वेंकूवर का भारत से नाता

विवेक सक्सेना
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इसे महज संयोग ही कहूंगा कि मैं जिस वेंकूवर शहर में आया हुआ हूं उसका एक विशेष इतिहास है जोकि भारत और सिखों से जुड़ा हुआ है। हुआ यह कि भारतीय व एशियाई मूल के लोगों को यहां आने से रोकने के लिए यहां की सरकार ने कड़े कानून बना दिए थे। उन दिनों लोग पानी के जहाज से यहां आते थे और यात्रा काफी लंबी होती थी व जहाज को कुछ दिनों के लिए जापान या हवाई में लंगर डालकर रूकना पड़ता था। जबकि सरकार ने यह नियम बना दिया था कि केवल उन्ही एशियाई देशों व भारत के लोग कनाड़ा में प्रवेश कर सकेंगे जोकि अपने मूल देश से यहां तक बिना रूके यात्रा करके आए हैं। 

इसको लेकर भारतीय खासतौर से पंजाबियों में बहुत नाराजगी थी। इसका विरोध करने के लिए पंजाब से सरहाली इलाके में रहने वाले गुरदित ने एक पहल की। वे हांगकांग में रहते थे और मछलियां पकड़ने का काम करते थे। उन्होंने जापान के एक जहाज कामागाटा मारू को किराए पर लिया और बिना किसी दस्तावेज के कनाड़ा तक जाने का फैसला कर लिया। 

उन्होंने जनवरी 1914 में कलकत्ता से वेंकूवर तक की यात्रा शुरू की। उनके जहाज में 376 यात्री थे। इनमें से 340 सिख, 12 हिंदू व 24 मुसलमान यात्री थे। वे उन लोगों को लेकर वेंकूवर रवाना हो गए और जहाज ने कनाड़ा के वेंकूवर के बंदरगाह पर अपना लंगर डाल दिया। रास्ते में उनके साथ गदर पार्टी के सोहन लाल व वेंकूवर गुरुद्वारे के मुख्य ज्ञानी भगवान सिंह भी आ गए। 

गदर पार्टी, कनाड़ा व अमेरिका में भारत की आजादी के लिए काम कर रही थी। कनाड़ा के अफसरो ने उस पर सवार लोगों को उतरने नहीं दिया। कनाड़ा के तत्कालीन प्रधानमंत्री तथा वेंकूवर के राज्य ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर मुख्यमंत्री ने भी साफ कह दिया कि ये सभी लोग अवैध रूप से यहां आए है। अतः उन्हें आने नहीं दिया जाएगा। वहां के लोगों ने आव्रजन विभाग के खिलाफ मामला हाईकोर्ट में पहुंचाया मगर उसने साफ कह दिया कि वह आव्रजन विभाग के मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकता हैं। 

जब पुलिस ने इस जहाज पर चढ़ने की कोशिश की तो उस पर सवार यात्रियों ने जहाज पर लदे कोयले से उन पर हमला कर दिया। सरकार ने अंततः 22 लोगों को आने दिया मगर बाकी सब लोगों को भारत भेजने का फैसला करते हुए नौसेना की मदद से जहाज को समुद्र में पहुंचा दिया। लोग भूखे प्यासे थे और उनके पास खाने-पीने को कुछ नहीं था। उनकी मदद के लिए कनाड़ा में तटीय समिति बनी जिसने 22 हजार रुपए चंदा एकत्र करके उन लोगों की मदद की। 

इस मामले को लेकर अमेरिका व कनाड़ा में विरोध प्रदर्शन हुए। गुस्साएं यात्रियों ने जहाज के कैप्टलन को हटा दिया। यह जहाज 27 सितंबर 1914 को वापस कलकत्ता पहुंचा औ उसने वहां के दमदम बंदरगाह पर लंगर डाल दिया। मगर तत्कालीन अंग्रेंज सरकार उन लोगों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं थी। उसका मानना था कि जहाज पर क्रांतिकारी लदे हुए है जोकि उतर कर क्रांतिकारी गतिविधियां कर सकते थे। अंततः सरकारी पुलिस व यात्रियों के बीच में टकराव हुआ जिसमें 22 लोग मारे गए। बाकी लोगों को पुलिस ने जेल में बंद कर दिया व उन्हें प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद ही छोड़ा गया। 

बाबा गुरदित सिंह फरार हो गए। बाद में उन्होंने महात्मा गांधी की अपील पर पुलिस के आगे समर्पण कर दिया और उन्हें छह साल की सजा हुई।

यह मामला इतना भावनात्मक था कि आजादी के बाद कांग्रेंस सरकार ने कोलकत्ता में कामागाटा मारू स्मारक बनवाया जबकि कांग्रेंस ने पंजाब में आयोजित अपने अधिवेशन स्थरल का नाम कामागाटा मारू नगर रखा। इस मामले से जुड़े आव्रजन अफसर डब्ल्यू सी डापकिंस की तब गोली मार कर हत्या कर दी गई जब वे इस मामले की सुनवाई के सिलसिले में अदालत जा रहे थे। इस मामले को लेकर कनाड़ा में रहने वाले सिख लगातार अपना विरोध जताते रहे। पहले ब्रिटिश कोलंबिया की विधानसभा में व फिर कनाड़ा की संसद मे तत्कालीन प्रधानमंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री के पिता जस्टिन ट्रूडो ने माफी मांगी। वहां के डाकतार विभाग ने इस कांड के सौ साल पूरे होने पर विशेष डाक टिकट जारी किया। भारत में 2014 में पांच व सौ रुपए के सिक्के जारी किए गए। 

यह घटना बताती है कि कनाड़ा का शुरू से भारत व सिखों के लिए क्या महत्व रहा है। तेल, प्राकृतिक संपदा के भंडार व विकसित देश होने के बावजूद आम तौर पर कनाड़ा का रवैया बहुत अजीब रहा है। कभी वह अमेरिका के इशारों पर चलता है तो कभी अपने स्वामी रहे ब्रिटेन के इशारे पर। आजाद होने के बाद आज भी वह ब्रिटेन की महारानी को अपना राष्ट्राध्यक्ष मानता है। उसकी नीतियां अपने पड़ोसी देश अमेरिका से काफी प्रभावित रहती है। उसके एक राज्य क्यूबेक में आज भी उसके पूर्व शासक फ्रांस का प्रभाव दिखता है क्योंकि वहां की राजकीय भाष फ्रेंच है। यह भाषा नहीं जानने वाले को वहां ना नौकरी हासिल हो सकती है और ना ही वे वहीं बस सकते हैं। 

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