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माल्या के खुलासे का मतलब!

भारत के कई बैंकों का हजारों करोड़ रुपए का कर्ज चुकाए बगैर देश छोड़ कर चले गए शराब कारोबारी विजय माल्या का खुलासा मामूली नहीं है। यह बहुत गौरतलब मामला है। माल्या ने यूं ही वित्त मंत्री अरुण जेटली का नाम नहीं लिया है। जानकार सूत्रों का कहना है कि जेटली के दोबारा वित्त मंत्रालय संभालने से कई लोग परेशान हैं। उनकी जगह कामकाजी वित्त मंत्री रहे पीयूष गोयल ने शुरू में तो खड़ाऊं राज किया था पर बाद में उनकी रूचि इसमें बढ़ गई थी। 

बहरहाल, अंदाजा लगाया जा रहा है कि माल्या का खुलासा भाजपा और देश के अंदर की राजनीति का नतीजा हो सकता है। उन्होंने लंदन की अदालत में एक पेशी के बाद कहा कि वे भारत छोड़ने से पहले अरुण जेटली से मिले थे। उनका यह खुलासा आधे अधूरे सच के अंदाज में किया गया। उन्होंने बाद में सफाई भी दे दी कि उनकी मुलाकात औपचारिक नहीं थी। यहीं बात जेटली ने भी अपनी सफाई में कही कि उन्होंने माल्या को अप्वाइंटमेंट नहीं दी थी, बल्कि राज्यसभा सांसद होने के विशेषाधिकार का फायदा उठा कर वे संसद में मिल गए थे। 

हालांकि तब माल्या ने उनसे कहा था कि वे लंदन जा रहे हैं और चाहते हैं कि बैंकों से उनके कर्ज का निपटारा हो जाए। सवाल है कि क्या इससे वित्त मंत्री को अलर्ट नहीं होना चाहिए था और अपनी ओर से पहल करके बैंकों को निर्देश नहीं देना चाहिए थी कि वे माल्या से अपना मामला सुलझाएं और उससे पहले उनको लंदन जाने से रोकें? उन्होंने उस समय अपनी यह जिम्मेदारी नहीं पूरी की। दूसरे, किसी सांसद का संसद में वित्त मंत्री से मिलना, पद का दुरुपयोग कैसे हैं? वैसे भी माल्या राज्यसभा में भाजपा की मदद से ही पहुंचे थे। 

बहरहाल, अब हुए खुलासे के बाद जेटली फिर निशाने पर आ गए हैं। अब तक मीडिया में सरकार के लिए सब कुछ मैनेज करते रहे जेटली अपना मामला नहीं संभाल पा रहे हैं। सोशल मीडिया में भी उन पर हमला तेज हो गया है। इससे पहले किसी न किसी वजह से नरेंद्र मोदी और अमित शाह निशाने पर होते थे। अब जेटली निशाने पर हैं। तभी यह अटकल भी लगाई जा रही है कि पार्टी और सरकार में चल रही अंदरूनी खींचतान की वजह से तो माल्या का खुलासा नहीं हुआ है?

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