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समस्या बनती एटीएम मशीन

विवेक सक्सेना
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मैं आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल और तकनीक क्रांति का विरोधी नहीं हूं। फिर भी मेरा मानना है कि जब तक हम लोग मानसिक और व्यवस्थित रूप से इन परिवर्तनों के लिए तैयार नहीं हो जाएं तो इन क्षेत्रों में अति उत्साह नहीं दिखाना चाहिए। जब दो साल पहले देश में नोटबंदी हुई थी तो उस दौरान सरकार ने यह साबित करने की कोशिश की थी कि हमारे देश में समोसा खरीदने तक का काम पेटीएम के जरिए किया जा रहा है। 

फिर सरकार ने कुछ इस तरह के क्रांतिकारी कदम उठाए जिनसे लगा कि अब इस देश में सब कुछ मशीनों के जरिए ही होगा। ऐसा लगा कि चैक बुक का इस्तेमाल करने वाले लोग जिनमें कि मैं भी शामिल हूं को लोग आधुनिक युग का अनपढ़ मानेगें। ऐसे नियम बनाए गए मानों भविष्य में किसी को बैंक जाने की जरूरत हीं नहीं पड़ेगी और एक बैंक के एटीएम से हम लोग किसी भी बैंक में जमा राशि निकाल सकेंगे। 

बहरहाल दूध देने वाली गाय की तरह पैसा देने वाली मशीन को ऐनी टाइम मनी (या आटोमेटेड टैलर मशीन) कहते हैं। जहां एक और इनका उपयोग बढ़ाए जाने के दावे किए जा रहे हैं वहीं यह सेवा प्रदान करने वालों का दावा है कि इस संबंध में नियमों में जो बदलाव हुए हैं उनके कारण उन्हें होने वाला घाटा बढ़ा है। इसे देखते हुए वे घाटे का व्यापार करने की जगह अगले साल 31 मार्च को अपने आधे एटीएम या 2.38 लाख मशीनें बंद कर देंगे। 

यह तो तब हो रहा है जब सरकार विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च करके लोगों से इनका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करने की बात कह रही है। मगर इनकी सेवा का विस्तार किया जाना तो दूर रहा उनकी संख्या में 50 फीसदी कटौती की जा रही है। इसकी सेवा देने वाली कंपनियों का कहना है कि वे अपना काम तभी जारी रख सकती है जबकि बैंक सरकारी नियमों के कारण बढ़े हुए खर्च का बोझ उठाने के लिए तैयार हो। 

इस साल अप्रैल माह में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने एक अधिसूचना जारी करके कहा था कि एटीएम में नकदी जमा करवाने व वहां पैसा पहुंचाने वाली कंपनियेां की आर्थिक हैसियत कम-से-कम 100 करोड़ रुपए होनी चाहिए। अन्य बातों के अलावा उनके पास 300 गाडियां होनी चाहिए। नकदी की लूट व हेराफेरी बचाने के लिए बैंको के ऐसे विशेष कैसेट बॉक्स इस्तेमाल करने चाहिए जिनमें ताला लगाया जा सके व उनके विभिन्न मूल्यों वाले नोट रखे जा सके व इन्हें आसानी से रखा व निकाला जा सके। 

बैंको से हर साल कम-से-कम अपने एक तिहाई एटीएम में यह बदलाव करने को कहा गया ताकि 31 मार्च 2021 तक इसे बदला जा सके। इस साल अगस्त माह में गृह मंत्रालय ने अधिसूचना जारी की कि सुरक्षा कारणों से रात नौ बजे के बाद शहरों में कैश वैन रुपए बदलने नहीं जाएगी व वे एक बार में 5 करोड़ रुपए से ज्यादा नहीं ले जाएगी। पैसा ले जाने वाली गाडि़यों के सुरक्षा अलार्म, जीएसएम आधारित आटो डायलर्स, मोटर से चलने वाली सपरन व ट्यूबविहीन टायर होने चाहिए। हर गाड़ी में कम-से-कम दो सुरक्षा सैनिक होने चाहिए।  इस उद्योग के सूत्रों के मुताबिक हर एटीएम में पूरे महीने यह पैसा जमा करने की लागत 9 से 10,000 रुपए तक आएगी अगर हमने तमाम मंत्रालयों के निर्देशों को लागू किया तो हमारी लागत हर माह 50 फीसदी या 4.5 से 5 हजार रुपए की बढ़ जाएगी। अगर बैंक यह खर्च उठाने को तैयार नहीं होते तो आधे से ज्यादा कंपनियां व उनके एटीएम बंद हो जाएंगे। इस समय किसी दूसरे बैंक का पैसा निकालने के लिए जिस बैंक का एटीएम इस्तेमाल किया जाता है उसे इसके लिए 15 रुपए मिलते हैं। जबकि एटीएम सेवा देने वालो को हर बार पैसा निकालने पर 8 से 9 रुपए तक मिलते हैं। 

उनका कहना है कि यह एक घाटे का सौदा है। उनकी मांग है कि किसी दूसरे बैंक का कार्ड इस्तेमाल किए जाने पर यह शुल्क 15 से बढ़ाकर 24 रुपए कर दिया जाए। सरकारी बैंक इसके लिए तैयार है। उन्होंने एक बार यह राशि बढ़ाकर 25 रुपए कर दी थी मगर ग्राहकों के विरोध के चलते उन्हें इसे घटाकर पुनः 15 रुपए करना पड़ा। जबकि रिजर्व बैंक का भी कहना है कि वे यह शुल्क बढ़ाए जाने के हक में नहीं है। जबकि जवाब में एटीएम सेवा प्रदाता कहते हैं कि अगर ऐसा है तो सरकार आए दिन हमारी लागत बढाने वाले नियम क्यों बनाती है?

 इन्हें कनाड़ा में एबीएम या आटोमेटेड बैंकिंग मशीन कहा जाता है। जिसके जरिए हम पैसा निकालने, जमा करने या उसे कहीं भेजने का काम करते हैं। इस समय पूरी दुनिया में 35 लाख मशीनें लगी हुई है। हालांकि आंकड़ें बताते है कि आस्ट्रेलिया में इनका इस्तेमाल घटता जा रहा है। आज भारत में इसे लेकर जितना विवाद बढ़ता जा रहा है इसका इतिहास उतना ही रोचक है। ब्रिटेन ने एड्रियान एथफोल्डन फरवरी 1962 में कार्ड और पिन नंबर का इस्तेमाल करके पैसा देने वाली मशीन ईजाद कर अपनी कंपनी डब्ल्यू एस एटकिंस एंड पार्टनर से उसका पेटेट करवाया था। वह इसी कंपनी में काम करता। 

उसकी कंपनी हर तरह की खोज के लिए अपने कर्मचारियों को दस शिलिंग देती थी। उसे भी इतने ही पैसे मिले। उसने इसका निर्माण तो पेट्रोल बेचने के लिए किया था मगर जल्दी ही इसका इस्तेमाल बैंको से पैसा निकालने के लिए किया जाने लगा। दावा है कि अमेरिका में इसका पेटेंट 1961 के ही सिटी बैंक ऑफ न्यूयार्क  द्वारा करवाया जा चुका था। वहां इसके लिए पैसे जमा करने का काम किया जाता था। वह तब पैसे बांटती नहीं थी। 

इतिहास बताता है कि नकदी देने वाली पहली मशीन 27 जून 1967 को लंदन में बर्कले बैंक में लगाई गई व वहां के हास्य कलाकार ने इसका उद्घाटन किया। तब पैसे निकालने के लिए कर्मचारी एक पेपर चैक देते थे व इसे मशीन में डालने पर पैसे निकलते थे। बाद में इसकी जगह कार्ड व छह संख्याओं वाले पिन नंबर का इस्तेमाल किया जाने लगा। 

आईबीएम व लायड बैंक ने 1969 में दुनिया के विभिन्न देशों में आपस में जुड़ी मशीनों की 6 मई 1968 को स्थापना की। समय के साथ-साथ इनमें बदलाव होते गए व इनकी तादाद बढ़ने लगी। दुनिया में सबसे ऊंचाई पर लगी एटीएम पाकिस्तान के खुंजेरब के पास है जोकि नेशनल बैंक ऑफ पाकिस्तान द्वारा 15397 फुट की ऊंचाई पर स्थापित की गई है। वह 40 डिग्री सेटीग्रेट तापमान में भी काम कर सकती है। वैसे आज भारत में जिस एटीएम मशीन को लेकर इतना हो-हल्ला हो रहा है उसका अविष्कार जॉन शेफर्ड बैरन ने किया था। वह 23 जून 1925 को शिलांग में पैदा हुआ था। उसके मां-बाप अंग्रेंज थे। उसके पिता विलफ्रेड शेफर्ड बैरन जोकि स्काटिश मूल के थे चिटगांव पोर्ट कमीशन में चीफ इंजीनियर थे। 

उसने अपनी अर्थशास्त्र की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी व द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह सेना में भर्ती हो गए। बाद में 1950 को उसने हीलारू नामक कंपनी में नौकरी की। एक दिन वे बैंक बंद होने के कारण अपने पैसे नहीं निकाल पाए तो वह टब में लेटे हुए हर समय पैसा मिलने के बारे में सोचने लगा। उसने सोचा कि जब हम हर समय मशीन के जरिए चाकलेट हासिल कर सकते हैं तो रुपए क्यों नहीं हासिल कर सकते व वह ऐसी मशीन का अविष्कार करने में जुट गए। उसने इस बारे में बर्कले बैंक के प्रमुख से बात की और उसकी मशीन बर्कले कैश जून 1967 में लंदन में लगाई गई। तब इस मशीन से एक बार में अधिकतम 10 पौंड ही निकलते थे जोकि उसके आविष्कार के मुताबिक एक सप्ताह के खर्च के लिए काफी होते थे। कोई कुछ भी कहे मगर मशीन हर चीज व हर समस्या का जवाब नहीं हो सकती क्योंकि वह खुद भी समस्याएं पैदा करती है।

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