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वह वक्त और रछपाल सिंह

विवेक सक्सेना
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अनिल चतुर्वेदी के व्हाट्सअप से पता चला कि अकाली नेता मास्टर रछपाल सिंह नहीं रहे। यह खबर पढ़ कर मेरी अनिल से फोन पर बात हुई। सचमुच मुझे उनके न रहने पर दुख हुआ। जब मैं जनसत्ता में आया और मैंने सिख व अकाली राजनीति को कवर करना शुरू किया तो सबसे पहले मेरी उन्ही से मुलाकात हुई थी। क्नाट प्लेस के एक होटल में उनकी प्रेस कांफ्रेंस थी। मैं भी उसे कवर करने गया। इससे पहले मैंने ऐसी प्रेस कांफ्रेंस नहीं देखी थी। 

खाने की मेज के चारों और तमाम पत्रकार बैठ गए। जब वे आए तो बैरे ने खाना लगाना शुरू कर दिया। सबने खाना खाया और इस दौरान सभी चुपचाप बैठ रहे। खाना खत्म होने पर मीठा आया। उन्होंने एक न्यूज एजेंसी से आए दो पत्रकारों के लिए एक चिकन-करी व कुछ रोटियां पैक करने के लिए बैरे को ओदश दिया जोकि उन लोगों को अपने ब्यूरो प्रमुख के लिए ले जाना था। फिर उन्होंने पूछा 'शुरू किया जाए' पत्रकारों ने अपना पेन व नोट बुक निकाल ली और उन्होंने सीधे बोलना शुरू कर दिया। 

वे अध्यापक की तरह भाषण देते रहे और पत्रकार आज्ञाकारी छात्रों की तरह उन्हें नोट करते रहे। मैंने जरूर कुछ टेढ़े-मेढ़े सवाल पूछे। उन्हें सुनकर वे काफी विचलित हुए और मुझसे पूछा कि मैं किस अखबार से हूं? मेरे मुंह से जनसत्ता का नाम सुनकर वे थोड़े विचलित जरूर हुए क्योंकि नवंबर 1984 के दंगे हो चुके थे। उस दौरान अपनी रिपोर्टिंग में सिखो की पीड़ा का जिक्र करने के कारण यह अखबार पूरे सिख जगत में काफी लोकप्रिय हो चुका था। 

उन्होंने मेरा नंबर लिया और बाद में मुझे फोन करके अलग से मिलने को कहा। हम लोग एक फाइव स्टार होटल की लॉबी में मिले। उन्होंने मुझे कॉफी पिलाई और कहा कि तुम मेरे कांग्रेंस समर्थक होने के कारण मेरी आलोचना कर रहे हो। मगर तुम्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जब दुनिया के सारे सिख कांग्रेंस के खिलाफ हो चुके हैं और देश जल रहा है तो कोई तो ऐसा चाहिए कि वह पंजाब के आतंकवाद व सिख विरोधी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए सिखों को देश व सरकार के साथ रख सके। 

वे मास्टर तारा सिंह (अकाली दल) के अध्यक्ष थे। कांग्रेंस व सरकार समर्थक माने जाते थे। तब वे कुछ बयान देते तो उससे यह आकलन किया जाता कि सरकार किस मुद्दे पर क्या सोच रही है। वे एक अखबर भी प्रकाशित करते थे। वे पहले इंदिरा गांधी व फिर राजीव गांधी के काफी करीब हो गए थे। दिल्ली व देश के कुछ धंधेबाज सिख उन्हें अपने साथ रखते थे। वे दिल्ली के सिखों के सबसे अच्छे व चर्चित कॉलेज के अध्यक्ष भी थे। 

एक बार व्यासजी ने मुझे बुलाकर एक युवक का नाम देते हुए कहा कि इसने रछपाल सिंह के कॉलेज में आवेदन किया है। सुनते हैं कि वहां काफी गड़बड़ी होती है। इसके मामले में कुछ ऐसा नहीं होना चाहिए। मैं अगले दिन उनसे मिला। मेरे ब्यूरो चीफ रहे राम बहादुर राय भी उन्हें किसी का नाम दे कर आए थे। जब  मैंने उन्हें बताया कि जीवन में पहली बार व्यासजी ने मुझसे कोई काम कहा है तो कुछ क्षण सोचने के बाद उन्होंने कहा कि आप निश्चिंत होकर जाइए। आपका काम हो गया। 

उसके बाद एक दिन वह युवक राकेश सिन्हा जो अब राज्यसभा में सांसद है और संघ के काफी करीब माने जाते हैं आधा किलो मिठाई का डिब्बा लेकर मुझसे आंखें छिपाते हुए व्यासजी के केबिन में घुसते हुए दिखा। मैं समझ गया कि उसका काम हो गया था। और आज भी वे वही पढ़ा रहे हैं। बाद में व्यासजी ने मुझे बताया कि उसका काम हो गया था।

जत्थेदार रछपाल सिंह को उनके कांग्रेंस के समर्थन के कारण अकाल तख्त ने तनखैया घोषित कर दिया था। जब व्यासजी के बेटे विधान का मुंडन हुआ तो मैंने उस कार्यक्रम में उन्हें व अकाल तख्त के जत्थेदार दर्शन सिंह रागी को भी आमंत्रित किया। जब रागी समारोह स्थल पर पहुंचे तो कुछ उनके सिख साथी मुझसे आ कर मिले और बाहर आ कर रागीजी मिलने को कहां। जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने कहा कि अंदर रछपाल सिंह भी मौजूद हैं। वह तनखैया (धर्म से बेदखल) है। अगर मैं अंदर गया तो खबर छुपेगी नहीं। अगर उसके साथ मेरी फोटो छप गई तो मेरे लिए बहुत दिक्कते पैदा हो जाएंगी। इसलिए मैं अंदर नहीं जाऊंगा। तुम बच्चे को लेकर बाहर आ जाओ। मैं उसे यही आशीर्वाद देना चाहता हूं। मैं विधान व व्यासजी को लेकर बाहर आया और उन्होंने अकेले में उसे आशीर्वाद दिया।

रछपाल सिंह मेरी खबरों के अच्छे स्त्रोत बने और अक्सर राजीव गांधी से मिलने के बाद मुझे बता देते थे कि सिखों के मुद्दे पर सरकार क्या सोच रही है। उनके साथ रहने वाले सिख उद्योगपतियों ने सरकार से काफी फायदा उठाया जबकि रछपाल सिंह ज्यादा से ज्यादा अपनी पत्रिका के लिए डीएवीपी का चंद हजार रू का विज्ञापन मांग कर ही संतुष्ट हो जाते थे। 

बाद में वे दिल्ली के एक विवादास्पद बिल्डर तेजवंत सिंह के साथ रहने लगे। वे बेहद चालाक था। उसने दिल्ली के एक पोश इलाके में बनी अपनी इमारात में उन्हें कमरा दे दिया। इसकी वजह यह थी कि उसकी हरकतों के कारण सरकारी एजेंसियों ने वहां बिल न अदा करने के कारण बिजली काट दी थी। रछपाल सिंह को जैड सुरक्षा मिली हुई थी। जब वे वहां गए तो सुरक्षा कारणों से सरकार को वहां बिजली उपलब्ध करवानी पड़ी। दुख की बात यह है कि उनके दोनों बेटों में अपने पिता की तरह का कोई गुण नहीं था। पिता की तमाम मदद व सरकार से पेट्रोल पंप मिलने के बाद भी वे लोग जिदंगी में स्थापित नहीं हो पाए।

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