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कश्मीर में अंधेरा बढ़ाता रोशनी एक्ट

विवेक सक्सेना
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सत्यपाल मलिक व मेरी दोस्ती बहुत पुरानी है। जब 1980 में उनसे दोस्ती हुई तब वे राजनीति में चौधरी चरणसिंह के साथ बढ़ रहे थे और मैंने दिल्ली आ कर पत्रकारिता की शुरुआत की थी। उनकी पत्नी प्रोफेसर इकबाल मलिक काफी मिलनसार थी। शादी के बाद उन्होंने मुझे व मेरी पत्नी को खाने पर बुलाया। एक बार जब मैंने गृहशोभा के लिए उनका इंटरव्यू लिया तो उन्होंने बताया कि वे मेरठ में सत्यपाल मलिक के साथ पढ़ती थीं। वे सिख थी व सतपाल मलिक जाट थे। 

नजदीक आने की वजह बताते हुए उन्होंने कहा था कि मैं पढ़ाई में अव्वल थी और सत्यपाल मारपीट में अव्वल थे। अतः दो अव्वल लोगों की दोस्ती हो गई। पर पिछले कुछ दशकों से उनसे मिलना नहीं हुआ। यह जानकर दुख हुआ कि इकबाल मलिक व सत्यपाल मलिक का तलाक हो गया। इन दिनों वे पुनः चर्चा में हें। कभी चौधरी चरणसिंह के काफी निकट हुआ करते थे। मोदी के इतने करीब पहुंच  गए कि उन्होंने इस जाट नेता को विवादास्पद राज्य जम्मू कश्मीर का राज्यपाल बना दिया। 

पहले उन्होंने राज्यपाल शासन लगा कर धमाका किया और फिर उनके इस बयान ने हैरानी बनाई कि अगर मैंने ऐसा करने के पूर्व दिल्ली में पूछा होता तो वहां से मुझे कुछ और ही करने को कहा गया होता। हालांकि बाद में इसके राजनीतिक परिणामों को बूझते हुए उन्होंने अपने इस बयान से कन्नी काटते हुए सारे विवाद के लिए पत्रकारों को दोषी ठहरा दिया। हालांकि इसके बाद भी वे अपनी आदत के मुताबिक चुप नहीं बैठे हैं। पहले उन्होंने जम्मू एवं कश्मीर बैंक का राष्ट्रीयकरण किया और फिर उनकी अगुवाई वाली प्रदेश प्रशासनिक परिवार (स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव काउंसिल) ने जम्मू कश्मीर स्टेट वैंड्स (वैटिग ऑफ ओनरशिप टू द आक्योपेंट्स एक्ट 2001) को खत्म कर दिया। 

इसकी वजह उन्होंने यह बताई कि यह अधिनियम अपने अपेक्षित लक्ष्यों को हासिल करने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। इन प्रावधानों के दुरुपयोग की भी तमाम शिकायतें मिली थी। इस कानून को रोशनी एक्ट भी कहते हैं। इस कानून को 1990 में फारूख अब्दुल्ला सरकार ने बनाया था। तब उन्होंने सोचा था कि वह राज्य सरकार की 20 लाख करनाल जमीन को उसमें कब्जेदारे को सौंप कर उनसे बाजार दर पर 25,000 करोड रुपए वसूलेंगे। इस राशि से राज्य में बिजली निर्माण योजना चालू की जाएगी।  इसके लिए इस कानून का नाम रोशनी रखा गया था। 

इसे सफलता पूर्वक लागू नहीं किया जा सका। नेताओं ने अपने लिए इसका उपयोग व दुरुपयोग किया। सन् 2005 में तत्कालीन मुफ्ती मोहम्मद सईद की सरकार ने इसके लिए कट ऑफ ईयर बढ़ा कर 2005 कर दिया। वहां पीडीपी व कांग्रेंस की मिली-जुली सरकार थी। अतः जब अपनी बारी से कांग्रेंस की गुलाम नबी आजाद सरकार सत्ता में आई तो उसने एक बार फिर कट ऑफ ईयर को बढ़ाकर 2007 कर दिया। इसका मतलब यह कि इस वर्ष तक जिन लोगों का सरकारी जमीन पर कब्जा था उन्हें उसका मालिकाना हक दे दिया जाएगा। गुलाम नबी आजाद की सरकार काफी उदार निकली। 

उसने फैसला किया कि जिन लोगों का जमीन पर कब्जा है उन्हें इसका मालिकाना हक महज 100 रुपए 1 कनाल की दर से दे दिया जाएगा। यह राशि दस्तावेजी शुल्क के रूप में ली जानी थी। जैसा कि सरकारी योजनाओं में होता है इसमें भी जमकर गड़बड़ी हुई। कंट्रोलर एवं आडीटर जनरल ने 2014 में अपनी रिपोर्ट में कहा कि जहां सरकार ने यह जमीन सौंप कर 25,000 करोड रुपए हासिल करने का लक्ष्य रखा था। वहीं उसे इस मद में सिर्फ 75 करोड़ रुपए ही मिले। इससे यह कानून बनाने का सारा उद्देश्य ही समाप्त हो गया। उसने कहा कि नेताओं और धनवानों को फायदा पहुंचने के लिए मनमाने तरीके से जमीन के दाम तय किए गए। बड़ी तादाद में लोगों ने जमीन पर गैर कानूनी तरीके से कब्जा कर लिया। 

गुलमर्ग सरीखे पर्यटक इलाके में तो बड़ी तादाद में बहुमूल्य जमीन ऐसे लोगों को दे दी गई जोकि कानूनन इसके पात्र ही नहीं है। राज्य के सतर्कता आयोग ने बड़ी तादाद में इस तरह की धांधलियों के दोषी लोगों के खिलाफ मामले दर्ज करवा कर अपनी जांच शुरू कर दी। जैसा कि सरकारी विभागों व उनकी जांच में होता है। सतर्कता संगठन ने मार्च 2015 तक पांच मामलों की जांच पूरी की व दो दर्जन अफसरों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उन्हें प्रावधानों का बेजा इस्तेमाल करने का दोषी बताते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए राज्य सरकार से अनुमति मांगी। इनमें तीन डिप्टी कमिश्नर भी थे। 

मजेदार बात यह है कि तीन साल बीत जाने के बाद भी राज्य सरकार ने किसी के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की अनुमति नहीं दी। पिछले माह जम्मू के एक वकील अंकुर शर्मा ने एकजुट जम्मू नामक संगठन की ओर से इस मामले को राज्य हाईकोर्ट में उठाते हुए इस कानून को रद्द कर देने के लिए याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने नवंबर 2018 में इस योजना का लाभ उठाने वाले सभी लोगों को अपनी जमीन बेचने या उसे किसी और को स्थांतरिक किए जाने पर रोक लगा दी। उसने अपनी देखरेख में इस घोटाले की जांच शुरू की। इसके बाद अंकुर शर्मा ने राज्यपाल से इस कानून को वापस लेने की मांग की। उनका आरोप था कि धार्मिक अनुपात बिगाड़ने व जेहादी युद्ध को बढ़ावा देने के लिए रोशनी अधिनियम का दुरुपयोग किया जा रहा है। 

उन्होंने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती पर हिंदू बाहुल्य जम्मू का यह अनुपात बिगाड़ कर वहां इस्लामी न्यासी ताकतो को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। इस कानून के रद्द होने के बाद राज में कानून व्यवस्था के लिए एक और खतरा पैदा होने की आशंका बढ़ गई है। इस राज्य में लोगों से पुनः जमीन हासिल कर पाना सरकार के लिए आसान साबित नहीं होगा व यह उसके लिए समस्याएं ही पैदा होगी।

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