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पटाखे कैसे हो सकते ग्रीन?

विवेक सक्सेना
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पहले रंगों के कारण त्वचा को होने वाले नुकसान का मुद्दा गरमाया था और अब सुप्रीम कोर्ट की नजर पटाखों के कारण फैलने वाले प्रदूषण पर है। सच कहूं पहले से ही प्रदूषण की सभी सीमाएं तोड़ने वाली दिल्ली में दीपावली के दौरान प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा बढ़ जाता है कि सांस तक लेने में दिक्कत होने लगती है। पहले 2016 में तीन बच्चों ने इस मुद्दे को लेकर पटाखों पर प्रतिबंध लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उसके बाद सर्वोच्च कभी न्यायालय ने पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया जिसने राजनीतिक संघर्ष का रूप लिया तो कभी अपने आदेश में ढील दे दी। 

अंततः उसने पर्यावरण मंत्रालय को तलब करके इस मामले में कदम उठाने को कहा। चंद दिन बाद पुनः दीवाली है और इस बार न्यायालय ने उस दिन दो घंटे तक ही पटाखें चलाने की अनुमति दी है। इस बार अदालत से लेकर सरकार तक सभी ग्रीन क्रैकर की बात कर रहे हैं। 

यह सुन कर मुझे बचपन की एक घटना याद आ जाती है जबकि देसी घी की मिठाई बेचने वाले एक नामी हलवाई से मेरे एक मित्र ने सवाल किया था कि लाला बर्फी, पेड़े, गुलाब जामून, रबड़ी, मलाई मिठाई क्या तुम मैदे से बनाते हो जो कि उसके देसी घी के होने का दावा कर रहे हो? खोये से बनने वाली इन मिठाइयों में तो वैसे ही देसी घी होता है। आज तक मैंने जितना पढ़ा है उसके बाद इसी निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि दुनिया में ग्रीन पटाखे जैसी कोई चीज नहीं होती क्योंकि ये तो रसायनों से ही बनते हैं। 

कहा जा रहा है कि ग्रीन या हरे पटाखे कम नुकसानदायी होते हैं व उससे कम धुंआ व रसायन निकलते हैं उनके फटने पर आवाज भी कम होती है। उन्हें ग्रीन क्रैकर इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनके रसायन ऐसे होते हैं जोकि पानी की बूंदे पैदा करते हैं। इससे धुंआ कम निकलता है और वे धूल सोख लेते हैं। इनसे नाइट्स आक्साइड व सल्फर आक्साइड सरीखी जहरीली गैसे कम निकलती है। 

यह तकनीक अभी विकसित ही की जा रही है। नेशनल एनवेराइमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट  व काउंसिल ऑफ साइंटीफिक एंड इडस्ट्रियल रिसर्च आठ सरकारी प्रयोगशालाओं के साथ मिलकर ग्रीन क्रैकर तकनीक विकसित कर रही है। इस पर तमाम वैज्ञानिक पिछले कुछ दिनों से काम कर रहे हैं। इस तकनीक के विकसित होने पर 65 लाख रुपए खर्च होंगे। अभी तक उन्होंने तीन तरह की तकनीक सेफ वाटर एंड एयर स्प्रिकलर (स्वास) सेफ थरमाडर क्रैकर (स्टार) व सेफ मिनिमल एल्यूमिनियम क्रैकर (सथल) विकसित की हैं। इसमें आमतौर पर प्रदूषण फैलाने वाले रसायनों जैसे एल्यूमिनियम बेरियम, पोटेशियम नाइट्रेट व कार्बन का या तो कम इस्तेमाल किया गया है अथवा उन्हें पूरी तरह से हटा दिया गया है। 

दावा है कि ये तीन तरह के पटाखे काफी तेज आवाज करते हैं। सरकार ने यह तकनीक पेट्रोलियम एंड सेफ्टी आर्ग्रेनाइजेशन (पीसी) को दी है जोकि इस बारे में नियम कानून तैयार करती है। एक बार उसकी अनुमति मिलने के बाद  पटाखे निर्माता साल भर की बिक्री के लिए उत्पादन शुरू कर देंगे जोकि बाद में बिक्री के लिए उपलब्ध बनाए जाएंगे। 

दावा है कि ये ग्रीन क्रैकर बिना किसी दिक्कत के मौजूदा फैक्ट‌रियो में बनाए जा सकेंगे। ई क्रैकर या इलेक्ट्रानिक क्रैकर छोड़ने पर आवाज आती है व रोशनी होती है। इन पर सीएसआईआर व सीरी पिलानी राजस्थान से रिसर्च करा रहे हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्री स्पष्ट कर चुके हैं कि अभी ग्रीन पटाखे बाजार में उपलब्ध करवाने में कम-से-कम एक साल लग जाएगा। 

हालांकि देश के सबसे बड़े पटाखा निर्माता राज्य तमिलनाडु, तमिलनाडु फायरवर्क्स एंड एमोरेस मैन्यूफक्चरिंग एसोसिएशन के महासचिव के मरियप्पन का कहना है कि हमारी दुनिया में ग्रीन पटाखों जैसी कोई चीज नहीं होती है। उनके मुताबिक पानी के इस्तेमाल से बनने वाले पटाखों के निर्यात के कारण फैक्टरियो में धमाके होने की आशंका ज्यादा बढ़ेगी। ग्रीन पटाखों में एल्यूमिनियम, बेरियम की जगह मैग्नीशियम का इस्तेमाल किया जाता है जिससे पानी सोखने के कारण विस्फोट होता है व रोशनी निकलती है। मालूम हो कि पीसी ने अभी तक बेरियम के इस्तेमाल पर रोक नहीं लगाई है। 

एक और समस्या यह है कि इस रिसर्च पर सीएसआईआर 65 लाख रुपए खर्च कर रही है। इसमें से 10 लाख रुपए तमिलनाडु की एक बहुत बड़ी निर्माता कंपनी कालीस्तनी फायर वर्क्स के मलिक सेल्वीराजन ने दिए हैं। वे कहते हैं कि अगर सीएसआईआर ने यह तकनीक सबको उपलब्ध करा दी तो वह अपना पैसा कहां से निकालेगा? दीवाली आ गई है और पटाखों को लेकर सुप्रीम कोर्ट व सरकार द्वारा की गई कार्रवाई फुस्स होती नजर आ रही है।

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