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भाजपा संस्कारी अकबर की दास्ता-ए-हरम!

विवेक सक्सेना
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लगता है भाजपा और राजग सरकार का बुरा समय शुरू हो गया है। अभी राफेल विवाद ठंडा भी नहीं पड़ा था कि बेटी बचाओं, बेटी पढ़ाओ का नाम देने वाली इस सरकार के विदेश राज्य मंत्री एमजे अकबर मी टू का शिकार हो गए। वैसे अगर सितारे ठीक न होते तो वे काफी पहले ही चर्चा में आ गए होते। वक्त ने उनके किस्सों को कम नहीं छुपाए रखा। 

अब एक साथ कई महिलाएं अंग्रेजी पत्रकारिता के प्रतिमान संपादक एमजे अकबर पर बेखौफ पिल पड़ी है। मी टू में एमजे अकबर पर गंभीर आरोपों की शुरूआत महिला पत्रकार प्रिया रमानी से हुई है। उसने अपनी कहानी में बताया है कि कैसे एक युवा पत्रकार के तौर पर वे और उनके साथी एमजे अकबर को सम्मान के साथ देखते थे। उनके साथ काम करना उनके लिए अपनी जरूरत पूरी करने जैसा था। अपनी आप बीती का संयोग देते हुए वे लिखती है कि उनके बारे में बहुत सारी महिलाओं के बुरे अनुभव है। उम्मीद है कि वो भी इसे साझा करेगी। 

वे कहती है आपने मुझे कैरियर का पहला पाठ तब पढ़ाया था जब मैं 23 साल की थी और आप 43 के। आप को पढ़ते हुए मैं बड़ी हुई थी व प्रोफेशनली आप मेरे हीरो थे। सभी लोग कहते थे कि आपने देश की पत्रकारिता को ही बदल दिया है। इसलिए मैं आपकी टीम का हिस्सा बनना चाहती थी। आपने मुझे इंटरव्यू के लिए दक्षिणी मुंबई के एक होटल में बुलाया। शाम के 7 बज रहे थे। होटल की लॉबी में पहुंच कर मैंने आपको फोन किया। आपने कहा इस रूम में आ जाओ। 

मैं रूम में पहुंची तो वहां डेटिंग जैसा माहौल था और इंटरव्यू का कम। आपने मिनी बॉर में मुझे ड्रिंक ऑफर किया। मैंने मना कर दिया। आपने वोडका ले ली। एक छोटे टेबल पर मैं व आप इंटरव्यू के लिए आमने-सामने थे। वहां से मुंबई का मरीन ड्राइव जिसे क्वींस नेक्लेस कहते है दिख रहा था। आपने कहा कि कितना रोमांटिक लग रहा है। आपने हिंदी फिल्म का पुराना गाना सुनाया और मुझसे संगीत पर मेरी रूचि के बारे में पूछने लगे। रात बढ़ती जा रही थी। मुझे घबराहट हो रही थी। कमरे में पलंग भी था आपने कहा यहां आ जाओ। यहां बैठ जाओ। मैंने कहा नहीं मैं कुर्सी पर ही ठीक हूं। उस रात मैं किसी तरह से बच पाई।

आपने मुझे काम दे दिया। मैंने कई महीने आपके साथ काम किया और तय कर लिया कि अब कभी आपसे अकेले में नहीं मिलूंगी। सालों बाद भी आप नहीं बदले। आपके यहां जो भी नई लड़की काम करने आती थी आप उस पर अपना अधिकार समझते थे। आप उन्हें प्रभावित करने के लिए गंदी-गंदी तरकीबें अपनाते थे। उनसे कहते मेरी तरफ देखो, पूछते थे क्या तुम्हारी शादी हो गई है? कंधा रगड़ते थे। 

आप भद्दे फोन व कॉल व मैसेज करने में एक्सपर्ट हैं। आप जानते हैं कि चुटकी कैसे काटी जाए, थपथपाया जाए, पकड़ा जाए और हमला किया जाए। आप के खिलाफ बोलने की अब भी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। ज्यादातर युवा महिलाएं यह कीमत अदा नहीं कर सकती। 

मी टू के ऐसे आरोपों के दायरे में मीडिया के भी कई लोग आ गए हैं जिन पर यौन शोषण का आरोप है। इन आरोपों का सामना कर रहे नामों में से एमजे अकबर सबसे बड़ा नाम है। इसके पहले हिंदुस्तान टाइम्स के राजनीतिक संपादक प्रशांत झा और द क्विंट के मेघनाथ बोस भी चर्चा में हैं। प्रिया रमानी मिंट की फीचर एडीटर हैं। उन्होंने पहले 2017 में वोग इंडिया मैगजीन में अकबर का नाम लिए बिना इस बारे में लिखा था। 

ज्योंहि अभी मी टू में प्रिया रमानी की आप बिती आई नही कि एमजे अकबर के साथ काम कर चुकी महिला पत्रकारों ने अपने अनुभव सुनाने और फिर उनके टिवट, रिटिवट का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि समझ ही नहीं आ रहा है कि अकबर की पत्रकारिता, उनके संपादकीय कक्ष का मकसद क्या हुआ करता था। नजर खबर की खोज में होती थी या हवस की?

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में एकसाथ कई महिला पत्रकारों की जो व्यथा नजर आई वह हैरान कर देने वाली है।  रमानी का कहना है कि इस शिकारी का शिकार बनी महिलाओं के पास उसके खिलाफ कहीं चौंकाने वाली कहानियां हैं। कनिका गहलौत, सुपर्णा शर्मा, शुहमा राहा, प्रेरणा सिंह बिंद्रा, सुतापा पॉल शर्मा, सुजाता आनंदन, शुभा राज व हरिदंर बावेजा ने अकबर की नजरों और उनके यौन शोषण में जो कुछ कहा है उससे अब समझ आता है कि क्यों अकबर अपने दफ्तर में ज्यादा-से-ज्यादा लड़कियों को रखते थे। एक महिला पत्रकार के अनुसार हम लोग दफ्तर को अकबर का हरम कहते थे। वे अपनी ताकत से युवाओं को मानसिक तौर पर जब तब परेशान करते थे।

'द टेलीग्राफ', एशियन ऐज व द संडे गार्जियन के संपादक रहे व राज्यसभा सदस्य एमजे अकबर के बारे में और महिलाओं ने भी यौन शोषण का आरोप लगाया है। अकबर की दास्तां दिलचस्प है। एमजे अकबर का पूरा नाम मोबाशर जावेद अकबर है। वे फिलहाल मध्य प्रदेश से राज्यसभा के भाजपा सदस्य है। इससे पहले वे देश की पहली साप्ताहिक खोजी पत्रिका संडे के संपादक रह चुके हैं। वे द टेलीग्राफ व द एशियन ऐज के संपादक भी रहे। वे इंडिया टुडे व व द संडे गार्जियन के संपादकीय निदेशक रहे। 

कांग्रेस के टिकट पर वे किशनगंज से लोकसभा का चुनाव लड़े व एक बार जीते व दोबारा हारे। पहले वे राजीव गांधी की कांग्रेंस के प्रवक्ता बने और मंदिर विवाद पर कांग्रेंस की पैरवी करते थे। फिर वे नरेंद्र मोदी की शरण में चले गए और मंत्री बने। उन्होंने कलकत्ता के जाने माने प्रेसीडेंसी कॉलेज से बीए ऑनर्स (इंग्लिश) किया। उन्होंने 1971 में टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में अपना पत्रकारिता का कैरियर शुरू किया व जानी-मानी पत्रिका इलेस्ट्रेटेट वीकली में रहे। उन्होंने जब 1982 में संडे पत्रिका शुरू की तो तब उसे खोजी पत्रकारिता का पहला नमूना माना जाता था। सऊदी अरब के किंग अब्दुल्ला ने मार्च 2005 में मुस्लिम राष्ट्रो के संगठन ओआईसी का मांग पत्र तैयार करने वाली समिति का उन्हे सदस्य बनाया। 

उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया की अपनी सहकर्मी मल्लिका से शादी की। वे वक्त देख कर उसका फायदा उठाने में माहिर हैं। जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे तो वे उनके करीबी बनकर रहते थे और जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो वे मंदिर व भाजपा के हक में पैरवी करने लगे। उनके बारे में पत्रकारों में अक्सर कहा जाता था कि जीवन में उन्होंने जितनी मौज ली शायद ही किसी अन्य व्यवसायी या व्यक्ति ने इतनी मौज ली हो। कुछ लोग तो यहां तक कहते थे कि भगवान अगले जन्म में हमें अकबर जैसा अंग्रेजी का पत्रकार बनाना। 

एक बार एक युवा महिला पत्रकार मेरे पास आई और उसने अकबर से मिलने की इच्छा जताई तो मैंने महिला पत्रकारों के बीच चर्चित एक किस्सा सुनाया कि तब अकबर संपादक थे तो जब किसी महिला और नौकरी देने के लिए उसका इंटरव्यू करते थे तो होटल के कमरे में बुलाते थे। जब वह युवती उनसे मिलकर आई तो उसने कहा कि आप तो उन्हें नाहक बदनाम कर रहे थे। उन्होंने तो मुझे अपने बैडरूम में बुलाया था जहां पलंग बिछा हुआ था। अब मैं उससे क्या कहता।

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