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अंडमान द्वीपों के नाम बदलना और थिंड साहब

विवेक सक्सेना
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कई साल पहले तक मैं अक्सर एक कहावत का उल्लेख किया करता था। वह थी- ‘माल किसी का कमाल किसी का’। काफी लंबे समय से इसका प्रयोग नहीं किया था। मगर जब आज सुबह कनाड़ा स्थित अपने मित्र साहब सिंह थिंड मिलने आए और उन्होंने जो किस्सा सुनाया तो उससे यह कथा दोबारा याद हो आई। साहब सिंह थिंड करीब 30-35 साल पहले कनाड़ा आ गए थे और उन्होंने खुद को अच्छी तरह से स्थापित कर लिया फिर कुछ दशक पहले वे प्रोफेसर मेमोरियल फाउंडेशन से जुड़ गए जिसके कि वे अध्यक्ष हैं और इस संस्था का नाम भूले बिसरे शहीदों को सम्मान दिलवाना है।

इस साल मार्च माह में वे भारत आए थे और मैंने उनकी प्रेस कांफ्रेंस करवाने में अहम भूमिका अदा की थी क्योंकि वे जिस मुद्दे पर प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहे थे वह काफी अहम था। उनको देश के विशिष्ट लोगों से संपर्क करने की सलाह भी थी। वे एक एजेंड़ा साथ लेकर चल रहे हैं। उनकी भारत सरकार से मांग है कि कभी स्वतंत्रता सेनानियों की जेल व अत्याचार के लिए कुख्यात रहे काला पानी या अंडमान निकोबार द्वीप समूहों के नाम अंग्रेंजो के नाम से हटाकर भारतीय शहीदों के नाम पर रखे जाए। 

उनकी इस दलील में काफी दम है कि यहां के 572 द्वीपो के नाम उन अंग्रेंज अफसरो के नाम पर है जिन्होंने कि ब्रिटिश शासन के दौरान वहां बंद स्वतंत्रता सेनानियों पर जबरदस्त अत्याचार किए। उन्होंने वहां के रास आईलैंड, हैवलाक आइलैंड स्मिथ लारेंस, जॉन हाईलैंड आदि के नाम बदलने की मांग की थी। वे रास आईलैंड का नाम बदलकर गदर आईलैंड रखना चाहते थे। वे गदर पार्टी को लेकर काफी चिंतित थे क्योंकि ब्रिटिश शासन काल के दौरान कनाड़ा व अमेरिका में सक्रिय भारतीयों की गदर पार्टी ने इसमें अहम भूमिका अदा की थी। मगर हमारा दुर्भाग्य यह है कि इनमे से तमाम स्वतंत्रता संग्रामियों को यह पीढ़ी नहीं जानती है। 

बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को अंडमान निकोबार की काला पानी जेल में यातनाएं दी गई और उन्हें फांसी दे दी गई। उन्होंने इस संबंध में प्रधानमंत्री राष्ट्रपति, गृहमंत्री, अंडमान निकोबार द्वीप समूह के राज्यपाल से लेकर मानवाधिकार आयोग तक को पत्र लिखे। मगर जैसा कि होता है हर जगह से यहीं जवाब आया कि आपका पत्र उचित कार्यवाही के लिए संबंधित विभाग को भेज दिया गया है। 

अब जब 30 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वहां के कुछ द्वीपो का नाम स्वंतत्रता सेनानियों के नाम पर रखे जाने का ऐलान सुना तो लगा कि उनकी मेहनत काम ले आई है। याद रहे कि 30 दिसंबर के ही दिन 75 साल पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने जापानी सेना के साथ मिलकर यहां कब्जा किया था जोकि आजादी की लड़ाई में अंग्रेंजो से भारत में जीता गया पहला व एकमात्र हिस्सा था। उन्होंने उस दिन वहां राष्ट्रीय ध्वज भी फहराया था। 

इसकी 75वीं वर्षगांठ पर प्रधानमंत्री ने वहां के रॉस आईलैंड का नाम नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वीप, हैवलाक का नाम स्वराज द्वीप व नील आईलैंड का नाम बदलकर शहीद द्वीप करने का ऐलान किया। यह सभी इस जगह के मुख्य पर्यटक स्थल हैं। जब थिंड ने इस बारे में खोज पड़ताल की तो पता चला कि प्रधानमंत्री ने यह कदम पश्चिम बंगाल की भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष व नेताजी सुभाषचंद बोस के भतीजे चंद्र कुमार बोस द्वारा उन्हें इस आशय का पत्र लिखने के बाद किया था। 

हालांकि इस कदम से खुश श्री थिंड का कहना था कि यह मामला नाम बदलने का श्रेय लेने का नहीं बल्कि एक अच्छी शुरूआत करने का है। देश की आजादी में नेताजी के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने इस संबंध में भारत सरकार के तमाम आला शासकों के नाम बदलने की कार्रवाई जारी रखी। उसे जल्दी पूरा करने की मांग की। यहां याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि कनाड़ा में थिंड ने मौजूदा सरकार से दशकों पहले हुए कामागाटामारू कांड के लिए माफी मांगने के लिए दबाव बनाया था व तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपने देश की गलती के लिए कुछ माह पहले संसद में माफी मांगी थी व उन्हें अपना माफीनामा भी भेजा था। कामागाटा मारू कांड के बारे में मैं एक बार पुनः कॉलम में लिखूंगा।

यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि गुलामी के दौरान 1857 में हुई बगावत के मद्देनजर अंग्रेंजो ने स्वतंत्रता सेनानियों को सबक सिखाने व उन्हें मानसिक व शारीरिक रूप से तोड़ देने के लिए अंडमान व निकाबार में सेल्यूलर जेल बनाई थी जिसका काम 1896 में शुरू हुआ व वह 1906 में बनकर तैयार हुई। 

यहां कैदियो को तनहाई में रखा जाता था। उन्हें यातना देकर कड़ी मेहनत करवाई जाती व उन्हें फांसी तक दे दी जाती थी। उनकी दोनों टांगों में बेड़िया पड़ी होती थी व उन्हें सिर्फ दो बर्तन दिए जाते थे। एक खाने के लिए व दूसरा शौच के लिए जिसे उन्हें खुद साफ करना होता था।  तब हिंदू धर्म में यह धारणा थी कि संमुद्र पार करने वाले विधर्मी ही जाते है अतः अंग्रेंजो ने उन्हें विधर्मी बनाने के लिए काला पानी जेल बनाई थी। आश्चर्य तो इस बात का होता है कि जो मोदी सरकार राजधानी की सड़को से लेकर भाजपा शापित राज्यों के शहरों का नाम तक बदलने के लिए बेताब है उसे शहीदों को याद रखने के लिए इतनी छोटी सी कवायद करने में क्यों देरी लग रही है?  वह उसका श्रेय भी किसी को नहीं देना चाहती हैं।

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