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मदनलाल खुरानाः शेर और पिंजरे में!

विवेक सक्सेना
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कहा जाता है राजनीति बेहद निर्मम होती है और उसमें भावनाओं का कोई सम्मान नहीं होता है। तभी नेताओं से भावुक होने की कल्पना भी नहीं की जाती। आज जब मदन लाल खुराना दुनिया में नहीं रहे तो ये दोनों बातें याद आ गई। यह वे नेता थे जोकि कभी दिल्ली में भाजपा के शेर कहे जाते थे और शहर में उनकी तूती बोलती थी। 

मदनलाल खुराना की गिनती उन शरणार्थी पंजाबियों में की जा सकती है जिन्होंने लंबे अरसे तक दिल्ली पर राज किया और अपने जीवन के अंतिम दिनों में उनको लगभग भुला दिया गया। उन्होंने आखिरी कुछ साल लगभग गुमनामी में बिताए। वे महज 12 साल की आयु में देश का विभाजन होने पर अपने परिवार के साथ पाकिस्तान के लायलपुर अब हौस्लाबाद इलाके में दिल्ली आए थे व नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने स्थित पहाड़गंज में रहने लगे। 

उनके पिता की कबाड़ी की दुकान थी और वह कांग्रेंसी नेता अजय माकन के बाबा की कोयले की टाल के पास में ही थी। बाद में वे शरणार्थिंयों के लिए बनाई गई कालोनी कीर्तिनगर में जाकर बस गए। वहीं जीवन बिताया। उन्होंने दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से बीए किया और फिर अर्थशास्त्र में एमए करने के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय चले गए। उन्होंने पत्रकारिता से अपनी शुरुआत की। 

बुजुर्ग पत्रकार मनमोहन शर्मा जब हिंदुस्तान समाचार में ब्यूरो चीफ थे तो उनके अधीन रिपोर्टर हो गए। वे बताते हैं कि यह वह समय था जबकि बलराम मधोक जनसंघ पर हावी थे। उस समय संघ के प्रमुख गुरूजी थे व उसमें नंबर दो वसंत ओक हुआ करते थे जोकि सरदार पटेल के काफी करीबी माने जाते थे। खुरानाजी ओक के काफी करीबी थे। उनकी हैसियत व सक्रियता के कारण उन्हें भाजपा में दिल्ली का शेर कहा जाने लगा। वे बहुत भावुक व्यक्ति थे और अपने परिचितो का बेहद सम्मान करते थे।

जब माधवराव मूले संघ के राजनैतिक कर्ता-धर्ता बने तो उन्होंने खुराना को ज्यादा अहमियत दी। यह वह समय था जब दिल्ली की राजनीति में शरणार्थी पंजाबियों की तूती बोलती थी। तब भाजपा में मदन लाल खुराना, विजय कुमार मल्होत्रा व केदारनाथ साहनी की तूती बोलती थी। हालांकि केदारनाथ साहनी जम्मू से थे। वहीं कांग्रेंस में ललित माकन, हरकिशनलाल भगत व सज्जन कुमार सरीखे नेताओं का जलवा था। 

वे बताते हैं कि उनमें कांग्रेंसियों के तमाम अच्छे गुण शामिल थे और वे हमेशा लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहते थे। उन्होंने नगर निगम से अपनी राजनीति शुरू की व फिर मेट्रोपालिटन काउंसिल में विपक्ष के नेता बने। वे दिल्ली को बेहद प्यार करते थे व डेसू व दिल्ली नगर निगम में विशेष दिलचस्पी लेते थे। जब दिल्ली के विधानसभा चुनाव हुए तो वे 1993 में यहां के पहले भाजपाई मुख्यमंत्री बने। वे मेट्रो दिल्ली निगम के अध्यक्ष बने व कांग्रेंस के जगप्रवेश चंद की तरह मेट्रो उनका सपना था। 

एक बार जब वे घूमने के लिए जर्मनी गए तो वहां की सड़कों पर लगे साइनेज बोर्ड देख इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने दिल्ली आते ही यहां की सड़कों पर तमाम साइनेज बोर्ड लगा दिए। उन्हें एक बात बहुत पसंद आई कि वहां रास्ता पूछने के लिए आम आदमी को रोक कर पूछना नहीं पड़ता था। वे पत्रकारों का बहुत सम्मान करते थे और उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद इंडियन एक्सप्रेस के साथ स्थित खाली जमीन को विकसित करवा कर वहां एक पार्क बनवाया और बहादुरशाह जफर मार्ग पर टाइम्स ऑफ इंडिया के सामने स्थित सबवे में एक कैंटीन स्थापित करवाई जिसका संचालन दिल्ली पर्यटन विकास निगम किया करता था। 

वे पत्रकारों के सुख दुख में शामिल होने के लिए तत्पर रहते थे। तब लालकृष्ण आडवाणी व अटल बिहारी वाजपेयी को लगने लगा था कि कभी उनका साथी रहा यह नेता बहुत मजबूत हो गया है इसलिए इसके पर कतरने चाहिए। जब 2004 में वे वाजपेयी सरकार में संसदीय कार्य एवं पर्यटन मंत्री बने तो तत्कालीन सुरक्षा सलाहाकार ब्रजेश मिश्र व अटल बिहारी वाजपेयी के दत्तक दामाद रंजन भट्टाचार्य उन पर तमाम अपने मनचाहे व गलत काम करवाने के लिए दबाव डालने लगे। तब जब कोई उनका परिचित उनसे मिलता तो वे उसके सामने उनके पत्र तक निकाल कर रख उन्हें बताते थे कि वे कितना दबाव में जी रहे हैं। 

उससे पहले जैन हवाला डायरी में तमाम नेताओं के नामों का खुलासा हुआ जिसमें उसे रिश्वत देने की बात कहीं गई थी। यह खुलासा विनीत नारायण ने किया था। इस खुलासे में लालकृष्ण आडवाणी, विद्याचरण शुक्ला, पी शिव शंकर, शरद यादव, बलराम जाखड़ सरीखे नेताओं के नाम थे। लालकृष्ण आडवाणी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह सच बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने ही खुरानाजी को भावनात्मक ब्लैकमेल करके उन्हें मुख्यमंत्री  से इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया। 

खुरानाजी ने अपने एक करीबी पत्रकार को बताया था कि जब वे उनसे मिलने गए तो आडवाणीजी ने दुखी हो कर कहा कि मैं तो इस्तीफा देकर फंस गया। मैं इस्तीफा देने वाला नहीं हूं किसी और ने इस कारण इस्तीफा नहीं दिया। भावनाओं में आए मदनलाल खुराना ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। उस समय यह तय किया गया था कि इस कांड से बरी होते ही उन्हें पुनः मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। 

मगर भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी व लाल कृष्ण आडवाणी दिल्ली में उनकी हैसियत से इतना घबरा चुके थे कि उन्हें उनको निपटाने का यह एक अच्छा मौका मालूम हुआ व उन्होंने जाट साहिब सिंह वर्मा को नया मुख्यमंत्री बना दिया। वे भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके और पार्टी ने हरियाणा की सुषमा स्वराज को नया मुख्यमंत्री बना दिया। 

वह दिन है और आज का दिन कि उसके बाद भाजपा राजधानी में कभी सत्ता में नहीं आई और साफ होती गई। बाद में सीबीआई की जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सबको हवाला कांड से बरी कर दिया मगर वह दोबारा मुख्यमंत्री नहीं बने। उन्हें वाजपेयी सरकार ने राजस्थान का राज्यपाल बना दिया। मगर उनकी आत्मा तो दिल्ली में बसती थी उन्होंने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी व गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की व उन्हें अनुशासनहीनता के आरोप में भाजपा से निकाल दिया गया। हालांकि तब वे कहते थे कि मेरी अंतिम इच्छा है कि मेरा पार्थिव शरीर भाजपा के झंडे में लिपटा कर श्मशान ले जाया जाए। बाद में उन्हें पार्टी में शामिल कर लिया गया। 

बीच में वे उमा भारती की पार्टी भारतीय जनशक्ति में भी शामिल हो गए थे। करीब 10 साल से वे बिस्तर पर थे। उन्हें दो बार पक्षाघात हुआ। एक महीने पहले उनके बड़े बेटे विमल का निधन हो गया। भाजपा ने अपने इस शेर को अपने घर के एक कमरे में कैद रहने के लिए बाध्य कर दिया। क्या अजीब संयोग है कि भाजपा और कांग्रेंस दोनों ने ही अपने शेरों की जबरदस्त अनदेखी की। हरकिशन लाल भगत को तो दिल्ली का बेताज बादशाह कहा जाता था। एक समय था जब उनकी व सज्जन कुमार की दिल्ली में तूती बोलती थी व खासतौर से सज्जन कुमार के बिना पार्टी किसी बड़ी रैली की कल्पना भी नहीं कर सकती थी। क्या गजब का संयोग है कि यह दोनों ही नेता गुमनामी में रहे त उनकी अनदेखी के साथ ही दोनों दलो का यहां सफाया हुआ और दिल्ली की राजनीति में शरणार्थी पंजाबियों की जगह प्रवासी बिहारी हावी हो गए।

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