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सफाई से छत्तीस का आंकड़ा

विवेक सक्सेना
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जब एसएमएस देखा तो पता चला कि अपने परिचित कमल यादव की माताजी का स्वर्गवास हो गया  है। उनसे काफी लगाव था अतः तय किया कि अगले दिन उनके अंतिम संस्कार में हिस्सा जरूर लूंगा। ड्राइवर को जल्दी आने के लिए कहा व सुबह 8 बजे संतनगर स्थित शमशान भूमि के लिए निकल गया जोकि घर से 18-20 किलोमीटर दूर दिल्ली के करोलबाग इलाके के साथ में है। इस जगह पर पहली बार गया था। चूंकि वहां पहली बार गया था इसलिए कमल यादव को तलाशने के लिए उसके अंदर कई चक्कर काटे। 

वहां एक बहुत बड़ा हाल था व 20-25 स्थान शव दाह के लिए थे। पूरी जगह काफी साफ सुथरी व नई थी। हर जगह संगमरमर टाइले व प्लास्टिक की छते व भजन सुनाने के लिए माइक्रोफोन लगाए गए थे। लोगों के बैठने के लिए पर्याप्त जगह तो थी ही एक महिला के नाम का बोर्ड भी लगा था जिस पर उसके द्वारा सौर्य उर्जा से चिता जलाने वाला शवगृह बनाए जाने के अलावा वहां मुफ्त में कंडे दिए जाने का भी उल्लेख था। वहां ज्यादातर दो लोगों के नामों के बोर्ड लगे हुए थे जिन्हें पढ़कर लगता था कि वहां जो कुछ भी है सब उनका ही किया हुआ है। 

पूरी जगह इतनी शांत व साफ-सुथरी थी कि मैं उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था। ऐसा लगता था कि हम लोगों के आने के बाद वह जगह गंदी हो जाएगी। अस्थियां रखने के लिए अलग से प्रबंध था। सच कहूं तो मैं दिल्ली के वीवीआईपी श्मशान तट गया हुआ हूं पर मैंने वहां भी इतनी स्वच्छता नहीं देखी। आईएसबीटी स्थित शमशान में दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए मदनलाल खुराना भले ही शवों को नहलाने के लिए गंगा का पानी ले आए हो मगर वहां आज भी सफाई का अभाव है। 

कई जगह तो शमशानों पर कुत्ते घूमते रहते थे। वहां स्वच्छता का दूर-दूर तक कुछ लेना-देना नहीं है। वहां जा कर यही लगता है कि हम लोगों ने भी एक दिन वहां आना है मगर वहां से बाहर निकलते ही हम सब कुछ भूल जाते हैं व उसके सुधार के लिए कुछ नहीं करते। इसकी वजह मैं अपन हिंदुओं के डीएनए को मानता हूं जिसमें स्वच्छता का पूर्णतः अभाव है। 

मेरा मानना है कि हम लोगों के खून में ही सफाई रखना नहीं है। एक समय था जब घर में सबसे गंदा स्थान शौचालय को माना जाता था। हम लोग उसे सबसे ज्यादा गंदा भी रखते थे। तब वहां टाइल्स आदि लगाने का चलन नहीं था। वह घर के कोने के बने काफी छोटे होते थे। मुझे याद है कि शौचालय व स्नानघर साथ-साथ होते थे। दोनों के बीच जो सामान्य दीवार होती थी उसकी ऊंचाई पर करीब 10x10 इंच का रास्ता खुला छोड़ दिया जाता था जिसमें एक जीरो वाट का बल्ब लगा होता था जो कि रात को अंधेरे में दोनों जगहों को प्रकाशित करता था। उसकी रोशनी कितनी होगी इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। 

जिन घरों में सीवर नहीं था उनके शौचालयों से तो बदबू आया करती थी। गलियो की हालात भी बहुत ज्यादा खराब होती थी। लोग हर सुबह बच्चों को वहीं बैठा देते थे व गलियों से गुजरते समय गंदगी की बदबू लगातार आती रहती थी। तब सफाई कर्मियों को हर घर से पकी-पकाई दो रोटी दी जाती थी। इसकी वजह यह थी कि गंदगी का काम करते हुए उन्हें नहाने या खाना पकाने का समय ही नहीं मिलता था।

आगरा में एक बार शादी में जाने पर मैं जिस धर्मशाला में रूका वह बहुत अजीबो-गरीब थी। उसकी पहली मंजिल पर शौचालय था व सीट व धरती पर रखी बाल्टी के बीच में कुछ भी नहीं था। जब आप हल्के होते तो कुछ सेकेंड बाद नीचे किसी चीज के गिरने की छपाक की आवाज आती। तब शौचालय में धुलाई करने के लिए रखे गए पानी के बर्तन काफी गंदे होते थे। एक बार ग्वालियर में अपने पब्लिक स्कूल के सौ दिवस पूरे होने पर दिल्ली से ले जाए गए पत्रकारों को दिवंगत माधवराव सिंधिया ने बताया था कि बचपन में हम लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या शौचालय की ही होती थी। 

हमारे शौचालयों में रखे डब्बे काफी पुराने व खराब होते थे। उनमें छेद होते थे जिस कारण उनमें पानी बेहद मुश्किल से भर पाता था और हम लोगों का सारा ध्यान उसके भरने व पानी के कारण गीला होने वाले फर्श पर लगा रहता था। उन्होंने तब यह जानना चाहा था कि वो हालात बदले क्या नहीं यह विचार तो उस व्यक्ति के थे जिसने ग्वालियर स्थित घर में आज भी चांदी के विशाल घड़े रखे हुए हैं जिनमें उनके दादा अपनी विदेश यात्रा के दौरा गंगाजल भर कर ले गए थे ताकि समुद्र यात्रा के दौरान व इंग्लैंड में गंगा जल से नहाकर पवित्र हो सके। अब जब अपने टायलेट को देखता हूं तो काफी सुकून मिलता है क्योंकि आज के युग में किसी भी व्यक्ति को घर में टायलेट पर ही सबसे ज्यादा खर्च किया जाता है। ताकि उसमें अच्छे टाइल्स, नल, सीटे, वाश व एग्जास्ट फैन लगाकर सुंदर रखा जा सके।

आज भी मेरा मानना है कि स्वच्छता हमारे लिए महत्व नहीं रखती है। संसद में अपनी सीट के आसपास से लेकर उसके गलियारो तक में लोग थूक देते हैं। मौका मिलते ही पान-मसाला खाकर थूकना बेहद आम बात है। एक बार किसी ने लिखा था कि इस देश में हर एक खाने का सामान है व हर जगह थूकने व पेशाब करने की जगह है। सरकारी शौचालयों के अंदर जाने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यही हालात कूड़ाघरों का है। हमारी सोच भी एकदम निराली है। कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान सड़क के किनारे जो शौचालय बनाए गए उन पर ताले डाल दिए गए ताकि लोग उनका इस्तेमाल न कर सकें। घरों में माताएं बच्चो की नाक व मुंह अपने दुपट्टे से पोछ देती है व फिर उसी से खाने की थाली या प्लेट पोछ देती है। एक  अंग्रेंजी के अखबार में तो इस आशय की श्रृंखला छप गई कि हमारे देश में कितने गंदे हालातों में प्लास्टिक सर्जरी के आपरेशन होते हैं।

आज भी गोलगप्पे वाले अपने कीचड़ भरे नाखूनो से गोलगप्पा फाड़ कर उसमें पानी भरकर लोगों को खिलाते हैं। अपने इतने छिपे अनुभव से मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि हमारा व गंदगी का 36 का आंकड़ा है। हम हिंदू तो दीपावली सरीखे पर्व के अगले दिन पूजा करते है जिसमें घर के कूडे को बाहर निकाल कर उस पर दीप जलाया जाता है। 

जिस देश में आजादी के इतने दशकों बाद भी विज्ञापन देकर सरकार को यह बताना पड़े कि शौच जाने के बाद साबुन से हाथ धोने चाहिए व देश में सफाई अभियान चलाने के लिए खुद प्रधानमंत्री को झाड़ू हाथ में लेनी पड़े वहां सफाई के लिए सिर्फ अपना सिर ही मारा जा सकता है। ऐसे में शमशान जैसी जगह पर स्वच्छता देखकर हतप्रभ रह जाना बहुत अहम बात है। 

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