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मैं तो व्यासजी को कहूंगा ज्योतिषाचार्य (सियासी)

विवेक सक्सेना
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काफी समय पहले की बात है। देश में आम चुनाव होने थे। एक दिन इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक आला अफसर का फोन आया और उसने मुझसे कहा कि व्यासजी से कहो कि चुनावों के बारे में अपना आकलन जल्दी लिखे। जब मैंने इसकी वजह जाननी चाही तो वे कहने लगे कि हमारे डायरेक्टर रिपोर्ट जल्दी देने को कह रहे है क्योंकि उन्हें उसे प्रधानमंतरी को सौंपना है। मैंने उनसे पूछा कि इससे व्यासजी का क्या लेना देना तो वे हंसते हुए कहने लगे कि तुम्हें नहीं पता कि हम लोग उनके आकलन पर कितना निर्भर करते हैं व उन्हें क्या कहते हैं? उन्होंने बताया कि हम लोग तो उन्हें भारतीय राजनीति का पैरामीटर कहते हैं। उनके ज्यादातर आकलन सही साबित होते हैं। 

तब मुझे लगा कि मेरे वह रिश्तेदार मुझे खुश करने के लिए ऐसा कह रहे होंगे। मगर जब पिछले चुनाव के पहले सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल से मिलने गया तो उन्होंने उस दिन नया इंडिया में छपे व्यासजी के राजनीतिक आकलन पर लंबी बहस करने के बाद मुझसे कहा कि मैं उनसे बात करवाऊं। संयोग से वे तब नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लेने के लिए गांधीनगर गए थे। अहमद पटेल ने उनके हर राज्य को लेकर लंबी बातचीत की और मुझसे पेन लेकर लिखते रहे और अंत में कहां कि आपने हमारी हालत कुछ ज्यादा ही पतली कर दी है। परिणाम आने के बाद मैं आपसे मिलूंगा। 

जब परिणाम आए तो उसके नतीजे कमोबेश वैसे ही निकले। मुझे पता नहीं कि अहमद पटेल ने दोबारा व्यासजी से इस बारे में बात की या नहीं। ये घटनाएं इसलिए याद आ गई क्योंकि मैंने 23 सितंबर की गपशप में उनके लिखे को जो पढ़ा और अक्टूबर में वह सही साबित हुई तो सोचने को मजबूर हुआ।

व्यासजी की राजनीतिक भविष्यवाणी और आकलन किस तरह से सही साबित होता है और वे देश में सबसे पहले उसका कैसे ऐलान करते हैं, यह साबित करने के लिए 23 सितंबर की गपशप का यहां उल्लेख करना जरूरी है। उस दिन उन्होंने मोदी सरकार और सीबीआई, ईडी में चल रही खींचतान के बारे में लिखा था। उन्होंने ‘सीबीआई में सिर फुटव्वल व गुजराती’ शीर्षक में जो लिखा था उसे बहुत मुश्किल से मैं संक्षिप्त रूप से पेश कर रहा हूं। उन्होंने लिखा था-

‘चालीस साल की पत्रकारिता में मैंने वह नहीं देखा जो पिछले चार सालों में प्रधानमंत्री दफ्तर, सीबीआई, सुप्रीम कोर्ट, सीवीसी, वित्त मंत्रालय जैसी सर्वोच्च निर्णय, जांच एजेंसियों और संवैधानिक संस्थाओं मे होते हुए देखा है। यों मैं आजकल रोजमर्रा की रिपोर्टिंग, सत्ता केंद्रों की खोज खबर से दूर हूं और विचार व हिंदू डीएनए की गूढ़ता में डुबा हूं मगर दिल्ली दरबार की अपनी आंखे पुरानी है। तभी जो दिखा है उसने सोचने को मजबूर किया है कि यह कैसा हिंदू राज जिसमें प्रधानमंत्री दफ्तर या तो पुलिस थाना है, सेंसर आफिस है या क्रोनी पूंजीवाद के एजेंट के रुप में कनवर्ट है। यही नहीं गुजराती बनाम नॉन गुजरातियों का अखाड़ा है। इसमें कभी सीबीआई मोहरा है तो कभी सुप्रीम कोर्ट, कभी सीवीसी या वित्त मंत्रालय मोहरे है। इस सबसे नरेंद्र मोदी ने अपने आपको क्या बना डाला है इस पर जितना सोचेंगे वह कम होगा। 

दिमाग भन्नाता है सोच कर कि पहले देश ने सर्वोच्च न्यायालय मतलब सुप्रीम कोर्ट का यह झगडा देखा कि चीफ जस्टिस और उनके बाद के चार जजों में कौन सच्चा, ईमानदार है तो अब यह घमासान है कि सीबीआई का डायरेक्टर या उनके विशेष डायरेक्टर में कौन ज्यादा भ्रष्ट है? 

सोचे, प्रधानमंत्री दफ्तर नाम के थाने ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कथित तौर पर जांच वाली भारत राष्ट्र-राज्य की संस्था सीबीआई की दो कौडी की इज्जत बची नहीं रहने दी।  डायरेक्टर के खिलाफ स्पेशल डायरेक्टर लिख कर केबिनेट सचिव, प्रधानमंत्री दफ्तर को आरोपों का चिठ्ठा देता है और उसे मुख्य सर्तकता आयुक्त को भेज सीवीसी संस्था जूनियर अस्थाना से सुनती है कि तुम्हारा बॉस, डायरेक्टर कितना बेईमान है तो उधर सीबीआई का डायरेक्टर, अपनी एजेंसी के जरिए बयान से मीडिया को बताता है कि यह जो अस्थाना है वह खुद बेईमान है। उसकी तो एजेंसी जांच कर रही है। सीवीसी को उसकी शिकायत को कूड़ेदानी में फेंकना था। 

यह प्रधानमंत्री दफ्तर, उनके गुजराती अफसरों की बदौलत है। पहले आलोक वर्मा को डायरेक्टर बनाया। सो जब पीएमओ ने बनाया तो उन पर भरोसा किए रहना था। उनकी बजाय मोदी-शाह ने गुजरात कॉडर के अपने भरोसेमंद अफसर अस्थाना को इसलिए बैठाया ताकि नीचे से उनके मनमाफिक काम हो। इससे पंगा हुआ तो सीवीसी तक यह बात पहुंची कि अस्थाना तो दागी है, उन्हे स्पेशल डायरेक्टर नहीं बनाना चाहिए। न तब मोदी और उनके पीएमओ ने शिकायत करने से वर्मा को रोका तो उधर अस्थाना को जैसे भी हो सीवीसी से स्पेशल डायरेक्टर बनाने की जिद्द की। फैसला करवाया। तभी से दोनों में ठनी और इतनी ठनी की दोनों ने एक-दूसरी की जासूसी की। सुप्रीम कोर्ट में इधर याचिका हुई, उधर याचिका हुई। फिर उसके चपेटे में गुजराती बनाम गैर-गुजराती अफसरों का घमासान हुआ जिसके चलते चौतरफा दलदल है!

दूसरा ‘पीएमओ, वित्त मंत्रालय कीचड़ ही कीचड़’ शीर्षक वाले आईटम को भी दोबारा पढ़ना जरूरी हैं उन्होंने जो खुलासे किए हैं। वे अब एक-एक करके सामने आ रहे हैं। तमाम मसलों व घटनाओं का तो उन्होंने पहले ही ऐलान ही कर दिया था। जरा फिर ध्यान से पढि़ए और वहां की राजनीति व टकराव को समझिए। पूरी गपशप  इसलिए दे रहा हूं क्योंकि तमाम कोशिशों के बावजूद भी मैं इनकी एक लाइन तो क्या एक शब्द तक नहीं काट पाया क्योंकि वे जानकारी और खुलासों से लबरेज थीं।

“सीबीआई में डायरेक्टर बनाम स्पेशल डायरेक्टर का झगड़ा प्रधानमंत्री मोदी के दफ्तर, अरूण जेटली, उनके वित्त मंत्रालय और सरकार के आला अफसरों के बीच के कीचड़ का प्रमाण है। मैं कीचड़ का अभी पूरा खुलासा नहीं करूंगा फिर कभी। आज सिर्फ परस्पर विरोधी दो लोगों को अपनी सलामी है। एक का नाम है विनित नारायण और दूसरे का नाम राजेश्वर सिंह। विनित नारायण और उनके सहयोगी रजनीश कपूर इस वक्त हवाला कांड से ज्यादा गंभीर जानकारियों के राजदार है तो दूसरी और प्रवर्तन निदेशालय याकि ईडी के नंबर दो राजेश्वर सिंह उन बातों के राजदार है जिनके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निजी सचिव राजीव टोपने, राष्ट्रपति भवन में बैठे भरतलाल, वित्त सचिव हसमुख अधिया, पीके मिश्रा, सीबीआई में नंबर ,दो स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना और वित्त मंत्री अरूण जेटली छह महिने से छटपटाए हुए हैं। ये बैचेनी में इस लेवल तक जा कर सोच रहे है कि राजेश्वसिंह, करनैल सिंह, अजित डोभाल, नृपेद्र मिश्र, आलोक वर्मा मतलब ऩॉन-गुजराती अफसरों ने ऐसा क्या टेटूआ दबाया जो नरेंद्र मोदी, अमित शाह ने राजेश्वरसिंह की बरखास्तगी, उसकी जांच के फैसले तुंरत नहीं होने दिए? जबकि पीएओ ही तो था जिसने बाले-बाले राजेश्वर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल की सुनवाई के वक्त केबिनेट सचिव से बंद लिफाफे का नोट जज के सामने रखवाया और सुप्रीम कोर्ट ने उसे देख राजेश्वरसिंह के खिलाफ जांच की मंजूरी दी।  

ध्यान रहे यही चक्कर है जिसके चलते वीनित नारायण, रजनीश कपूर, और डा सुब्रहमण्यम स्वामी आमने-सामने आए। दोनों ने एक-दूसरे के खिलाफ बेईमान होने का कैंपेन चलाया। इस सबके बीच में जून से ले कर अब तक जो सुना-सुनाया गया (एक रिकार्डेड टेप भी) उसकी दास्ता सुनेगे तो रोंगटे खडे हो जाएगें। यह भी सोचने को मजबूर होगे कि नरेंद्र मोदी के निजी जीवन को लेकर सत्ता के आला लोगों में क्या–क्या कहा जाता है। पता नहीं टेप है या नहीं, पर इसके अंश कहां-कहां सुने गए, अरूण जेतली और उनके सचिव अधिया ने इसके अंश पर कैसी –क्या दिलचस्पी बताई, इस सबकी किस्सागोई देवकीनंदन खत्री के दरबारी उपन्यास और उसमें एय्यारों के खेल से कम नहीं है। 

बहरहाल, लबोलुआब कि गुजराती बनाम नॉन-गुजराती अफसरों के दावपेचों का जून से पहले स्पार्किंग पाइंट था पत्रकार उपेंद्र राय के यहां छापे और गिरफ्तारी। यह नॉन गुजरातियों का गुजराती लॉबी पर वार था। सीबीआई दो हिस्सों में बंटी। इसकी बेकग्राउंड में अरूण जेतली का पहले से राजेश्वर सिंह से चिढ़े होना भी है। मगर एयरसेल-मेक्सिक, चिदंबरम, 2 जी की जांच के चलते सुप्रीम कोर्ट ने क्योंकि राजेश्वरसिंह को जांच के लिए फिक्स, स्थाई किया हुआ था इसलिए जेतली वित्त मंत्री होते हुए भी राजेश्वर को ईडी से हटवा नहीं पाए। फिर जेतली और उनके दरबारियों ने डा स्वामी और राजेश्वर की सांठगांठ भी मानी हुई थी। 

डा स्वामी क्योंकि जेटली के घोर विरोधी और वित्त मंत्रालय द्वारा आर्थिकी के कबाड़ा होने के साथ विजय माल्या के भागने या अदानी की कर्ज देनदारी जैसे मामलों और जेतली पर कुछ ज्यादा ही फोकस हो कर टिवटर से फुलझडियां छोड़ते रहे हैं इसलिए अरूण जेटली और गुजराती लॉबी में डा स्वामी और उनके करीबियों को ले कर निपटाने का मिशन पुराना है। सो जब उपेंद्र राय की गिरफ्तारी से गुजराती लॉबी पर आंच आई तो अनहोनी हुई जो राजेश्वर सिंह को निपटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई। पर हां, उससे पहले राजेश्वर की हिमाकत थी जो वित्त सचिव अधिया के खिलाफ आरोपों का पत्र भेजा। शायद उसी से सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका का ताबडतोडपना बना। विनित नारायण के सहयोगी रजनीश की याचिका थी। इसमें निर्णायक बात तब हुई जब भारत सरकार के केबिनेट सचिव ने पीएमओ की सहमति से राजेश्वर के खिलाफ बंद लिफाफे में नोट दिया। और भूचाल आ गया। कोर्ट ने उसे देख राजेश्वर की जांच, तबादले की मंजूरी दे डाली। 

डा स्वामी भड़के तो ईडी के प्रमुख करनैल सिंह ने भी राजेश्वर के बचाव में बयान दिया। कहते है एनएसए अजित डोभाल, करनैलसिंह, नृपेंद्र मिश्र आदि सब राजेश्वर की विदेशी एसाइनमेंट में जांच की उपयोगिता के कायल है। मगर सुप्रीम कोर्ट का जांच आदेश आया नहीं कि गुजराती लॉबी फूल कर कुप्पा। वित्त सचिव हसमुख अधिया ने तत्कालिन वित्त मंत्री पीयूष गोयल को जांच नोट, सीवीसी से मंजूरी की फाइल आने-जाने की भागमभाग कराई मगर आश्चर्य  जो पीयूष गोयल ने ओके नहीं दिया। गुजरातियों को समझ नहीं आया कि यह कैसे? नरेंद्र मोदी और अमित शाह क्या चाहते है? कैसे बना बनाया रोडमैप रूका है? वित्त सचिव ने आराम कर रहे अरूण जेटली से बात की। उनकी मंत्रालय में वापसी जरूरी बनवाई। पर अरूण जेटली काम संभाल कर बात आगे बढ़ाते उससे पहले सीबीआई डायरेक्टर आलोक वर्मा और स्पेशल डायरेक्टर अस्थाना में ऐसी ठन चुकी थी कि एक-दूसरे के खिलाफ लिखित आरोप, कार्रवाई, निगरानी, फोन टेप, जासूसी के सारे काम हुए। उधर ईडी के बतौर प्रमुख करनैलसिंह ने सुप्रीम कोर्ट की याचिका में राजेश्वरसिंह पर लगे आरोपों की जांच अपनी तह अपने यहां करके कुछ न पाने का का निष्कर्ष निकाला तो साथ में सीबीआई डायरेक्टर को लिखा कि हमें तो कुछ नहीं मिला मगर जांच की आधिकारिक संस्था क्योंकि सीबीआई है इसलिए आपसे जांच का आग्रह है। सो कहते है दोनों ईडी व सीबीआई दोनों की जांच में औपचारिक तौर पर राजेश्वर पर लगाए आरोप मिथ्या करार है। 

गुजराती लॉबी और अरूण जेटली को काटो तो खून नहीं। कैसे राजेश्वर निपटे, कैसे करनैलसिंह का एक्सटेंशन नहीं हो और जनवरी में रिटायर होने से पहले आलोक वर्मा को कैसे बांधा जाए, इसके रास्ते में खूब सिर खपाया गया। जब विभागीय प्रमुख और जांच की संस्था सीबीआई ने कुछ न होना बता दिया है तो यह भी समझ आया कि जेतली-अधिया ने यदि राजेश्वर के यहा इनकम टैक्स के छापे भी पड़वाएं तो निकलेगा क्या? शक फिर यह भी कि सीबीडीटी चैयरमेन गुजराती नहीं तो इनकम टैक्स विभाग से गारंटी नहीं कि राजेश्वर को फिक्स करने के लिए पीएमओ के मनमाफिक काम हो! 

जानकारों की माने तो गुजरातियों ने आलोक वर्मा को बाईपास कर राजेश्वर की धरपकड कर अस्थाना से जांच करवा तीन महीने में राज पर्दाफाश का ऐसा ख्वाब देखा जिससे दिसंबर तक भूचाल आ जाए। मोदी को राजनैतिक फायदा हो लेकिन उलटे अस्थाना के खिलाफ ही सीबीआई डायरेक्टर ने जांच को गति दे डाली। उससे आंशका हुई कि जनवरी में आलोक वर्मा रिटायर हो उससे पहले अस्थाना का भ्रष्टाचार ऐसे न प्रमाणित हो जाए कि गुजरातियों के चाहने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट, सीवीसी अस्थाना को डायरेक्टर बनाने से इंकार कर दे। अस्थाना एंड पार्टी का सोचना था कि राजेश्वर की छुट्टी हो जाए, उसकी जांच शुरू हो जाए तो आलोक वर्मा और गैर-गुजराती अपने आप डिफेंसिव बनेगे। लेकिन मोदी और अमित शाह ने अनुमति नहीं होने दी! हां, हैरानी की बात। तब गुजरातियों में बात चली ये किसी के सगे नहीं है। नोटबंदी के वक्त का इनका टेटूंआ फंसा हुआ है सो वीटो हो गया। 

संकट यह है कि अधिया अगले महीने रिटायर होने है। वे जेतली और पीएम दोनों के भरोसेमंद है इसलिए उनके रहते ईड़ी में परिवर्तन के प्रस्ताव, राजेश्वर को किसी भी तरह पकड उससे उगलवाने का काम आसान है। इस बीच विजय माल्या के मामले में जेतली फंसे और डा स्वामी के पुराने टिवट याद आए तो वापिस अरजेंसी बनी कि किसी भी तरह आलोक वर्मा और राजेश्वर को घेर डाला जाए। तभी दो कदम एक साथ उठे। ध्यान रहे और यह मैंने इसी कॉलम में बहुत पहले लिखा है कि चौधरी को सीवीसी प्रमुख बनवाने में जेतली का हाथ था। 

सो सीवीसी चौधरी के यहां पहले राजेश्वर और पिछले सप्ताह आलोक वर्मा दोनों के खिलाफ जेटली-अधिया-गुजरातियों की लॉबी ने शिकायत मान्य करा डाली। राजेश्वर के लिए अनुमति पहले और अब लगता है कि सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा को भी सीवीसी के जरिए जवाबदेह बना कर घेरने की तैयारी है। सीवीसी में चौधरी और शरद कुमार दोनों ने जिस फुर्ती से अस्थाना का कहा रिकार्ड में लिया और फिर मीडिया में जैसे खबर लीक हुई उससे लगता है कि अंततः जेटली और गुजराती ल़ॉबी डा स्वामी, आलोक वर्मा, करनैलसिंह, नृपेंद्र मिश्र, डोभाल, राजेश्वरसिंह को डाउन करने का रास्ता पा रहे है। तभी राजेश्वरसिंह को ले कर एसआईटी गठित होने की उन जानकारों में गपशप है जिनके पास टेप रिकार्डिंग से ले कर मुलाकातों, जेटली-अधिया की बैचेनी आदि सब का रिकार्ड है। 

सवाल है क्या डा स्वामी, गैर-गुजराती लॉबी, आलोक वर्मा, राजेश्वरसिंह आदि अपने को फंसने देगें? हिसाब से जून में सुप्रीम कोर्ट के जांच के आदेश से ले कर इस 22 सितंबर तक तो गुजराती लॉबी-जेतली परेशान रहे है। नरेंद्र मोदी-अमित शाह से अपने मन की और कथित तौर पर मोदी के हित में काम के लिए भरतलाल, राजीव टोपने, अधिया, अस्थाना जो चाहते थे वह ये नहीं करा सके। लेकिन सीवीसी का अब वाया मीडिया निकाल कर उसे जांच में अगुआ बनाने ( संभव है एनआईए से रिटायर हुए आईपीएस अफसर शरद कुमार की निगरानी में आलोक वर्मा, राजेश्वरसिंह की जांच की निगरानी का पैंतरा बने) की पहल मारक है। इससे खेल एकदम बदल सकता है। 

जो हो, आने वाले दिन अपनी एक नई थीसिस को पुष्ट बनाने वाले होगे। वह यह कि नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री दफ्तर, सीबीआई, ईडी, वित्त मंत्रालय में जितना गंद और जैसा दलदल बनवाया क्या वह आजाद भारत के इतिहास में पहले कभी बना था?” 

यह सब 23 अक्टूबर को नया इंडिया के व्यासजी के गपशप कालम में छपा है। 

हिंदी में एक कहावत है कि पूत के पंख पालने में ही पहचान लिए जाते हैं। वे सरकार, नेताओं के पांव पहचाने वाले पत्रकार हैं। इस रिपोर्ट में जिन विनीत नारायण का उन्होंने जिक्र किया था। उन्हें भी जनसत्ता में वे ही लेकर आए थे। व्यासजी के तहत काम करते हुए मैंने सीखा कि न तो कभी किसी के पद व हैसियत से प्रभावित हो और न ही डर या लालच में कुछ लिखो। यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता था कि एक समय वो नरेंद्र मोदी के इतने करीबी होते थे कि उन्होंने सबसे पहले उन्हें ही इंटरव्यू दिया था। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह तो उनके एक निजी कार्यक्रम से हवाई अड्डे से सीधे दौड़े हुए ताज होटल में आए व इस संयोग के कारण नीरजा चौधरी, मनमोहन सरीखे वरिष्ठ पत्रकारों के साथ मैंने भी व्यासजी व उनके साथ भोजन करते हुए जमकर खुलकर राजनीति पर चर्चा की। बाद में उन्होंने नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही अपने अखबार में गपशप कॉलम में मोदी राज की बधिया उधेड़नी शुरू कर दी। और तमाम समस्याओं व विज्ञापन रोके जाने के बावजूद लगातार अखबार का प्रकाशन कर रहे हैं। उनकी एक खासियत यह है कि उनके अंदर का दुर्वासा सिर्फ रिपोर्टिंग में ही प्रकट होता है और वे उससे निजी खुन्नस नहीं पालते हैं। जब भी मैंने कभी उनके किसी विरोधी के बारे में चर्चा की तो यह जवाब मिला कि तुम्हें उसकी समीक्षा करते समय उसका अमुक अच्छा गुण नहीं भूलना चाहिए। मैंने उन्हें बहुत करीब से देखा। वे तो उन लोगों में गिने जा सकते हैं जोकि घर फूंक तमाशा देखते हैं। वे तो ऐसे पारस हैं जिसने लोहा तो क्या एल्युमिनियम तक को सोना बना दिया। हालांकि वे सोना अपनी एल्युमिनियम की खामियां छोड़ नहीं पाया। यह सब इसलिए दोबारा पेश किया है ताकि उनकी सियासी ज्योतिष पाठकों के सामने रख सकूं।

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  1. Uttarpradesh ke results ki bhavishywani par kya kehna chayege aap
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