कांग्रेस जीरो से शुरू करेगी दिल्ली में

कांग्रेस पार्टी वापस उसी जगह पहुंच गई है, जहां पांच साल पहले थे। पांच साल पहले दिसंबर 2013 में कांग्रेस पार्टी हार कर दिल्ली की सत्ता से बाहर हुई थी। तब की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद चुनाव हार गई थीं। उनकी कमान में चुनाव लड़ी कांग्रेस को 70 में से आठ सीटें मिली थीं और कांग्रेस के बाहरी समर्थन से आम आदमी पार्टी की दिल्ली में सरकार बनी थी, जो कुल 49 दिन तक चली थी। 

उसके बाद दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगा रहा और 2015 का चुनाव कांग्रेस ने अजय माकन की कमान में लड़ा। माकन विधानसभा का चुनाव बुरी तरह से हारे और कांग्रेस पार्टी को दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली। कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी ने ले ली। कांग्रेस का प्रवासी और अल्पसंख्यक का दोनों वोट आप के पास चला गया। अब कांग्रेस ने शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री बना कर वापसी की यात्रा शुरू की है। पर कांग्रेस की मुश्किल यह है कि उसके पास अब दिल्ली में जमीनी पकड़ वाला कोई नेता नहीं बचा है। शीला दीक्षित ने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखने के लिए सारे बड़े नेताओं को किनारे कर दिया या खत्म कर दिया। 

अब कुल मिला कर दिल्ली में वहीं टीम बची है, जो शीला दीक्षित की है। अरविंदर सिंह लवली, राजेश लिलोठिया, हारून युसूफ आदि वहीं नेता हैं, जो दिल्ली में शीला दीक्षित के राज में फले फूले। इन्हीं के सहारे फिर से शीला दीक्षित 80 साल की उम्र में कांग्रेस को खड़ा करने की राजनीति करेंगी। शीला दीक्षित के सहारे कांग्रेस को पंजाबी, प्रवासी, ब्राह्मण और यहां तक की मुस्लिम वोट भी सध जाने का भरोसा है। अब आप के साथ तालमेल के मसले पर भी कांग्रेस नए सिरे से सोचेगी। दिल्ली में आप सरकार को समर्थन देकर कांग्रेस आठ से जीरो पर आ गई। अब जीरो से शुरू करेगी तो क्या वह आप के साथ तालमेल करेगी? कहीं कांग्रेस नेता यह तो नहीं सोच रहे हैं कि जैसे आप को समर्थन देकर कांग्रेस खत्म हुई वैसे ही कांग्रेस को समर्थन देकर आप खत्म होगी?

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