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तो शुरू मेरी कनाडा डायरी

विवेक सक्सेना
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बहुत दिनो बाद महसूस किया कि उम्र बढ़ गई है और दिलो-दिमाग में बदलाव आना शुरू हो गया है। एक समय था जब कहीं भी जाने के लिए काफी उत्सुक रहता हैं। हर रोज उस दिन का इंतजार करते हुए रोमांच व उत्सुकता का अनुभव कटते हुए काटता था। मगर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। जब अगस्त में बेटा नौकरी के लिए कनाड़ा चला गया तो तभी से पत्नी वहां जाने के लिए दबाव जरूर बना रहीं थीं। मगर उसके लिए वीजा होना जरूरी था। मुझे सलाह दी गई कि कनाड़ा से पहले अमेरिका का वीजा लगवा लो क्योंकि एक बार वहां का वीजा मिल गया तो कोई दिक्कत नहीं होगी। 

अतः मैंने एक एजेंट की सहायता से आवेदन कर दिया। वजह यह थी कि न तो मुझे कंप्यूटर का इस्तेमाल करना आता है और न ही मैं इस बात से अनभिज्ञ था कि मुझे क्या जानकारी देनी है और क्या नहीं। खैर जब अमेरिकी दूतावास से इंटरव्यू का बुलावा आया तो चाणक्यपुरी स्थित दूतावास के बाहर सैकड़ो लोगों को फुटपाथ पर लाइन में खड़े देखा। वहां ट्रेफिक वाले लगातार घूमते रहते हैं और आसपास पार्किंग पर पूरी तरह से रोक है। वह तो अच्छा हुआ कि मैं ड्राइवर को साथ लाया था अतः उससे गाड़ी को कहीं दूर ले जाने को कहा। हम पति-पत्नी दोनों के पास सेल फोन थे ताकि इंटरव्यू होने के बाद ड्राइवर को बुलाने के लिए फोन कर सके। अंदर फोन ले जाना मना था। 

पत्नी ने देखा तो पता चला कि संयोग से वहां एक काउंटर बना हुआ है जहां 50 रुपए देकर आप अपना फोन जमा करवा सकते थे। हमने फोन जमा करवाए। एक बार में करीब 150 लोग बाहर से अंदर जाते थे। हम भी अंदर गए वहां सबको एक पंक्ति में दूतावास में बनी पीली लाइन के अंदर-अंदर जाना था। हम लोग एक बड़े हाल में बुलाए गए। हमारा इंटरव्यू होना था। हम लोग अपने साथ तीन साल का इनकम टैक्स रिटर्न व प्रापर्टी के कागज ले गए थे। अंदर जाने पर एक काउंटर पर हमारे पासपोर्ट जमा करवा कर कुछ देर बाद हमें वापस छोड़ दिया गया। 

वीजा एप्लीकेशन देने वालों में बड़ी संख्या में युवा थे जोकि पढ़ने या नौकरी करने की तलाश में वहां जाना चाहते थे। सब काफी पढ़े लिखे। आदत से मजबूर। मैं उनसे धीरे-धीरे बात करने लगा। कोई दूसरी बार वहां आया था तो कोई तीसरी बार। सबने बताया कि ये लोग आसानी से वीजा नहीं देते हैं। जब मेरा नंबर आया और मैं इंटरव्यू देने के लिए खिड़की पर पहुंचा तो वहां उस पार एक विदेशी महिला बैठी थी व बैंक के काउंटर की तरह उसके आगे बड़ा-सा शीशा लगा था। तभी मैने साथ वाले काउंटर पर बैठी महिला को यह पूछते हुए सुना कि आपने वीजा के लिए कितनी फीस दी थी। 

यह सुनकर मैं घबरा गया क्योंकि मेरा फार्म भरने वाले एजेंट ने कहा था कि इस बारे में इतना ही कहना कि किसी पारिवारिक मित्र ने फार्म भरा है। तब तक मैंने उसे एक तय राशि दी थी जिसमें उसकी व वीजा की राशि शामिल थी। यह सुनकर मैं घबरा गया। नंबर आने पर उसने मुझसे ही बात की जोकि लाउडस्पीकर के जरिए बाहर मुझे सुनाई पड़ती थी। उसने बाहर जाने की वजह पूछी तो मैंने कहा कि मैं पर्यटन के लिए जा रहा हूं। उसने पूछा कि अकेले जा रहे हो या ग्रुप में? मेरे द्वारा अकेले कहने पर उसने कंप्यूटर खोल लिया और पूछा कि मेरे घर का खर्च कैसे चलता है। मैंने कहा कि पत्नी की पेंशन है> उसने पासपोर्ट देखते हुए पूछा पहले ब्रिटेन किस लिए गए थे? मैंने जवाब दिया कि वहा की सरकार ने बुलाया था। वजह पूछने पर मैंने बताया कि मैंने बिन लादेन व उसके आतंकवाद पर 2000 में किताब लिखी थी। उसी सिलसिले में वहां की सरकार ने अपने खर्च पर मुझे वहां बुलवाया था। 

यह सुनते ही उसने मेरा पासपोर्ट एक ड्राअर में डाल दिए और मुझसे थैंक्स कहते हुए जाने को कहा। यह एक शुभ संकेत था क्योंकि एजेंट ने बता रखा था कि जिन लोगों को वीजा देना होता है उनका पासपोर्ट रख लिया जाता था। अन्यथा वह हाथों-हाथ वापस कर दिया जाता है। मतलब यह कि 10,000 रुपए प्रतिव्यक्ति की फीस ले लेने के बावजूद वीजा मिलने की कोई गारंटी नहीं होती है। उसने मुझसे न तो कोई कागज मांगा और न ही कुछ देखा। भगवान का नाम लेते हुए मैं बाहर आया। 

कुछ दिनों बाद पासपोर्ट आ गया जबकि कनाड़ा का वीजा मिलने में दो माह का समय लग गया। वहां खुद नहीं जाना पड़ता है और दी गई जानकारी के आधार पर वीजा मिल जाता है। वीजा मिलने पर टिकट करवाया। भारत से कनाड़ा के वेंकूवर की दूरी लगभग 14,000 किलोमीटर है और जो उड़ाने वहां जाती है उनमें से कुछ सीधी है व कुछ रूकती हुई जाती है। कुछ जापान में रूकती हैं व कुछ चीन में। 

मैंने सीधी उड़ान ली जोकि बिना रूके 14 घंटे लेती है। सबसे बड़ी समस्या मुझे यह हो रही थी कि सुबह मैं टायलेट कहां जाऊंगा। उसको लेकर काफी चिंतित था। हर रोज वहां जाने की बात सोच-सोच कर चिंतित रहता था। जब 16 तारीख को एयरपोर्ट पहुंचा तो काफी तनाव में था। संयोग से साथ ले जाने के लिए दो युवा पोर्टर मिल गए। उन्होंने सामान लादा और एयर कनाड़ा के काउंटर तक ले गए। सामान काफी ज्यादा 23-23 मिलो की दो अटैचियां व हवाईजाहज के केबिन में ले जाने के लिए दो बैग थे। 

उस दिन पता चला कि 23 किलो की अटैची कितनी भारी होती है। उनकी इस सेवा में मैं इतना खुश हो गया कि मैंने 600 रुपए की दिहाड़ी के अलावा उन्हें चाय पीने के लिए 200 रुपए और दे दिए क्योंकि बंगाल से नौकरी की तलाश में आए उन युवकों ने बताया था कि वे लोग पालम गांव में किराए पर मकान लेकर रहते हैं व उन्हें हर माह महज 13500 रुपए ही मिलते हैं। 

उन्हें देखकर मुझे विदेश में नौकरी कर रहे अपने बेटे की याद आ गई। खैर इमीग्रेशन से होकर अंदर पहुचा व वहां लाउंज में सामान रख दिया। यहां बता दूं कि जिस बैंक में मेरा खाता है उसके द्वारा जारी कार्ड को दिखा कर मैं लाउंज में बैठने का हकदार हो गया था जहां तमाम खाने-पीने की चीजे मुफ्त में मिलती है। मुझे बताया कि वे लोग बैंक से 2000 प्रति व्यक्ति के हिसाब से चार्ज करते हैं। वहां वैज व नान-वैज दोनों तरह का खाना लगा हुआ था। मैंने दाल चावल के साथ चाय पी। वहां मुफ्त में दारू भी मिल रही थी। मगर उसे पीना तो दूर रहा उसे चखने तक की मेरी इच्छा नहीं हुई। रेस्टोरेंट जैसी उस जगह पर हम लोग काफी देर बैठे रहे। (जारी)

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