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कांग्रेस में भी जड़ता टूटेगी

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों से ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि जिस तरह भाजपा में यथास्थिति खत्म हो रही है या जड़ता टूट रही है उसी तरह कांग्रेस में भी जडता टूटेगी। तेलंगाना में यह देखने को मिला है। कांग्रेस ने बिल्कुल नए नेता रेवंत रेड्डी को राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया। कांग्रेस के कई बड़े नेता उनके भी पीछे पड़े थे और प्रदेश के दूसरे रेड्डी नेताओं के साथ उनकी नहीं बन रही थी। लेकिन पार्टी आलाकमान ने उन पर भरोसा दिखाया। इससे नए नेतृत्व का दौर शुरू हुआ है।

माना जा रहा है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की जड़ता टूटेगी और नए लोगों को कमान मिलेगी। सोचें, मध्य प्रदेश में कमलनाथ छह साल से अध्यक्ष थे। वे मुख्यमंत्री बने तब भी अध्यक्ष रहे। उनकी उम्र भी 77 साल हो गई है। अब उनकी जगह नया अध्यक्ष आएगा। मध्य प्रदेश की राजनीति पिछले अनेक बरसों से दो चार पुराने नेता संचालित करते रहे हैं। अब उनके साथ साथ नए नेताओं को पार्टी मौका दे सकती है।

इसी तरह राजस्थान में पिछले 25 साल से सिर्फ दो लोग मुख्यमंत्री हुए। 15 साल अशोक गहलोत मुख्यमंत्री रहे और 10 साल वसुंधरा राजे ने सरकार चलाई। गहलोत 1998 में पहली बार मुख्यमंत्री बने थे। इस बार भी अगर कांग्रेस जीतती तो वे मुख्यमंत्री बनते। हारने के बाद यह तय है कि उनका राजनीतिक सूरज अस्त होगा। उनकी उम्र भी बहुत ज्यादा हो गई है। उनकी जगह नए नेता को कमान मिलेगी। गहलोत के साथ साथ कई नेता राजनीतिक बियाबान में जा सकते हैं। चुनाव हारे और जीते कई नेताओं को हटा कर कांग्रेस नए नेताओं को आगे कर सकती है।

छत्तीसगढ़ सहित दूसरे कई राज्यों में भी यह प्रक्रिया आजमाई जा सकती है। कांग्रेस में ओल्ड गार्ड बनाम नए नेताओं की बहस बरसों से चल रही है। लेकिन पांच राज्यों के चुनाव नतीजों ने इस बहस को निर्णायक अंत की ओर बढ़ा दिया है। चुनाव नतीजों से कांग्रेस आलाकमान को मौका मिल गया है। अगर हार के सदमे से उबर कर कांग्रेस इसे सकारात्मक रुप में लेती है तो वह अपने संगठन का ढांचा पूरी तरह से बदलने के बारे में सोच सकती है। कांग्रेस का कायाकल्प करने की शुरुआत इससे हो सकती है।

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