करे कि कोई बीमार पड़े। आमतौर पर कोई निजी चिकित्सक प्रेक्टिस करता नहीं मिलता। जो हैं उनकी फीस काफी महंगी है। बिना डाक्टर के लिखे केमिस्ट दवा नहीं देता है। डाक्टर की फीस बहुत महंगी हैं। दांतों व आंखों के डाक्टर बहुत मोटी रकम वसूल करते हैं। अपने नागरिकों को तो सरकारी अस्पतालों से दवा मिल जाती है मगर बाकी लोगों को बीमारी के लिए बीमा लेना पड़ता है। हम लोगों को भी यहां आने से पहले बीमारी की बीमा पॉलिसी लेनी पड़ी थी। 

यहां पर बीमा कंपनियों की पॉलिसी बीमार होने पर अस्पताल में भर्ती होने पर, नौकरी पर न जाने के कारण होने वाले हर्जाने की भी भरपाई करती है। जाहिर है कि उसका प्रीमियम काफी ज्यादा होता है। यहां के अस्पतालों मे वकीलों के विज्ञापनो की भरमार रहती है। उनकी एक खासियत यह है कि यहां इस बात का प्रावधान है कि वकील दावा राशि में से अपनी फीस ले सकते हैं जोकि कुल राशि के एक प्रतिशत मे होती है। 

हर अखबर में आपको गिल, संधू, सरीखे सरनेम वाले वकीलों के विज्ञापन देखने को मिल जाएंगे। मगर एक विकसित देश होने और पश्चिमी देश होने के बावजूद यहां ब्रिटिश कोलंबिया में गाडि़यों की बीमा करने वाली एक सरकारी कंपनी का एकाधिकार है। इसका नाम आईसीबीएम या इंश्योरेंस कंपनी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया है। यहां इस बात की अक्सर आलोचना भी होती रहती है कि वह मनमाना प्रीमियम वसूलती है। 

अगर आप घर बदलना चाहे तो आपको छोटी ट्रक किराए पर मिल जाती है जिनमें आपको खुद सामान लादकर ड्राइव करके ले जाना पड़ता है क्योंकि यहां उन पर काम करने वाले मजदूर बहुत मोटी रकम भाड़े के रूप में वसूलते हैं। पढ़े-लिखों का देश होने के बावजूद यहां आपको अखबार व पत्रिकाओं की दुकान नजर नहीं आएगी। मगर हां, बाजार में शराब व दूसरा सामान बेचने वाली दुकाने ज्यादा हैं। 

यों बड़ी तादाद में स्थानीय अखबार निकलते हैं और ज्यादातर के मालिक संपादक भारतीय हैं। ये अखबार काफी मौटे होते हैं व आमतौर पर बाजारों में लगे स्टैंड या सड़क के किनारे लैटरबॉक्स के साथ रखे स्टैंड में रखे मिल जाते हैं। इनमें ज्यादातर भारतीयों से संबंधित खबरें होती हैं। हर अखबार के अंदर एक फुट चौड़े आकार में छपे विज्ञापनों के विशेष पृष्ठ मिल जाएंगे। कुछ पत्रिकाएं भी छपती है जोकि ज्यादातर यहां रहने वाले भारतीयों व उनको प्रभावित करने वाली खबरों से भरी रहती हैं। 

कुछ मरने वाले बुजुर्ग भारतीयों के श्रृद्धांजलि संदेश भी छपे होते हैं। पूछने पर पता चला कि यहां के लोग अखबार पढ़ने में ज्यादा विश्वास नहीं करते हैं। न ही आपसी बातचीत में धर्म, जाति या राजनीति पर चर्चा करना चाहते हैं क्योंकि इससे झगड़ा होने का खतरा बना रहता है। स्थानीय अखबार मुफ्त में मिलते हैं। हालांकि कनाड़ा से कई बड़े अखबार भी निकलते हैं। पता चला कि लोग सेलफोन पर इंटरनेट के जरिए खबरें हासिल कर लेते हैं। 

यहां दीवारों या खंबों पर कहीं पोस्टर चिपके या नारेबाजी लिखे नहीं दिखती है। चुनाव में भी पोस्टर नहीं लगते हैं। लगता है कि यहां के लोगों को पत्र-पत्रिकाएं खरीदने का शौक व आदत हीं नहीं है। कयोंकि न सिर्फ पीस, आर्य-पूज, लिंक सरीखे सामुदायिक पेपर मुफ्त में बांटे जाते हैं बल्कि देसी टुडे सरीखी मैगजीन जोकि इंडिया टुडे की तरह रंगीन व बढि़या पेपर पर छपी होती है मुफ्त में बांटी जाती हैं। इनमें कनाड़ा में रहने वाले भारतीयों के बारे में इंटरव्यू व दूसरे समाचार छपे होते हैं। 

पता चला कि यहां प्रेस रीडर नामक एक एप है जिसके जरिए आप दुनिया भर के अखबारों तक ऑनलाइन पहुंच सकते हैं। इसमें हिंदी समेत भारतीय भाषाओं के 205 अखबार है। इसलिए लोग स्थानीय अखबारों को पढ़ना ज्यादा पसंद नहीं करते हैं। मगर मेरे जैसे लोग जिन्हें चाय के साथ अखबार पढ़ने की आदत हे उन्हें स्टाल जा कर अखबार लाना होता हैं।

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