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फ्रांस में अचानक फूटा आंदोलन

विवेक सक्सेना
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किसी ने इस बात की कल्पना नहीं की थी कि फ्रांस जैसे समृद्र देश में महंगाई व दामों में वृद्धि करने में ऐसे जबरदस्त आंदोलन देखने को मिलेंगे। हाल ही में वहां डीजल और पेट्रोल पर कर बढ़ाने के विरोध में पूरे देश में मानों आग ही लग गई। फ्रांस की सरकार ने वहां ईधन पर करों में बढ़ोतरी की थी जिसके विरोध में 17 नवंबर से वहां प्रदर्शन शुरू हुए। इन आंदोलनकारियों को जिलेट जॉंस या पीली जैकेट का नाम दिया जा रहा है। इनके शुरू करने में वहां के ड्राइवरों का विशेष योगदान रहा जोकि नियमानुसार पीली रोशनी निकलने वाली जैकेट पहनते हैं ताकि उन्हें दुर्घटनाओं से बचाया जा सके। 

यह एक स्वयंस्फूर्त आंदोलन था क्योंकि वहां के लोग अपनी मौजूदा सरकार खासतौर से प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति से खासे नाराज थे। ये दोनों ही सत्ता में आने के पहले लोगों से किए गए अपने वादे पूरे करने में नाकाम रहे थे। राष्ट्रपति इमेनुएल मैक्रान ने वहां पर करों को कम करने का वादा किया था पर उसकी जगह उन्हें बढ़ा दिया। जिसके कारण आटोमोबाइल ईधन पहले के दामों की तुलना में 12 फीसदी महंगा हो गया। उन्होंने पेट्रोल व डीजल पर हाइड्रोकार्बन टैक्स लगा दिया। 

उनका दावा था कि वे जलवायु संरक्षण के लिए ऐसा कर रहे हैं। उस दिन 17 नवंबर को गांवों व देश के विभिन्न हिस्सो से आए 3 लाख लोगों ने पेरिस में जमकर सरकार का विरोध प्रदर्शन किया। शोरूम व कारों में आग लगा दी। मॉल लूट लिए। ज्यादातर प्रदर्शन देश के महंगे इलाकों में हुए। वहां की राजधानी पेरिस में तो जमकर पुलिस ने आंसू गैस चलाई। पानी की बौछारे की। रबड़ की बुलेट से लोगों को अपना निशाना बनाया। प्रदर्शनकारियों ने देश के प्रमुख राजमार्गों को जाम कर दिया व तमाम पेट्रोल पंपों का घेराव किया जिससे कि उन तक ईधन न पहुंचने के कारण वे लगभग खाली हो गए। 

अब तक 3 लोग मारे जा चुके हैं व 400 के करीब लोगों को गिरफ्तार किया गया है। हालात इतने गंभीर हुए कि कि अंततः 4 दिसंबर को सरकार को यह बढ़ोतरी वापस लेने का ऐलान करना पड़ा। सरकार की समस्या यह है कि वह प्रदर्शन समाप्त करने के लिए किससे बात करे। प्रदर्शनकारियों का कोई नेता नहीं है। वे तो सोशल मीडिया पर हुए प्रचार के कारण विरोध प्रगट करने के लिए एकत्र हुए। यह प्रदर्शन इतना जबरदस्त था कि इसे 50 साल पहले मई 1968 में छात्रों द्वारा किए गए प्रदर्शनों से भी भयावह माना जा रहा है। गुस्साएं लोगों ने अमीरो के मकानों, ऐतिहासिक दर्शनीय स्थलों से लेकर कारों तक को अपना निशाना बनाया। 

इसका परिणाम यह हुआ कि लोगों ने अपनी यात्राएं रद्द करवा दी। होटलो में बुकिंग रद्द करवाई। हवाई जहाजों को खाली जाना पड़ा। इस देश में ऐसा माना जाता है कि राष्ट्रपति अमीरो के समर्थक है। इसकी वजह सार्वजनिक रूप से किया जाने वाला उनका व्यवहार है। वे उनके इस्तीफे की मांग कर रहे थे। माना जाता है कि उन्होंने देश में ऐसे श्रम कानून बनाए है जिससे उद्योगपतियों को छंटनी करने में आसानी हो गई है। वे लोगों के मन की बात समझने में नाकाम रहे। लोग तो उनसे काफी नाराज हो चुके थे। उन्हें तो अपना गुस्सा प्रगट करने का मौका चाहिए था। 

लोगों का कहना था कि तेल के दामों में बढ़ोतरी के कारण उनके जीवन स्तर पर असर पड़ेगा और एक अच्छी जिदंगी जीना उनके लिए मुश्किल हो जाएगा। ज्यादातर विरोध गांवो से हा है जहां ज्यादा तादाद में रेल व बसों की सवारी नहीं है व लोगों को अपनी यात्रा के लिए निजी बस का इंतजाम करना पड़ता है। उनका आरोप है कि जहां एक और अमीर उद्योगपतियों को सरकार फायदा पहुंचा रही है। वहीं यह काम आम आदमी की कीमत पर हो रहा है। कुछ अर्थों में वहां के लोग ठीक वैसे ही आरोप लगा रहे हैं जैसे कि भारत में राहुल गांधी व दूसरे विपक्षी नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगा रहे हैं। अहम बात यह है कि फ्रांस दुनिया का ऐसा वैसा छोटा मोटा देश नहीं है। वह दुनिया की सातवीं सबसे ज्यादा सकल घरेलू उत्पाद वाला देश है। महज 83 लाख की जनसंख्या वाले इस देश में पूरी तरह से धार्मिक स्वतंत्रता है और वहां बुरका पहनने पर रोक है। इस कारण वह आतंकवादियों के हमले का शिकार भी बना है। वह सुरक्षा परिषद के उन पांच सदस्यों में से एक है जिन्हें वीटो करने का अधिकार है। दुनिया के 500 बड़े उद्योगों में से 36 उद्योग वहीं हैं। दुनिया की जानी-मानी विमान निर्माता कंपनी एयरबस वहीं की है। दुनिया का सबसे बड़ा बैंक बीएनपी व बीमा कंपनी एएक्सए वहीं की है। वहां के लोगों का व्यवहार काफी अच्छा है व पुरुषों की औसत आयु 68 साल व महिलाओं की 85 साल है। वहां एड्स, कैंसर सरीखे बीमारियेां का सरकार मुफ्त में ईलाज करती है। वह यूरोपियन यूनियन का सबसे बड़ा कृषि निर्यातक देश है क्योंकि वहां बड़ी तादाद में अनाज, मांस, फूलो फलो, वाइन शैंपेन से लेकर पनीर तक का निर्यात होता है। 

वहां की सरकार अपने किसानों को जमकर सबसिडी देती है। वहां बहुत बड़ी तादाद में बिजली पैदा होती है और वहां 75 फीसदी बिजली परमाणु ऊर्जा से पैदा की जाती है व बाकी पनबिजली होती है। इसके बावजूद वहां के लोग अपनी सरकार से नाखुश हैं। वहां दुनिया की ऐसी सेना है जिसने 140 देशों के नागरिकों को सैनिक बनाया गया है। उन्हे रिटायर होने के बाद वहां की नागरिकता मिल जाती हे। इसके बावजूद अपने नेताओं की मनमानी को वहां के लोग सहन नहीं कर पा रहे हैं।

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