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न चोर मिला न बोले नेता ही

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के कई सदस्य भले मोंसेरे भाई न हों पर एक-दूसरे को चोर और घोटालेबाज़ बताकर यह ज़रूर साबित करने में लगे हैं कि ‘चोर-चोर मोंसेरे भाई’। अब कौन चोर है और कौन नहीं यह फ़ैसला भले कमेटी की तरफ़ से गठित जाँच कमेटी को करना है लेकिन राजनीति चमकाने के लिए ये सिख नेता पगड़ी उछालने में लगे हुए हैं। पिछले दिनों कमेटी के ही एक नेता ने दिल्ली कमेटी,उप-राज्यपाल और पुलिस को जब इस आशय की शिकायत भेजी और जाँच की माँग की गई तो आरोपी ने भी शिकायत करने वाले नेता और कमेटी पर ही यह आरोप लगा दिया कि कमेटी अपने ऊपर लगे आरोपों से ध्यान भटकाने के लिए इस तरह के आरोप लगा रही है। या यूँ कहिए कि कथित चोर ही कोतवाल को डाँटने लगे।

अजब- ग़ज़ब हैं गुरुद्वारा कमेटी की राजनीति। अब भला कोई यह पूछे कि यह खेल है क्या? तो धर्म प्रचार कमेटी के एक पूर्व नेताजी को उनके ही एक पुराने साथी ने ही पिछले दिनों घेरा है। कह रहे हैं कि धर्म प्रचार कमेटी का सरदार रहते हए इन नेताजी ने लाखों का टेंट घोटाला किया था पर अब जब जबाव की बारी आई तो उल्टे आरोप लगाए जा रहे हैं। मामले ने तूल पकड़ा और दिल्ली के लाटसाहब के साथ साथ पुलिस और कमेटी तक मामला पहुँचा तो शोर सभी ने सुना और जिन्होंने नहीं सुना

उन्हें नेताजी ने समझा दिया । मरता क्या न करता सो कमेटी के सरदार ने तो तीन सदस्यीय जाँच कमेटी बैठाकर यह कहते हए अपनी जान छुड़ाई कि दोषियों को बक्सा नहीं जाएगा। महीनों बीत गए पर जाँच पूरी नहीं हो पाई ।रही बात पुलिस और लाटसाहब की सो वहाँ तो ऐसे मामले रद्दी की टोकरी से ज़्यादा महत्व भी क्या रखते होंगे। अब कौन चोर और कौन साबित होगा ईमानदार ये तो बाद की बात है पर फिलाहल तो कमेटी के अगले चुनावों तक इंतज़ार करना ही होगा।कहा तो जा रहा है कि चुनाव से ऐन मौक़े रिपोर्ट सामने ला दी जाएगी ताकि वोटों का खेल तो कम से कम हो सके वरना तो इस खेला का मतलब भी क्या रह जाना है।

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