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कनाड़ा में क्या कभी भारतवंशी प्रधानमंत्री?

विवेक सक्सेना
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इस समय कनाड़ा की राजनीति में एक सवाल काफी अहम बना हुआ है। वह यह कि क्या वहां इस साल होने वाले हाऊस ऑफ कामंस (लोकसभा चुनाव) के बाद कोई भारतीय मूल का व्यक्ति प्रधानमंत्री बनेगा?  यह सवाल न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी एनडीपी के अध्यक्ष पद पर जगमीत सिंह जिम्मी धालीवाल के अध्यक्ष बनने और अगले माह होने वाले हाऊस ऑफ कामंस के उपचुनाव में उनके उम्मीदवार बनने के कारण सब तरफ पूछा जाने लगा है।  

जब धालीवाल एनडीपी के अध्यक्ष बने तो यह अपने आप में एक इतिहास था क्योंकि इस देश के इतिहास में पहली बार कोई गैर-गोरा वह भी गैर-ईसाई सिख राष्ट्रीय राजनीतिक दल का अध्यक्ष बना था। उपचुनाव 15 फरवरी को होना है। यह स्थान यहां से जीते हुए सांसद द्वारा अपने पद से इस्तीफा देने के कारण खाली हुआ है जोकि मेयर बन गए थे। वे वेंकूवर के मेयर बने हैं। 

उनका मुकाबला लिबरल पार्टी की केरन बैग नामक चीनी महिला से था, जिन्होंने हाल ही में मैदान से हटने का फैसला लिया था। उन्होंने अपने ऊपर जगमीत के खिलाफ नस्लवादी टिप्पणी करने के कारण इस्तीफा दिया था। बताया जाता है कि उन्होंने कहा था कि वे भारतीय मूल के हैं जिसे वे आसानी से हरा सकती हैं। 

हालांकि उन्होंने बाद में सफाई दी कि यह बात उन्होंने नहीं बल्कि सोशल मीडिया पर उनके किसी समर्थक ने कही थी। यह खुलासा होने के बाद वहां की राष्ट्रीय लिबरल पार्टी ने कहा कि वे उसके विचारों और सिद्वांतों से मेल नहीं खाते हैं। अनेकता में एकता के सिद्धांत पर चलने वाली यह पार्टी सकारात्मक, रचनात्मक राजनीति के लिए प्रतिबद्ध हैं। वह अपने उम्मीदवार से भी ऐसा ही आचरण करने की उम्मीद करती है। 

यह अंतर है हमारे यहां व कनाड़ा के राजनीतिक दलों और नेताओं में। उपचुनाव जिस बर्नवे (दक्षिण) संसदीय सीट पर हो रहा है। वहां 40 फीसदी चीनी मूल के, 30 फीसदी गौरे, 24 फीसदी सिख व पंजाबी, 6 फीसदी फिलीपींस व 3 फीसदी कोरियाई मूल के मतदाता रहते हैं। ध्यान रहे कि इस समय लिबरल पार्टी ऑफ कनाड़ा सत्ता में है व एनडीपी प्रमुख विपक्षी दल है जिसके सत्ता में आने की उम्मीद है। 

अभी तक लिबरल पार्टी ने कोई नया उम्मीदवार नहीं खड़ा किया है। ऐसा माना जा रहा है कि शायद वे ऐसा ना भी करें। कनाड़ा में यह परंपरा  है कि जब किसी राष्ट्रीय दल का कोई नेता चुनाव लड़ता है तो आमतौर पर दूसरे दल उसके खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा नहीं करते हैं। ऐसा माना जा रहा है कि उम्मीदवार न खड़ा करने के पीछे प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो की पार्टी की चाल हो सकती है। 

अगर वह चुनाव जीत जाते हैं तो अगले चुनाव में वे अपने चुनाव क्षेत्र तक फंस कर रह जाएंगे। अगर हार गए तो उन्हें अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना होगा व एनडीपी को अपना नया अध्यक्ष चुनना पड़ेगा जोकि इस चुनावी साल में उसके लिए काफी दिक्कतें पैदा करेगा। एनडीपी आज तक सत्ता में नहीं आई है व जगमीत को कट्टर समाजवादी माना जाता है जोकि बीमा कंपनियों का शुल्क कम करने, सबको स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करवाने व यहां रहने वाले लोगों को अपने मां-बाप से मिलने के लिए यहां आने देने के नियम सरल बनवाने के पक्ष में हैं। 

ऐसा माना जा रहा है कि उनके खिलाफ किसी रणनीति के तहत ही लिबरल पार्टी अपना उम्मीदवार न खड़ा करे। वैसे बता दें कि 338 सदस्यीय सदन में लिबरल पार्टी के 184 सांसद है। इनमें से 19 भारतीय मूल के हैं जिनमें से 17 पंजाबी व सिख हैं। इनमें से चार मंत्री है। कनाड़ा के इतिहास में पहली बार एक पगड़ीधारी सिख सज्जन हरजीत को रक्षा मंत्री बनाया गया है। उन पर खालिस्तान समर्थक होने के आरोप लगते आए हैं। कुछ साल पहले जब वे प्रधानमंत्री ट्रूडो के साथ भारत यात्रा पर आए थे तो पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने उन पर खालिस्तानी होने का आरोप लगाते हुए उनसे मिलने से इंकार कर दिया था। 

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कनाड़ा के प्रधानमंत्री के उस सरकारी दौरे को ज्यादा अहमियत नहीं दी थी। उन्होने उनकी अगवानी के लिए विदेश मंत्रालय के किसी आला अधिकारी या किसी मंत्री तक को नहीं भेजा था। उनका मानना था कि कनाड़ा से आतंकवादियों को अहमियत दी जा रही है। वहां के गुरुद्वारों में बैसाखी पर भिंडरावाले व दूसरे आतंकवादियों की तस्वीरें लगा कर उनका सम्मान किया जाता है। 

जैसे ही वे भारत आए सरकार ने कनाड़ा से भारत भेजी जाने वाली एक दाल जिससे बेसन तैयार किया जाता था पर 50 फीसदी कर बढ़ा दिया जिससे कि वह काफी महंगी हो गई। नतीजतन कनाड़ा को कम दामों पर उसे चीन व पाकिस्तान को बेचना पड़ा।

जगमीत की जीत को लेकर खुद भारतीय मूल के लोग दुविधा में हैं। जहां सिख पूरी तरह से उनके पक्ष में है वहीं गैर-सिखों का मानना है कि अगर वह कट्टरपंथी नेता जीता तो देश में अलगाववाद व आतंकवाद को बढ़ावा मिलेंगे। उनके द्वारा 1984 कें दंगों व आपरेशन ब्लू स्टार को नरसंहार कहने के बाद भारत सरकार ने उनको वीजा देने से इंकार कर दिया था। उन्हें लेकर सोशल मीडिया सक्रिय हो गया है। उन पर दाढ़ी रखने के कारण नस्लवादी होने के आरोप लगाए जा रहे हैं। वे एलजीबीटी के समर्थक है व उन्हें गर्भपात का विरोध करने वाली लॉबी का समर्थन हासिल है। 

अतः बड़ी तादाद में विवाहित व दूसरी महिलाओं के उनके खिलाफ जाने की संभावना है। यह भी दावा किया जा रहा है कि फ्रेंच भाषा बोलने वाले राज्य क्यूबेक में उन्हें ज्यादा वोट नहीं मिलेंगे। जब तक एनडीपी कनाड़ा के सभी राज्यों में चुनाव न जीते उसके द्वारा सरकार बना सकना मुश्किल है। देखें कि फरवरी के उपचुनाव में क्या होता है।

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