Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

कॉलेजियम का विकल्प क्या एनजेएसी है?

collegium

collegium  : उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और तबादले की मौजूदा कॉलेजियम प्रणाली की जगह क्या राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी एनजेएसी का विकल्प ज्यादा बेहतर है? इस पर एक बार फिर बहस छिड़ी है।

दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के घर कथित तौर पर भारी मात्रा में नकदी की बरामदगी के बाद यह चर्चा शुरू हुई है। कहा जा रहा है इस तरह की घटनाओं से न्यायपालिका की साख खराब हो रही है। लोगों का भरोसा उठ रहा है और न्याय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।

यह भी कहा जा रहा है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि कॉलेजियम प्रणाली के तहत जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं। इसके बरक्स यह दलील दी जा रही है कि अगर जजों की नियुक्ति की यह आंतरिक प्रक्रिया समाप्त कर दी जाए (collegium )

राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बना कर उसके जरिए नियुक्ति हो तो अदालतों में भाई भतीजावाद भी बंद हो जाएगा और भ्रष्टाचार के मामले भी समाप्त होंगे। इससे न्यायपालिका की साख बहाल होगी।

सुनने में यह तर्क बहुत अच्छा लग रहा है। किसी को यह बात अपील करेगी कि जज खुद ही जजों की नियुक्ति करते हैं तो वे क्यों नहीं अपने जानने वालों को या अपने रिश्तेदारों को तरजीह देंगे? (collegium )

also read: IPL 2025: देशप्रेम की मिसाल! CSK की प्रैक्टिस छोड़ सेना के जवानों के बीच पहुंचे MS धोनी

पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में एक खास किस्म के इकोसिस्टम के जरिए इस नैरेटिव को स्थापित किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों के बेटे, बेटियां या भाई, भतीजे ही जज बनते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के पिछले चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के हवाले से यह नैरेटिव ज्यादा मजबूती से प्रचारित हुआ। लोगों को बताया गया कि उनके पिता भी देश के चीफ जस्टिस रहे थे। (collegium )

ऐसा नहीं है कि न्ययापालिका की साख खराब करने वाला प्रचार सिर्फ नियुक्ति और भाई भतीजावाद तक सीमित है। पिछले कुछ समय से दक्षिणपंथी विचार वाले सोशल मीडिया अकाउंट्स के जरिए और दक्षिणपंथी विचार वाले कानूनी जानकारों के लेखों और भाषणों के जरिए सुनियोजित ढंग से न्यायपालिका को निशाना बनाया जा रहा है।

फैसलों में देरी के हवाले दिए जा रहे हैं। अदालतों में लंबित मुकदमों को मुद्दा बनाया जा रहा है। लंबी छुट्टियों के लिए अदालतों को टारगेट किया जा रहा है। (collegium )

किसी जज या वरिष्ठ वकील के रिश्तेदार जज बनते हैं तो उसके हवाले कॉलेजियम प्रणाली को निशाना बनाया जा रहा है और अगर बीच में कहीं भ्रष्टाचार का कोई मामला आ गया तब तो पूरा सिस्टम ही न्यायपालिका पर टूट पड़ रहा है। याद नहीं आता है कि आजाद भारत में कभी न्यायपालिका इस तरह निशाने पर रही हो।

साख खराब की जा रही है? ( collegium ) 

तभी यह खटका होता, संदेह पैदा होता है कि आखिर अचानक न्यायपालिका को क्यों इतना निशाना बनाया जा रहा है? क्यों उसकी साख खराब की जा रही है? (collegium )

क्या विधायिका पर नियंत्रण, प्रतिबद्ध कार्यपालिका और प्रतिबद्ध मीडिया के बाद अब प्रतिबद्ध न्यायपालिका की जरुरत है? क्या न्यायपालिका की स्वतंत्रता को पूरी तरह से कार्यपालिका या विधायिका के अधीन लाने की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए यह सब किया जा रहा है?

जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण के बाद जिस तरह से कॉलेजियम प्रणाली के खिलाफ माहौल बनाया जा रहा है और एनजेएसी की चर्चा शुरू हुई उससे संदेह और गहरा होता है।

संसद के बजट सत्र के दौरान इस बात पर सहमति बनाने का प्रयास हो रहा है। सरकार और विपक्षी पार्टियों की साझा सहमति से विधायिका की सर्वोच्चता बनाने की बात हो रही है। सबको पता है कि भारत में विधायिका की सर्वोच्चता का मतलब कार्यपालिका की सर्वोच्चता होता है।

भारत में अमेरिका या दुनिया के दूसरे लोकतांत्रिक देशों की तरह विधायिका पूरी तरह से स्वायत्त नहीं है। उसमें वही काम होता है, जो सरकार चाहती है। तभी विधायिका की सर्वोच्चता की बात संदेह पैदा करती है। (collegium )

कहा जा रहा है कि एनजेएसी या इस तरह का कोई अधिकरण बनेगा तो जजों द्वारा जजों की नियुक्ति का सिस्टम बंद होगा और एक स्वायत्त संस्था जजों की नियुक्ति करेगी।

लेकिन सवाल है कि क्या एनजेएसी या ऐसी कोई भी संस्था स्वायत्त होगी या कार्यपालिका के नियंत्रण वाली होगी? यह भी सवाल है कि क्या जजों की नियुक्ति का मामला पूरी तरह से कार्यपालिका के हाथ में दिया जा सकता है? (collegium )

सिफारिशों को सरकार मंजूरी दे

आज देश की बाकी तमाम संस्थाएं जिस तरह पूर्वाग्रह के साथ काम कर रही हैं, तमाम एजेंसियां और संवैधानिक वैधानिक संस्थाएं जिस तरह से राजनीतिक और वैचारिक विपक्ष को सरकार का दुश्मन मान कर उनके खिलाफ एकतरफा कार्रवाई कर रही है, क्या गारंटी है कि जजों की नियुक्ति वाला पैनल उसी अंदाज में काम नहीं करेगा और उसके बाद न्यायपालिका भी पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में नहीं आ जाएगी?

वैसे जजों की नियुक्ति का जो मौजूदा सिस्टम है उसमें भी सरकार की बड़ी भूमिका है। ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम जिसका नाम भेज दे वह जज हो ही जाता है। सरकार जिसकी चाहे उसकी सिफारिश रोक सकती है।

यहां तक कि दोबारा भेजी गई सिफारिशें भी रोकी जा सकती हैं। खुफिया सूचना के आधार पर सरकार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिशें रोकती रही है। (collegium )

लोगों को ध्यान होगा कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने रोने लगे थे। हाथ जोड़ कर अनुरोध कर रहे थे कि कॉलेजियम की ओर से भेजी गई सिफारिशों को सरकार मंजूरी दे दे।

कितनी बार सुप्रीम कोर्ट को चलती सुनवाई के बीच सरकार से कहना पड़ा है कि वह सिफारिशें लटकाए नहीं। लेकिन सरकार पास एक सीमित वीटो का अधिकार है, जिससे वह जजों की नियुक्ति की सिफारिशें रोक देती है।

अगर सरकार इससे भी ज्यादा अधिकार चाहती है, संपूर्ण वीटो चाहती है तो इसका मतलब है कि वह न्यायपालिका को नियंत्रित करना चाहती है। यह स्थिति कॉलेजियम के मौजूदा सिस्टम से ज्यादा खतरनाक हो सकती है। (collegium )

चीफ जस्टिस जज रिटायर होते ही सांसद

जस्टिस यशवंत वर्मा प्रकरण के बाद कॉलेजियम बनाम एनजेएसी को लेकर जो विवाद छिड़ा है और जैसी सक्रियता दिखाई दे रही है उससे इस वजह से भी संदेह पैदा होता है कि न्यायपालिका के वैचारिक भ्रष्टाचार या वैचारिक विचलन को देख कर इतनी प्रतिक्रिया क्यों नहीं होती है?

आर्थिक भ्रष्टाचार या पैसा मिलने की बात को लेकर जितना आक्रोश सत्तापक्ष के लोगों में दिख रहा है और सोशल मीडिया में जैसा माहौल बनाया जा रहा है वैसा आक्रोश वैचारिक विचलन को लेकर क्यों नहीं बनाया जाता है? (collegium )

इसका मकसद जस्टिस यशवंत वर्मा का बचाव करना नहीं है लेकिन क्या जस्टिस शेखर यादव का बयान कम चिंताजनक है। इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस शेखर यादव ने कहा कि भारत बहुसंख्यकों के हिसाब से चलेगा, कानून उन्हीं के हिसाब से काम करेगा और कठमुल्ले देश के लिए खतरनाक हैं।

क्या यह बयान न्यायिक आचरण वाला है और न्यायपालिका की गरिमा बढ़ाने वाला है? लेकिन इस बयान पर वैसी कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, जैसी जस्टिस वर्मा के यहां पैसे मिलने पर हो रही है। इसका मतलब है कि सिर्फ आर्थिक भ्रष्टाचार ही भ्रष्टाचार है और वैचारिक भ्रष्टाचार की इजाजत है!

सोचें, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रिटायर होते ही राज्यपाल बन जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जज रिटायर होते ही सांसद बन जा रहे हैं। (collegium )

हाई कोर्ट के जज बहुसंख्यक हितों की बात कर रहे हैं और खुलेआम अल्पसंख्यकों के खिलाफ बोल रहे हैं और इस्तीफा देकर एक खास पार्टी से चुनाव लड़ कर सांसद बन जा रहे हैं।

क्या यह भी कॉलेजियम के कारण हो रहा है? चिंता की बात यह है कि जब सरकार के पास जजों की नियुक्ति में सीमित वीटो का अधिकार है तब तो न्यायिक अधिकारियों में इतना वैचारिक विचलन दिख रहा है। अगर सब कुछ सरकार के हाथ में चला गया तो क्या होगा? (collegium )

Exit mobile version