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फिलीस्तिनियों के लिए इस्लामी देशों ने क्या किया?

सबसे बड़े दोषीइस्लामिक देशों के शासक ही हैं। जिन्होंने न फिलस्तीन की आजादी के लिए कुछ किया और न ही शिक्षा, विज्ञान और विकास के नए क्षेत्रों में कुछ किया।सिर्फ अपनी सत्ता बचाए रखना और अमेरिका की मदद से खुद की सुरक्षाव्यवस्था को मजबूत रखने के अलावा उन्होंने किसी और उद्देश्य के लिए काम किया ही नहीं। दुनिया बहुत आगे जा रही है। लेकिन नए आधुनिक मूल्यों, वैज्ञानिक विकास, मार्डन एजुकेशन के लिए इनके पास कोई कार्यक्रम नहीं है।

हमास द्वारा इजराइल पर किए आतंकवादी हमले की जितनी निंदा की जाए कम है।मगर उसके बाद इजराइल के गाजा पट्टी पर किए जा रहे हमले भी किसी आतंकवादसे कम नहीं हैं। यह सरकारी आतंकवाद है। जो ठीक उसी तरह का है जैसा 75 सालपहले खुद यहुदियों पर हिटलर ने किया था।

हिटलर ने 60 लाख यहुदियों का नरसंहार किया था। कारण? नफरत और सिर्फ नफरत।हालांकि इतिहास में इसके बहुत सारे कारण है जिनके हवाले हिटलर के द्वारा बताया गया कि वे ऐसे होते हैं और वैसे होते हैं, के अलावा कुछ व्यक्तिगत जो महानमुर्खता के कहलाते हैं कि गांव लौटते वक्त अंधेरे में पीछे से लाठी मारकरकोई मेरी पोटली छीन कर भाग गया था। और वह फलानी जाति का था। या मेरे खेतसे आलू खोद लिए। वह उस समुदाय का था। तो इन आधारों पर उस समुदाय से नफरत करना।

ऐसे ही हिटलर के थे। और ऐसे ही नफरत करने वाले दूसरे लोगों के होतेहैं। हिटलर ने इस नफरत को इतना फैलाया कि हिटलर के बाद भी यहुदियों काजर्मनी में रहना संभव नहीं हो सका। और उनके लिए विश्व समुदाय ने जर्मनीसे करीब साढ़े चार हजार किलोमीटर दूर अरब देशों के बीच एक देश का निर्माणकिया- इजराइल। और उसके बाद जिस नफरत का शिकार खुद यहूदी होकर विस्थापित हुए थे वहीउन्होंने अपने नए मिले देश के आसपास के फिलिस्तीनी नागरिकों से करना शुरूकर दिया। फिलिस्तीन की जमीन पर लगातार अतिक्रमण। इजराइल बढ़ता रहाफिलिस्तीनी आबादी का इलाका सिकुड़तागया। और आसपास के अरब देश थोड़े बहुत विरोध केसाथ देखते रहे।

फिलिस्तिन की बर्बादी की कहानी उतनी ही त्रासद है जितनी जर्मनी मेंयहुदियों के नरसंहार की कहानी। मगर फर्क है। बड़ा फर्क। उस समय पुरीदुनिया पीड़ित यहुदियों के साथ खड़ी थी। मित्र सेना ने जर्मनी पर कब्जा करके हिटलर को अपने अंत तक पहुंचने पर मजबूर कर दिया था। सोवियत रूस केनेतृत्व वाली मित्र राष्ट्रों की सेना यहुदियों को गैस चेंबर से निकालकरवापस खुली हवा में ले आई थी। यहूदियों को एक नया देश इजराइल दे दिया गया था।

मगर आज विश्व समुदाय या तो खामोश है या खुद जर्मनी जिसने बाद मेंयहूदियों को मुआवजे के तौर पैसे अदा किए वह ईरान से बोल रहा है कि गाजापट्टी में इजराइलियों के हमले का फिलिस्तिनियों का समर्थन मत करो। कोईइजाराइल को रोकने वाला नहीं है। हमले मासूम बच्चों पर हो रहे हैं। और जिसनफरत का जिक्र हमने ऊपर किया था कि इसी के नशे में हिटलर ने 60 लाखयहूदियों का नरसंहार किया था। इस नफरत में हमारा मीडिया इजराइल के गाजापट्टी के नागरिकों पर किए जा रहे हमलों का समर्थन कर रहा है। बिजली पानीकाट दिया। अस्पतालों में लाशें रखने की जगह नहीं है। लेकिन मीडिया इस तरहखबरों को बता रहा है जैसे इजराइल कोई बड़ा महान कार्य कर रहा है। मीडियाको उस समय का इतिहास पढ़ना चाहिए। मालूम पड़ेगा कि जैसे वह हत्याओं कासमर्थन कर रहा है वैसा हिटलर के आतंक के बावजूद उस समय के अखबारों नेनहीं किया।

संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह फेल हो गया है। यह समस्या आज की नहीं है। लेबनान और मिस्रके बीच जहां फिलिस्तीन था वहीं यूरोप और अमेरिका ने इजराइल की स्थापनाकी। मगर फिलिस्तीन को खत्म कर दिया। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रुप मेंफिलिस्तीन की स्थापना का समर्थन यूएन सहित दुनिया के सारे देश करते हैं।हमारा देश भारत भी। लेकिन हमारे यहां नफरत इतनी फैला दी गई है किफिलिस्तीन का समर्थन करने वालों के खिलाफ मुकदमे हो रहे हैं। यह जानेबिना कि हमारे देश में फिलिस्तीन का दूतावास है।

भारत सरकार ने अभीफिलिस्तीन राष्ट्र के निर्माण का अपना 75 साल से चल रहा समर्थन दोहरायाहै। यह नफरत हमें कहां ले जाएगी पता नहीं। मगर इतना जरूर गिरा देगी किकोई भी इंसान किसी भी इंसान से नाराजगी के कारण उसके पूरे समुदाय से हीनफरत करने लगेगा। उत्तर प्रदेश में देवरिया इसका बड़ा उदाहरण है। एक भूमिविवाद को लेकर हत्या फिर प्रतिक्रिया में हत्याएं जाति वैमनस्य का मामलाबना दिया गया है। पहले ऐसा नहीं होता था। आज दो जातियों को आमने सामनेखड़ा कर दिया गया है। इसके परिणाम क्या होंगे नफरत की राजनीति करने वालेआज यह नहीं सोच रहे हैं। मगर यह वही आग है जिसने जर्मनी में 60 लाख लोगोंका मरवाया था। जो भी ताकतवर है वह कमजोर को मारेगा यह नफरत से उपजा तरीकापूरी मानवता को तबाह कर देगा।

इंसानी मूल्य पूरी तरह खत्म किए जा रहे हैं। गाजा पट्टी में किए जा रहेनरसंहार को रोकने की विश्व समुदाय की तरफ से कोई कोशिश नहीं की जा रहीहै। हमास आतंकवादी संगठन है। उसके हमले का विरोध का विरोध किस ने नहींकिया। मगर इसको आधार बना कर पूरी गाजा पट्टी खाली करवाना भी आतंकवाद है।

यहां अरब देशों को भी सोचना चाहिए। उन्होंने आज तक इस समस्या को हल करनेके लिए क्या किया? उनके बीच ही इजराइल और फिलिस्तीन बसे हुए हैं। अगर वेगंभीरता से कोशिश करते तो अमेरिका जो इजराइल का सबसे बड़ा समर्थक है औरयूरोपिय देशों को यह समस्या निपटाना पड़ती। यूएन को सक्रिय करना पड़ता।57 इस्लामिक कंट्री हैं। उनका संगठन है। ओआईसी (आर्गनाइजेशन आफ इस्लामिककोपरेशन)। यूएन (संयुक्त राष्ट्र ) के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ासंगठन। मगर इसने क्या किया?  फिलिस्तीन इसका एक सदस्य देश है। उसके लिएइसके घोषित उद्देश्यों में कहा गया है कि उनके अधिकारों और उनकी भूमि कीवापसी।

मगर यह केवल कागज पर लिखा संकल्प ही रह गया। दरअसल सबसे बड़े दोषीइस्लामिक देशों के शासक ही हैं। जिन्होंने न फिलिस्तीन की आजादी के लिएकुछ किया और न ही शिक्षा, विज्ञान और विकास के नए क्षेत्रों में कुछ किया।सिर्फ अपनी सत्ता बचाए रखना और अमेरिका की मदद से खुद की सुरक्षाव्यवस्था को मजबूत रखने के अलावा उन्होंने किसी और उद्देश्य के लिए कामकिया ही नहीं।

दुनिया बहुत आगे जा रही है। लेकिन नए आधुनिक मूल्यों, वैज्ञानिक विकास, मार्डन एजुकेशन के लिए इनके पास कोई कार्यक्रम नहीं है। चाहे इस्लामिककंट्री हों या दुनिया भर के मुसलमान जिनकी संख्या इन इस्लामिक कंट्री मेंरहने वाले मुसलमानों से ज्यादा है बिना शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना और महिलासमानता के दुनिया के बराबर नहीं चल पाएंगे। बहुत पीछे रहे गए हैं। औरपीछे रह जाएंगे।

धर्म अपनी जगह है। सबके धर्म हैं। सबका सम्मान है। मगर जैसे पाकिस्तानपीछे रह गया। और अब उसका अपनी समस्याओं से निकलना भी बहुत मुश्किल हो गयाहै। साथ भारत के ही बना था। मगर भारत ने लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता,उदारता, नेहरू के साइंटिफिक टेंपर ( वैज्ञानिक मिजाज) को चुना औरपाकिस्तान ने धर्म, सेना और सामंतवाद को तो नतीजा सबके सामने है।

हालांकि भारत में भी आज के शासक उसी गलती को दोहराने की कोशिश कर रहेहैं। शायद पाकिस्तान का विनाश उन्हें विकास लग रहा है। इसलिए वे भी धर्मऔर जैसा अभी सेना का प्रयोग अपने प्रचार के लिए और साथ ही प्रगतिशीलमूल्यों के खिलाफ बोलकर सामंतवादी मूल्यों को भी पुनर्जीवित करने कीकोशिश कर रहे हैं। भारत आगे बढ़ा था उदार मूल्यों के साथ। नफरत और विभाजनकी राजनीति उसे वापस पीछे ले जाएगी।

खाली विश्व गुरु कहने से कुछ नहीं होता। युक्रेन-रुस युद्ध रुकवा दिया था के दावे करने से केवल उपहास उड़ता है। विश्व नेतृत्व करने का अधिकार देता है प्रेम, उदारता विश्व दृष्टि से। केवल बातें करने से कुछ नहीं होता। दुनिया में एक मौका है। इजराइल-फिलिस्तिन मामले का उपयोग देश में नफरत बढ़ाने के लिए न करके इस समस्या के हल की गंभीर कोशिश करके आप वास्तविक विश्व गुरु बन सकते हैं। सिर्फ दोनों पक्ष ही नहीं पुरी दुनिया भारत कोसम्मान और विश्वास के साथ देखती है। और 2004 के बाद से नहीं हमेशा से।नेहरू की गुट निरपेक्ष नीति के कारण। चुनाव तो आएंगे चले जाएंगे। मगरविश्व में एक बार साख बन गई तो वह इन दस साल के शासन से कई गुना ज्यादानाम और सम्मान दे जाएगी।

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