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घर- सड़क, व्यवस्था सब व्यवस्थित

विवेक सक्सेना
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अपने जीवन में कभी इतनी देर से सो कर नहीं उठा  जितना इन दिनों हो रहा है। आजकल सुबह साढ़े दस बजे के आसपास उठता हूं। वजह यह है कि यहां समय का पता ही नहीं चलता है। सूरज देर से निकलता है और बादल छाए रहने के कारण समय का पता नहीं चलता है। आम तौर पर बारिश होती रहती है। जब सुबह चाय पीकर घूमने निकलता हूं तो बाहर काफी ठंडी हवा होती है जोकि स्वेटर व जैकेट पहने होने के बावजूद सीने को मानो भेदती चली जाती है। 

आज काफी ध्यान से उस इलाके को देखा जहां कि मैं घूमने जाता हूं। पूरा इलाका काफी खुला व नियोजित तरीके से बसाया गया है। दो घरों के बीच करीब 200 मीटर की जगह होती है। मुख्य सड़क काफी चौड़ी होने के बावजूद उसके दोनों और करीब 15 फुट जगह फुटपाथों के लिए छोड़ी जाती है जिन पर या तो घास लगी होती है अथवा क्यारियों में पेड़ लगे होते हैं। फुटपाथ खत्म होने के बाद घरों की सीमा शुरू होती है। 

ज्यादातर घरों के बाहर कोई दीवार नहीं है। अगर है भी तो उसे देवदार के वृक्ष लगा कर बनाया गया है। दो घरों के बीच की जगह होती है। अगर भविष्य में किसी सड़क को चौड़ा करना हो तो सरकार को किसी तरह की दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ता जबकि हमारे देश खासतौर पर दिल्ली में अपने घरों के बाहर फुटपाथ तक को घेर रखा है। 

पिछले दिनों एक देवदार का वृक्ष गिर गया था। उसके तमाम हिस्से बिजली वाले छोड़ गए थे। अगर भारत होता तो घर- लॉन में उसमें आग लगाकर उसे तापता मगर यहां ऐसा नहीं होता है। अगर पड़ोसी ने शिकायत कर दी तो पुलिस आ जाएगी। वैसे भी सभी घर लकड़ी के ही बने हुए हैं। यहां लकड़ी बहुत ज्यादा होती है। सरकार का नियम है कि अगर कोई पेड़ काटना जरूरी हो तो उसे सरकारी अनुमति के बाद ही काटा जा सकता है। काटे गए हर एक पेड़ के बदले में संबंधित व्यक्ति को तीन पेड़ लगाने पड़ते हैं ताकि हरियाली बनी रहे व वातावरण स्वस्थ बना रहे। पता चला कि दुनिया की एक तिहाई हरियाली इसी देश में है। यहां की जमीन काफी उपजाऊ है।

क्रिसमिस व नववर्ष पर घरों के बाहर लोगों ने जो सजावट की थी वह अगर हमारे देश में की गई होती तो लोग रात को ही बत्तियां व साज-सामान चुरा ले गए होते। यहां किसी भी घर में लौहे की जाली या ग्रिल नहीं है और ना ही मुख्य दरवाजा लौहे का होता है। अहम बात यह है कि यहां बिजली के स्विच उल्टा काम करते हैं। ऊपर करने पर ऑन होते हैं व नीचे करने पर ऑफ हो जाते हैं। पानी व बिजली की कोई कमी नहीं है व इनकी सतत सप्लाई है। घर में खाना भी बिजली पर ही बनता है। 

इसके अलावा घरों को लगातार गर्म रखने और रहने वालों की मांग के मुताबिक गर्म पानी की व्यवस्था  भी बिजली के माध्यम से ही की जाती है। घर के किराए में बिजली का बिल शामिल है। घरों का फर्श लकड़ी का होता है। घर में पूजा इसलिए नहीं कर रहा हूं क्योंकि यहां दिया व अगरबत्ती जलाना मना है। उससे आग लगने का खतरा होता है। अगरबत्ती के धुएं से तो फायर अलार्म बजने का खतरा रहता है। अतः दिल्ली से लाए भगवानों की तस्वीरे अलमारी में रखने के बाद उनसे हाथ जोड़कर क्षमा मांगी कि भगवान अब दिल्ली जाकर ही पूजा होगी क्योंकि मैं बिना फुलमाला और अगरबत्ती के पूजा कर नहीं सकता हूं। 

हर गुरुवार को कूड़ा एकत्र करने वाली गाड़ी आती है। हर को तीन-चार कूड़ेदान मिले हुए हैं। इन डिब्बो में कूड़ा भर कर लोग फुटपाथ पर रख देते हैं और कूड़ा उठाने आई गाड़ी उन्हें खाली कर वापस फुटपाथ पर ही रख देती है। क्या मजाल है कि कूडा पलटते समय सड़क पर एक कागज भी गिर जाए। कूड़ा इक्ट्ठा करने वाले ज्यादातर कर्मचारी अंग्रेंज है। जब घूमने निकलता हूं तो कनाड़ा के डाकघर विभाग की गाड़ी दिखाई पड़ती है। इसे चलाने वाली महिला पोस्टचैक भी होती है। वह वातानुकूलित गाड़ी में डाक लेकर आती है। थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे खड़ा करके घरों तक डाक पहुंच जाती है। कार की चाभी उसकी कमर में लगी प्लास्टिक की डोरी से बंधी होती है। फुटपाथ पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर लैटर बॉक्स लगे हैं जोकि अब हमारे देश में ज्यादातर उखड़ चुके हैं। 

फुटपाथ पर लगे लैटर बॉक्स व बिजली के बाक्सों के बाहर काफी सुंदर प्लास्टिक वाले स्टिकर इस तरह से चिपकाए गए है ताकि वे पूरी तरह से ढक जाएं व उनके डिब्बो में जंग आदि न लगे। यहां राइट हैड ड्राइव है व गाडि़यां सड़क के दाहिनी और चलती है व ड्राइवर की सीट भी दाई और होती है जैसे कि हमारे देश में लेफ्ट ड्राइव है व हम लोग बाईं और वाहन चलाते हैं। नियमानुसार पैदल चलने वालो व सार्वजनिक वाहनों को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है। अगर सड़क पर कोई बस जा रही है तो आपको अपनी कार पीछे करके पहले उसे निकलने देना होगा। 

लोग हॉर्न बिलकुल भी नहीं बजाते हैं। हर चौराहे पर मुख्य ट्रैफिक लाइट के नीचे एक बटन लगा होता है जिससे पैदल चलने वाले यात्री दबा कर बाकी सभी ट्रैफिक को रोक कर सड़क पार कर सकते हैं। हालांकि लोग इसे तभी दबाते है जबकि उनके सामने का ट्रैफिक कम हो चुका होता है। यहां कि ट्रक व उनके ट्रालर काफी लंबे हैं। उनसे 30 पहिए तक होते हैं। उनमें ड्राइवर वाले हिस्से में उसमें सोने का प्रबंध भी होता है व उसका केबिन एयर कंडीशन होता है। 

तमाम पंजाबी खासतौर से सिख ड्राइवरों ने अपने ट्रालर ले रखे हैं जिनसे उन्हें बहुत मौटी कमाई होती है। वे इतने रईस है कि कुछ लोगों ने तो महंगे इलाके में मकान ले रख हैं व अपने लिए मर्सीडीज कारें तक खरीदी है। उनके बड़े-बड़े घर है व उनसे मिलकर यह नहीं लगता है कि वे इतने पैसे वाले होंगे।

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