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हरियाणा में मायावती के कारण कांग्रेस दबाव में

हरियाणा में कांग्रेस पार्टी फैसला नहीं कर पा रही है कि पिछले करीब छह साल से प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर काम कर रहे अशोक तंवर को हटाया जाए या उन्हें रहने दिया जाए। पिछले दो महीने की तीन घटनाओं ने कांग्रेस की परेशानी बढ़ाई है। पहली घटना पांच शहरों के मेयर के चुनाव की थी। कांग्रेस अपने चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़ी पर निर्दलीय प्रत्याशियों का खुल कर समर्थन किया। इसके बावजूद पांचों शहरों में भाजपा जीत गई दूसरी घटना जींद विधानसभा का उपचुनाव है, जिसमें कांग्रेस के हेवीवेट नेता रणदीप सुरजेवाला न सिर्फ चुनाव हारे, बल्कि तीसरे स्थान पर रहे। 

तीसरी घटना मायावती के इंडियन नेशनल लोकदल से तालमेल तोड़ने की है। उन्होंने इनेलो से तालमेल तोड़ कर भाजपा के सांसद राजकुमार सैनी की लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी से तालमेल कर लिया है। सैनी गैर जाट राजनीति कर रहे हैं और तमाम पिछड़ी जातियों को एकजुट कर रहे हैं। उनके साथ बसपा का तालमेल एक मजबूत समीकरण बनाता है। तभी भाजपा दुविधा में है कि दलित अध्यक्ष बनाए रखें या कोई गैर जाट और गैर दलित नेता बनाएं या किसी जाट नेता को कमान सौंपे? कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि गैर जाट, मुस्लिम और दलित ही कांग्रेस के पारंपरिक वोटर रहे हैं। कहा जा रहा है कि इसी वजह से भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कमान देने का मामला अटका है। 

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