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कनाडा में बसना, जमना मुश्किल नहीं

विवेक सक्सेना
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मुकेश शर्मा का फोन आया कि आजकल दिल्ली के राजीव भी यहां आ कर रह रहे हैं। मतलब कि पत्रकार राजीव विश्वकर्मा। राजीव छह-सात साल पहले दिल्ली में पत्रकारिता कर रहे थे। वे विज्ञान के विषयों पर लिखते थे। उन्होंने राष्ट्रीय सहारा व रेडियो के लिए काफी काम किया। करीब 64 किताबें लिखी और फिर वे अमेरिका व ब्रिटिश दूतावासों के लिए काम करने लगे। 

फिर वह समय भी आया कि जब किताबें लिखने व अनुवाद के कारण होने वाली उनकी आय उनके वेतन से भी ज्यादा हो गई। इस बीच उनकी शादी हो गई और जब बेटा हुआ तो पता चला कि वह किसी किडनी की बीमारी से गंभीर रूप से पीडित है। डाक्टरों ने उस नवजात बच्चे के आपरेशन की सलाह दी। मगर उन्होंने यह कदम नहीं उठाया। उनकी पत्नी नर्स हैं। अंततः डाक्टरों की सलाह थी कि बच्चे को किसी ठंडी जगह में पाला-पोसा जाए। अतः एक पत्रकार मित्र की सलाह पर कनाड़ा जाने का फैसला किया। 

वे अपेक्षित परीक्षाएं पास करके यहां आ गए। जब वे यहां आए तो पति-पत्नी व दोनों बेटे साथ थे। न कोई जान-पहचान का था और न ही आय का कोई साधन था। अपने बलबूते पर पता लगाया कि वे यहां किस तरह के अनुवाद का काम हासिल कर सकते हैं? अनुवाद का काम देने वाली संस्था के साथ पंजीकरण करवाया और आजकल वे वहां से मिलने वाले सरकारी दस्तावेजों का अंग्रेंजी से हिंदी में अनुवाद करने के साथ-साथ दुभाषिए का काम भी करते हैं। 

उन्होंने बताया कि कनाडा में दुभाषिए को कड़े कानूनों का पालन करना पड़ता है। अगर वह व्यक्ति की बातों का अनुवाद करने के लिए अदालत में या कहीं और जाता है तो वह जरूरी बातों के अलावा उससे कुछ और बात नहीं कर सकता है। काम खत्म होने पर वह दोनों भले ही एक ही जगह जा रहे हों पर वह उन्हें लिफ्ट नहीं दे सकता है। उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी भी स्थाई रूप से नौकरी नहीं करती है व उन्होंने सरकारी अस्पतालों के साथ अपना पंजीकरण करवाया हुआ है और वहां से बुलाए जाने पर ही जाती हैं। 

ऐसा इसलिए है क्योंकि बच्चे भी पढ़ रहे हैं। वे छोटे हैं। इसलिए उन्हें परिवार के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। यहां 12वीं तक शिक्षा मुफ्त है और घर के पास के सरकारी स्कूलों में आराम से दाखिला मिल जाता है। उन्होंने बताया कि छठी क्लास में पढ़ने वाले उनके बेटे को होमवर्क नहीं मिलता है और स्कूल में जिदंगी की अन्य पहलुओं से जुड़ी बातें ज्यादा सिखाई जाती हैं। स्नातक व उसके आगे की पढ़ाई  काफी महंगी है। 

उन्होंने बताया कि आमतौर पर बड़े होने के बाद बच्चे अपने मां-बाप के साथ नहीं रहते हैं। वे नौकरी करके पढ़ाई का खर्च उठाते हैं। और अपनी शिक्षा जारी रखते हैं। यहां शादी में दहेज जैसी कोई चीज नहीं होती है। चर्च में होने वाली शादियां काफी कम खर्च वाली होती है। याद आया कि डा त्यागी ने भी बताया था कि जब उनके एक मित्र के बेटे ने अपनी शादी के कुछ कार्ड उन्हें पकड़ाए तो साथ ही उनसे कहा गया कि जो दोस्त आएंगे उनके खाने का खर्च भी आपको ही उठाना पड़ेगा। उनका बेटा उनसे अलग अपनी मां के साथ रह रहा था। जिससे उनका तलाक हो चुका था व उनके बदले में वह उनसे काफी मौटी रकम ले चुकी थी। उन्होंने गुस्से में उसके कार्ड फाड़ कर फैंक दिए। 

राजीव ने बताया कि पिछले कुछ समय से यहां एक अहम बदलाव आया है। भारतीय युवकों के बड़ी तादाद में यहां आने के कारण मकान काफी महंगे हो गए है जिसका असर कनाड़ा में यह पड़ा है कि तमाम युवा अपने मां-बाप के साथ रहने लगे हैं। हालांकि वे इसके बदले में उन्हें कुछ रहने खाने का खर्च दे देते हैं। यहां बुजुर्गो के रिटायर होने की आयु 65 साल है व आमतौर पर वे उसके बाद ही नौकरी करते हैं। रिटायर होने के बाद उन्हें सरकार से गुजारा-भत्ता मिलता है व मकान न होने पर सरकार उनके रहने व देखभाल का प्रबंध भी करती है। उनका ईलाज भी मुफ्त में होता है। 

बुजुर्ग लोगों के लिए अलग दो कालोनियां बनाई गई है। बुजुर्ग लोग छुट्टी वाले दिन अपनी ट्रेलर पर रखी नावें ले जाकर नदी व समुद्र में तैरते हैं व मछली पकड़ते हैं। तभी मेरी समझ में आया कि जब मैं 10-11 बजे घूमने निकलता हूं तो क्यों बड़े-बड़े घरों के बाहर मुझे खाली कारे खड़ी नजर पड़ती हैं। मुझे राजीव का पुरुषार्थ देखकर बहुत अच्छा लगा। इतने वर्षों से बिना कोई स्थाई नौकरी किए हुए यहां जीवन बिता रहे हैं। वे किराए पर घर लेकर रहते हैं और उनके पास एक अच्छी कार भी है।

मैंने यहां एक बड़ी अजीब चीज देखी। लोग आपस में बहुत कम मिलते-जुलते हैं। घर के आस-पास काफी बड़े बाजार हैं। जहां कई एकड़ इलाके तो पार्किंग के लिए छोड़े गए हैं। यहां हर पेट्रोल पंप के साथ में एक बड़ा सा स्टोर होता है जहां खाने-पीने व रोजमर्रा का सामान बिकता है। पेट्रोल पंप पर उतर कर खुद पेट्रोल भरना पड़ता है जिसे कि बोलचाल की भाषा में गैस कहते हैं। यहां कई पेट्रोल कंपनियां है व उनके रेट अलग-अलग है। कनाड़ा में सऊदी अरब व कजाकिस्तान के बाद दुनिया का सबसे ज्यादा तेल निकलता है। बावजूद यहां तेल महंगा है। हर राज्य के दाम अलग-अलग है। यहां से बड़ी मात्रा में तेल का निर्यात होता है। यहां पेट्रोल लगभग दिल्ली के बराबर या 75-80 रुपए लीटर है। रोचक बात यह है कि आपको हर पेट्रोल पंप पर उसका रेट अलग-अलग मिलेगा। बाजारों में काफी पब व शोरूम है जो कि लगभग खाली नजर आए। 

राजीव ने बताया कि इस जगह लोग ज्यादातर कमाने आते हैं। वे यहां पब पर पैसा खर्च करने की जगह वहां नौकरी कर शराब परोस कर पैसा कमाना ज्यादा पसंद करते हैं। यहां के स्थानीय अंग्रेंजो की खासियत यह है कि वे जब मिलते हैं तो मुस्कुरा कर बातें करते हैं। व न तो अपनी किसी समस्या को दूसरे वाले को बताना चाहते हैं और न ही उसकी कोई समस्या सुनना पसंद करते हैं। 

एक अहम बात मैंने यह भी देखी कि यहां मुझे नाइट लाइफ जैसी कोई चीज नजर नहीं आई। आमतौर पर शाम को 7 बजे दुकाने व दूसरे स्टोर बंद हो जाते हैं। रात 10 बजे रेस्टारेंट बंद हो जाते हैं। सड़के व बाजार तो दिन में ही वीरान नजर आते हैं। पड़ोसी आमतौर पर आपस में नहीं मिलते। लोग आपस में मिलकर मन की बातें करने के लिए तरस जाते हैं। हालांकि दुकानों या रेस्टोरेंटो मे जाने पर आपको यह नहीं लगता कि आप विदेश में है। हर जगह हिंदी भाषी भारतीय लोग मिल जाएंगे। अंत में मैंने राजीव से पूछा कि आप कनाड़ा के नागरिक बन चुके हैं मगर अगर आपके पास अगर भविष्य में बसने का विकल्प हो तो आप कहां रहना चाहेंगे। उन्होंने कहा कि भारत में ही घूमना चाहेगे। वे बेहद प्रकृति प्रेमी है व भारत में भी अपना ज्यादा समय पहाड़ो पर घूमने में निकालते थे।

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