डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के बुद्धिजीवी वर्ग में भय उत्पन्न कर दिया है। लोगों को उन्मादी बना दिया है। उनका मिशन ‘विकृत नैरेटिव्स’ को जड़ से उखाड़ने का है। लोकतंत्र के स्तंभों पर उनके हमलों ने अमेरिका के बाहर के कई लोगों को भौंचक्का कर दिया है। वहीं अमरीकी असहमत होने से डरने लगे हैं। और डोनाल्ड ट्रंप जो चाहते थे वह उन्हें मिल रहा है।
दो सप्ताह पहले कोलंबिया विश्वविद्यालय ने घोषणा की कि वे ट्रंप प्रशासन की मांगों के आगे झुकते हुए विश्वविद्यालय परिसर में चल रही फिलिस्तीन-समर्थक गतिविधियों के खिलाफ सख्त कदम उठाने जा रहे हैं, जिनमें विरोध प्रदर्शनों पर कई तरह के नए प्रतिबंध लगाना और शैक्षणिक विभागों का नियंत्रण अकादमिक स्टाफ से छीन लेना भी शामिल हैं। विश्वविद्यालय अपने मध्यपूर्व, दक्षिण एशिया एवं अफ्रीकी अध्ययन विभाग को एक नए अधिकारी के नियंत्रण में लाने के लिए भी राजी हो गया है, जहां नए वरिष्ठ उपाध्यक्ष संकाय के शैक्षणिक पाठयक्रम की समीक्षा करेंगे ताकि पाठयक्रम व्यापक और संतुलित हों।
इस सबके बाद विश्वविद्यालय के कार्यवाहक अध्यक्ष ने पद से त्यागपत्र दे दिया, वहीं विश्वविद्यालय को आशा बंधी कि इस हद तक झुकने से उसे 40 करोड़ डालर की वह राशि दुबारा मिल जाएगी जिस पर ट्रंप प्रशासन ने रोक लगा दी थी। लेकिन ये पंक्तियां लिखे जाने तक विश्वविद्यालय की यह उम्मीद पूरी नहीं हुई थी।
ट्रंप प्रशासन सारे देश के विश्वविद्यालयों के उन छात्रों को देश से निर्वासित करने के प्रयासों में तेजी ला रहा है जो वीजा पर है या ग्रीन कार्डधारी हैं और फिलिस्तीन-समर्थक प्रदर्शनों से जुड़े हुए हैं। उन विद्यार्थियों को सबसे ज्यादा निशाना बनाया जा रहा है जिन्होंने राष्ट्र विरोधी (यानि फिलिस्तीन समर्थक) पोस्टों को ‘शेयर‘ या ‘लाईक‘ किया। विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा कि उनके निर्देश पर तीन सौ से अधिक वीजा – जिनमें से अधिकतर छात्र वीजा और कुछ पर्यटक वीजा थे – रद्द कर दिए गए हैं।
एक भारतीय नागरिक रंजिनी श्रीनिवासन, जो कोलंबिया विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट कर रही हैं, इनमें शामिल हैं। उनके वीजा को रद्द करने का कारण यह बताया गया कि वे ‘‘हिंसा और आतंकवाद‘‘ का समर्थक करती हैं, हालांकि उन्होंने स्वेच्छा से अमरीका छोड़ दिया।
इस बीच वाशिंगटन स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूट जो अमेरिका के 21 प्रमुख राष्ट्रीय संग्रहालयों में से एक है, भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक प्रशासकीय आदेश का शिकार हो गया। ‘विकृत नैरेटिव्स’ को जड़ से उखाड़ फेंकना है और ‘अनुचित विचारधाराओं’ को हटाना है। इस कार्य के पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी जेडी वेंस को दी गई है ताकि “अमेरिकी इतिहास के आख्यान में सच्चाई और संतुलन” दुबारा कायम किया जा सके।
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ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में बढ़ी सख्ती और विरोध दमन
इस बीच मीडिया पर उनके हमले पहले जैसी तीव्रता से जारी हैं। ओवल आफिस में एसोसिएटिड प्रेस के पत्रकारों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने के बाद उन्होंने एबीसी और सीबीएस के खिलाफ मुकदमे दायर कर दिए हैं और एनबीसी न्यूज, एनपीआर और पीबीएस के खिलाफ कई जांचें प्रारंभ करवा दी हैं। वाईस ऑफ अमेरिका को दी जाने वाली आर्थिक मदद में भी कटौती कर दी गई है और पिछले सप्ताह व्हाईट हाऊस ने पत्रकार जैफरी गोल्डबर्ग और अटलांटिक पत्रिका को इस बात के लिए फटकार लगाई कि उसने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी जानकारी एक सिग्नल मैसेजिंग एप पर लीक होने की चूक की खबर दी।
इस नाराजगी के मद्देनजर वाशिंगटन पोस्ट के मालिक जेफ बेजोस ने अखबार के संपादकीय पृष्ठों पर छपने वाले ओप-एड्स पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाने की घोषणा सार्वजनिक तौर पर कर दी।
ट्रंप ने उन शक्तिशाली विधिक फर्मों को निशाना बनाते हुए भी कार्यपालिक आदेश जारी किए हैं जिन्होंने उन्हें चुनौती दी थी। जैनर एंड ब्लाक, जो उन पक्षकारों के मुकदमे लड़ रही है जिन्होंने ट्रंप की कुछ प्रमुख नीतियों को चुनौती दी है और जिसमें पहले एक ऐसे अधिवक्ता कार्य करते थे जो उनके 2016 के चुनाव अभियान के जांच करने वाले वकीलों के पैनल में शामिल थे। व्हाईट हाउस के स्टाफ सेक्रेटी विल स्चार्फ़ ने ट्रंप की इस कार्यवाही का औचित्य सही ठहराते हुए जैनर एंड ब्लाक पर
“न्याय प्रणाली को अमेरिकी सिद्धांतों और मूल्यों के विरूद्ध हथियार की तरह प्रयोग करने का दोषी ठहराया।
विज्ञान पर ट्रंप के हमलों में वैज्ञानिक कार्यों के लिए धन उपलब्ध करवाने वाली अमेरिका की तीन सबसे बड़ी संस्थाओं – सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल, नेशनल इंटीट्यूटस ऑफ हेल्थ एवं नेशनल साईंस फाउंडेशन को दी गई धमकियां शामिल हैं। यहां तक कि ट्रंप ने कैनेडी सेंटर पर नियंत्रण कर उसके बोर्ड के सदस्यों को पद से हटाने और उसके अध्यक्ष को पद्च्युत कर स्वयं अध्यक्ष बनकर कला के क्षेत्र पर भी आक्रमण किया है। अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने स्मिथसोनियन संग्रहालय को निशाना बनाते हुए आदेश जारी किया।
जाहिर है, उनके द्वारा पैदा किया गया आतंक इतना प्रबल हो गया है कि कामेडियन उनका या उनके प्रशासन का मजाक उड़ाने वाली कोई बात कहने के पहले दस बार सोचने को मजबूर हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप काफी निर्मम हो गए हैं और इंतकाम लेने पर आमादा हैं। इंतकाम की ऐसी आग जो हर आतातायी के दिल में जलती है। इतिहास हमें बताता है कि हर आताताई अपनी और अपनी सरकार की हर निंदा का गला घोंटने का प्रयास करता है। उनके लिए लोकतंत्र उनके पूर्णतः सत्ता हासिल करने के लक्ष्य में एक बाधा, एक समस्या होती है।
ये सारी खबरें और घटनाएं दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र में घट रही हैं, यह बात काफी चिंताजनक और डरावनी है। लेकिन यह डर कंपकपी पैदा नहीं करता और यह चिंता तनाव नहीं बढ़ाती। क्योंकि पिछले 12 सालों में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में हमें डर के माहौल में जीने और असहमति से जुड़े भय का काफी अनुभव हो चुका है। हमने देखा है कि किस तरह योजनाबद्ध ढंग से लोकतंत्र के स्तंभों को कमजोर किया गया। हर व्यक्ति ऐसे माहौल में झुक गया, झुका रहा, और लोकतंत्र केवल एक तमाशा, एक दिखावा बनकर रह गया।
और हम सब आज सिर्फ एक नए भारत नहीं, बल्कि एक नए विश्व का हिस्सा बन गए हैं जहां बौद्धिकता और तर्कसंगत समझ-बूझ की जरूरत नहीं है। जहां हर कोई ट्रंप के कलुषित आदेशों का पालन करता है और उनका उल्लंघन करने का रास्ता खोजने का जरा सा भी प्रयास नहीं करता। (कॉपी: अमरीश हरदेनिया)
Pic Credit : ANI