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यदि पटेल आज होते तो क्या सोचते?

विवेक सक्सेना
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जब मैं अपने बड़े भाई की शादी की बारात में दिल्ली आया तो खाने में गत्री व दाल की बनी मिठाइयां देखकर हैरान हो गया। पूछने पर पता चला कि राजधानी में दूध की कमी के कारण मई में दूध से बने पकवानों व दूसरे सामानों जैसे खोया पनीर पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है। तब यह बात मुझे कुछ अजीब सी लगी और कानपुर लौटने पर अपने परिचितो को यह विशेष बात सुनाई। 

तब हमारे लिए दिल्ली तो मानो विदेश जैसा था। जब 1979 में यहां नौकरी करने आया तब भी दूध का संकट बना हुआ था। कानपुर की तरह यहां दूध के चट्टे व डेयरियां नहीं थीं। उसे हासिल करने का एक मात्र स्त्रोत दिल्ली दुग्ध योजना हुआ करती थी। तब लोग अंधेरे मुंह उठा करके डीएमएस के दूध वितरण केंद्र के आगे झोले में पत्थर रखकर उसकी लाइन लगा देते थे और बूथ खुलने पर अपने झोले की जगह खड़े हो जाते थे। तब हर खरीददार को एल्यूमिनियम का बना एक कार्ड मिलता था जिस पर उसका नाम, पता व दिए जाने वाले दूध की मात्रा अंकित होती थी। 

तब अगर किसी के घर में कोई ऐसा मेहमान आ जाता जिसके बच्चे दूध पीते होते तो काफी मुश्किल का सामना करना पड़ता व पड़ोसियों से अनुरोध करके उनके हिस्से का दूध हासिल करना पड़ता था। बाद में मदर डेरी अस्तित्व में आई और हमें मशीन से दूध मिलने लगा। मगर हम यह भूल जाते हैं कि हमें दुध सुलभ कराने में देश के पहले उप प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार पटेल की कितनी बड़ी भूमिका रहीं। हम आज गुजरात में उनकी संसार की सबसे ऊंची प्रतिमा तो लगा रहे हैं मगर उस योगदान का भूल गए हैं जिसके कारण उन्होंने सुबह की शुरुआत चाय की गरमागरम चुस्की से होती है।

बहुत कम लोग यह सत्य जानते हैं कि पूरे देश को एक सूत्र में बांधने के साथ ही उसे आसानी से दूध उपलब्ध कराने का सारा श्रेय सरदार वल्लभ भाई पटेल को ही जाता है। आजादी के पहले भी हमारे अंग्रेंज शासकों के लिए अच्छा दूध हासिल कर पाना बहुत मुश्किल था। इसके लिए उन्होंने 1942 में एक निजी डेरी की खोज की। इसका नाम पोलसन था जोकि मुंबई से 350 किमी दूर स्थित गुजरात के खेड़ा इलाके से दूध हासिल करके मुंबई के अंग्रेंजो को दूध उपलब्ध कराती थी। 

हम सभी ने अपने बचपन में पोलसन मक्खन जरूर खाया होगा। दशकों पहले फिल्म जगत के एक हास्य कलाकार का नाम भी पोलसन था। इसके कारण मुंबई की सरकार ने बांबे मिल्क स्कीम की शुरुआत करते हुए वहां खेडा (कैरा) जिले से दूध मंगवाना शुरू कर दिया। मगर तब भी पोलसन कंपनी कैरा से ही दूध खरीद कर मुंबई में बेच रही थी व दूध उत्पादको को बहुत कम पैसा देती थी। 

तब गुजरात के दूध उत्पादको ने सरदार पटेल से संपर्क करके उन्हें अपनी समस्या बताई। उन्होंने उन लोगों से एकजुट होकर पोलसन को दूध न बेचने का अनुरोध किया। मगर इसका फायदा नहीं हुआ। तब उन्होंने अपने ही प्रदेश के नेता मोरारजी देसाई से इस बारे में बात की व उन्होंने त्रिभुवन दास पटेल से किसानों के संघर्ष को नेतृत्व देने को कहा। इसका परिणाम यह हुआ कि 1945 में किसानों ने बीएमएस के खिलाफ 15 दिन की हड़ताल की व उसे अपना दूध बेचने की जगह उसे सड़कों पर बहा कर अपना विरोध जताया। इससे पोलसन का एकाधिकार खत्म हो गया व पहली बार मुंबई के लोगों को किसानों से सीधा सस्ता दूध मिला। 

सरदार पटेल की सलाह पर खैडा जिला सहकारी दूध उत्पादक यूनियन स्थापित की गई। यह काम आजादी के पहले ही 1946 में हो गया था। श्वेत क्रांति के जनक दिवंगत वर्गीज कुरियन जनरल मैनेजर के रूप में इस यूनियन में शामिल हुए और उन्होंने आनंद में पहला दूध प्रोसेसिंग संयंत्र स्थापित किया जोकि अतिरिक्त दूध से पावडर व पनीर बना देता था। यह उस समय की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इससे दूध बर्बाद होना बंद हो गया। 

बताते है कि 16 जुलाई 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को सरदार पटेल की पहली जन्म शताब्दी पर 1964 में गुजरात में एक चारा संयंत्र का उद्घाटन करने के लिए आमंत्रित किया गया। वे एक दिन पहले ही आनंद पहुंच गए और उन्होंने अफसरों से वहां के गांव में एक रात गुजराने का अनुरोध किया। वहां वे आए परिवर्तन को देखकर अचरज में पड़ गए। वे इससे इतना ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने जार्ज कुरियन से इसे पूरे देश में लागू करने को कहा और इस तरह से आपरेशन फ्लड की शुरुआत हुई व 16 जुलाई 1965 को नेशनल डेयरी डवलपमेंट बोर्ड स्थापित किया गया। 

डा कुरियरन इसके पहले अध्यक्ष बने व उन्होंने दूध उत्पादको, उसके सप्लयारो व ग्राहकों के बीच संबंध स्थापित करना शुरू दिया। उन्होंने यूरोपियन इकोनॉमिक कमीशन द्वारा दान में दिए गए दूध के पावडर व मक्खन आदि को बेचकर पैसा जुटाया। इसका असर यह हुआ कि गुजरात में सहकारी संस्थाएं बेहद मजबूत हो गई व आम क्रेता को मिलने वाला कमीशन 80 फीसदी दूध उन्हीं के जरिए आने लगा और वह 1970-77 में 200 करोड टन के अपने उत्पादन से बढ़कर 1995-96 में 691 टन तक पहुंच गया। 

खैडा का दूध विशेष ट्रेन के जरिए 2000 किमी का सफर करके कलकत्ता तक पहुंचने लगा। मगर दूध सहकारी संस्थाेओं की सारी सफलता गुजरात तक ही सीमित रही क्योंकि उन्हें दूध प्रोसेस करने वाला प्लांट लगाने के लिए आसानी से  लाइसेंस दिए जाते थे। 2002 में वाजपेयी सरकार ने दूध क्षेत्र को पूरी तरह से लाइसेंस मुक्त करा। इसके कारण निजी क्षेत्र में तमाम उत्पादक जैसे पारस आदि सामने आए व सहकारिता क्षेत्र में उनकी प्रतिस्पर्धा बढ़ी। इसके बावजूद भी दुनिया में दूध का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद हम अपने कुल उत्पादन के एक चौथाई दूध को ही प्रोसेस करा पाए व किसानों की स्थिति आज भी शोचनीय है। 

मजेदार बात यह है कि हम 31 अक्टूबर को गुजरात में सरदार पटेल की दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा का अनावरण तो किया हैं पर उन्होंने दूध उत्पादको की वित्तीय हालात सुधारने के लिए जो कदम उठाए थे उन्हें हमने ज्यादा आगे नहीं बढ़ाया। वहीं दूसरी और उनकी प्रतिमा को लेकर भी विवाद शुरू हो गया है। नरेंद्र मोदी ने प्रतिमा के निर्माण के लिए किसानों से लोहे के उपकरण जैसे खुरपी, फावड़ा कुदाल आदि दान में देने को कहा था ताकि उससे इसे बनाया जा सके। उन्होंने दान भी दिया मगर अब कहा जा रहा है कि उनकी प्रतिमा तो चीन से बनकर आई है जो कि तांबे की है। 

बार-बार ‘मेक इन इंडिया’ की दुहाई देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए इससे ज्यादा हास्यास्पद बात और क्या हो सकती है कि दुनिया की सबसे ऊंची 182 मीटर की सरदार पटेल की मूर्ति (स्टेचू ऑफ यूनिटी) भारत की कंपनी लारसन एंड ट्यूबरो ने चीन में बनवाई। जो कि 25000 टुकड़ों में भारत लाई गई है और इसे यहां की चीनी कारीगर ही जोड़ रहे हैं। इसकी कीमत 3000 करोड रुपए आई है। आज अगर सरदार पटेल होते तो यह सब देखकर आज क्या सोचते? मेरा मानना है कि जिस व्यक्ति का कद पहले से ही इतना बड़ा हो उसको दुनिया की सबसे बड़ी तय लंबाई की मूर्ति बनाना तो उसके कद को सीमित कर देने जैसा होगा।

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