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मैट्रिक प्रणाली: गुलाम देशों ने ही चली

विवेक सक्सेना
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टीवी पर एक सीरियल आता था ' माई 600 पौंड वेट'। यह मौटे लोगों के बारे में था जोकि 600 पौंड या करीब 300 किलोग्राम के आसपास होते थे। तब यह सुनकर अजीब लगता था कि जब पूरी दुनिया में पौंड की जगह किलोग्राम का इस्तेमाल किया जा रहा है तो अमेरिका व ब्रिटेन जैसे देशों में पौंड व मील में गणनाएं क्यों की जा रही है? दरअसल 20 मई 1875 को फ्रांस में 60 देशों ने इंटरनेशनल ब्यूरो ऑफ वेट एंड पेजर्स की स्थापना की थी। इसे उस समय वीआईपीएस के नाम से जाना जाता था। इसका काम अलग-अलग चीजों के लिए सात मानकों की इकाई तय करना था। 

इस संगठन ने हमें लंबाई के लिए मीटर, भार के लिए किलोग्राम, समय के लिए सेकेंड, करेंट के लिए एपियर, तापमान के लिए सेंटीग्रेड, पदार्थ की यंत्र के लिए मोल व प्रकाश की तीव्रता के लिए केंडेला इकाइयां दी। ब्रिटेन के अधीन होने के कारण भारत में नवजात शिशु के स्वेटर बनाने वाली ऊन का वजन पौंड में नापा जाता था। वह आज तक जारी है। एक पौंड 0.45 किलोग्राम के बराबर होता। पानी की मात्रा गैलन में की जाती थी। एक गैलन में 3.78 लीटर पानी होता है।  पेट्रोल के हिसाब को बोलचाल की भाषा में गैलन में ही बताया जाता था। बाद में कच्चे तेल के धंधे में बैरल इकाई का इस्तेमाल किया जाने लगा। आज दुनिया में कच्चे तेल का भाव बैरल में मापा जाता है। एक बैरल में 159 लीटर तेल आता है। आजादी के पहले देश में सेर, छटांक, तोला, माशा, रत्ती में सामान को तोलकर बेचा जाता था। सुनार व औषधि निर्माता तोला, माशा, रत्ती में अपने बहुमूल्य उत्पाद को तौलते थे। तब लंबाई का गज, मील, कोस, गज व फुट में माप होता था।

आजादी के बाद भारत में 1955 से 1962 के बीच इंटरनेशनल सिस्टम ऑफ यूनियन अपनाया गया। भारतीय संसद ने दिसंबर 1956 में स्टैंडर्स ऑफ वेट्स एंड मेजर्स एक्ट पारित किया जोकि 1 अक्तूबर 1958 से लागू हुआ। इससे पहले 1955 में संसद ने इंडियन क्वाइनेज एक्ट पारित किया जिसके तहत देश में दशमलव सिक्के बनाए गए थे। यह अप्रैल 1957 से लागू हुए। इसके तहत रुपए में 100 पैसे होते थे जबकि एक रुपए में 16 आने व एक आना छह पैसे का होता था। अप्रैल 1962 तक दोनों ही सिस्टम लागू रहे। 

मैट्रिक सिस्टम लागू करने के कारण सरकार को अपने बांटों से लेकर हिसाब-किताब व शिक्षा की किताबों तक में बदलाव करने पड़े। भारत में उसके शासक रहे ब्रिटेन की तुलना में कही जल्दी परिवर्तन आ गया। इसकी एक बड़ी वजह बड़ी तादाद में लोगों का अशिक्षित होना व बड़े लोगों द्वारा ब्रिटिश प्रणाली का व राजा-रजवाड़ो द्वारा स्थानी इकाईयों जैसे बीघा, तोला मशा रत्ती, गज आदि का इस्तेमाल करना था। 

तमाम एशियन व अफ्रीकी देशो ने भारत को अपना आदर्श मानते हुए उसका अनुसरण किया। दिल्ली स्थित नेशनल फिजिकल लेबोट्ररी ने इनके मानक व पैमाने तैयार किए। इससे पहले भारत में 1870 का इंडियन वेट्स एंड मेजर्स एक्ट लागू था जोकि ब्रिटिश इंपीरियल सिस्टम द्वारा इस्तेमाल में लाया जाता था। भारत में पीएन सेठ ने इंडियन डेसीमल सोसायटी बनाई। इसमें डा एचएल राय, डा एलके मित्रा, पीसी महालनबीस सरीखे विद्वान शामिल थे। उन्होंने पुरानी प्रणाली को दफनाने के लिए अखबार व पत्रिकाओं में जमकर लेख दिए। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हमारे नेता यह परिवर्तन करने से आंशकित थे।  उस समय देश में 140 तरह के मानक थे। हमारे 30 तरह के कैंलेडर में एक कैंलेडर जिसे 500 साल पहले तैयार किया गया था एक महीना 232 दिन का होता था। अतः सरकार ने रुपए, आना, यार्ड की जगह  पैसा लागू किया। अखबारों में इनके परिवर्तन की प्रणालियां प्रकाशित हुई। सरकार ने 610 लाख नए पैसे तैयार करके बाजार में भेंजे। अगर किसी को 36 पैसे का भुगतान करना होता तो वह एक चवन्नी 25 पैसे व 11 नए पैसे देता जोकि एक आना नौ पाई के बराबर होते थे। तब हालात यह थे व रुपए का मूल्य इतना ज्यादा होता था कि कोलकत्ता के आधे पैसे की किराए में बढ़ोतरी के कारण लोगों ने बस व ट्रक में आग लगा दी। 

कानपुर में माताओं को लगता था कि नए पैसे बच्चे आसानी से निगल जाते हैं व उनके लिए यह बहुत बड़ा खतरा है। इन्हें लोकप्रिय बनाने में सिनेमाघरों ने पूरा साथ दिया व मिस इंडिया व बदला जमाना फिल्मों में एसडी बर्मन ने खुश है जमाना आज पहली तारीख है व पांच रुपए बारह आना सरीखे गानों से इस प्रणाली को चर्चित बनाया। अहम बात तो यह है कि जहां एक और आज भी भारत समेत दुनिया के तमाम देशों ने नापने तौलने या ताप की गणना के लिए मैट्रिक प्रणाली का उपयोग किया जा रहा है वहीं अमेरिका व ब्रिटेन सरीखे देशों में इन्हें अपनाने का जबरदस्त विरोध होता आया है व परिणाम स्वरूप ये आज भी वहां गणना में है। आप अगर आज भी अमेरिका में किसी को किसी जगह के बारे में पूछे तो वह बताएगा कि वह कितने मील दूर है। अंततः अमूक चीज कितने पौंड का है। अमेरिका में आज भी नापतौल की जो प्रणाली चली आ रही है उसे इंपीरियल (ब्रिटिश) सिस्टम कहते हैं। इनकी वजह यह है कि ब्रिटिश समुदाय ने 16वीं से 19वीं शताब्दी के बीच दुनिया के विभिन्न हिस्सो पर राज किया। जब अमेरिका को ब्रिटेन से आजादी मिली तो तत्कालीन सरकार ने मैट्रिक सिस्टम की लोकप्रियता के बावजूद इंपीरियल सिस्टम को बनाए रखने का फैसला किया। आज भी अनेक देशों में यह व्यवस्था चल रही है।  इसके अनुसार 1 मील 1.6 किलोमीटर के बराबर व तीन फुट 1 गज के बराबर होता है व एक पौंड 454 ग्राम के बराबर होता है। अमेरिकी तापमान को सेंटीग्रेड में नही बल्कि फॉरेनहाइट में नापते हैं। उनका कहना है कि इसकी वजह यह है कि इसे सुनना अच्छा लगता है। 70 फारेनहाइट तापमान का मतलब है कि बाहर 21 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान है।

मगर लंबे अरसे बाद अब फिर किलोग्राम को नापने के लिए नई तरीके का इस्तेमाल किया जाएगा। किलोग्राम को प्लेटिनम से बने क सिलेंडरनुमा बार के वजन से परिमाणित किया जाता है जिसे 'ली ग्रेंड के' कहा जाता है। यह खास चीज पेरिस में बीआईपीएम में (1889) से बंद की गई है। प्रदूषण व अन्य कारणों के चलते इस बंद वस्तु के द्रव्यमान के माप में कुछ बदलाव आ रहा है। कुछ साल पहले इसमें कुछ माइक्रोग्राम का अंतर आया था। हालांकि यह अंतर बहुत मामूली था। पर वैज्ञानिक दृष्टि से इस बदलाव को बहुत अहम माना गया क्योंकि वे बहुत सटीक माप ले लिया करते थे।  अतः फ्रांस में वेट एंड मेजर्स पर एक बड़ा सम्मेलन आयोजित किया गया। नई माप के मुद्दे पर 50 देशों के वैज्ञानिक एकत्र हुए। मौजूदा किलोग्राम को एक भौतिक वस्तु के रूप में परिभाषित किया जाता है मगर अब उसे किब्बल या वाट बैलेंस का उपयोग करके नापा जाएगा। यह एक ऐसा उपकरण है जो कि यांत्रिक और विद्युत चुंबकीय ऊर्जा के जरिए किलो के भार की गणना करता है। अब किलोग्राम को प्रदूषण व घर्पण से प्रभावित न होने की परिभाषा बदली जाएगी और न ही इसे कोई नुकसान पहुंचेगा। अनुमान है कि नया किलोग्राम मई 2019 तक आ जाएगा। 

यहां याद करा दे कि किलोग्राम को मापने वाली वस्तु को फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक तिजोरी में 129 साल से बंद रखा गया है। सिलेंडर की इस वस्तु को ली ग्रेंड के कहते हैं इसमें 90 फीसदी प्लेटिनम व 10 फीसदी इरीजियम धातु है। यह हवा के संपर्क में आने पर उसके अणुओं को न सोखे पर अपने परमाणु न खोए इसलिए इसे बंद रखा गया है। इसकी तिजोरी पर लगे ताले की तीन अलग-अलग देशों में रहने वाले लोगों के पास है। ऐसा माना जा रहा है कि समय नापने की इकाई सेकेंड व लंबाई नापने की इकाई मीटर में भी बदलाव किया जा सकता है। कोई कुछ भी कहे पर असली समस्या पैमाने व इकाई बदलने की नहीं बल्कि नापतौल में इनके जरिए होने वाली हेरा-फेरी की है।

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