कामकाजी लोगों में तनाव बना चिंता की वजह

विलिस टावर वाटसन की ओर से कराए गए इंडिया हेल्थ एंड वेलबिंग स्टडी के एक ताजा अध्ययन से इसका पता चला है। अब कई कंपनियों ने कर्मचारियों का तनाव दूर करने की दिशा में पहल की है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 66 फीसदी कर्मचारी तनाव के शिकार हैं। दफ्तरों में कामकाज के माहौल और कर्मचारियों की मानसिक व शारीरिक स्थिति पर किए गए अध्ययन में कहा गया है कि कर्मचारियों में बढ़ता तनाव नियोक्ताओं के लिए गहरी चिंता का विषय बनता जा रहा है। देश के लगभग 66 फीसदी यानी दो-तिहाई नियोक्ताओं ने अपने कर्मचारियों के तनाव व मानसिक स्वास्थ्य से निपटने की कारगर रणनीति बनाने की दिशा में ठोस पहल की है और 17 फीसद नियोक्ता वर्ष 2021 तक ऐसा करने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन आखिर कर्मचारियों में लगातार बढ़ते इस तनाव की वजह क्या है। अध्ययन में वित्तीय तंगी, बढ़ता मोटापा और तंबाकू के इस्तेमाल को प्रमुख वजहें बताया गया है। शारीरिक गतिविधियां नहीं के बराबर होने की वजह से कर्मचारियों में बढ़ते मोटापे का असर उनके कामकाज पर भी पड़ रहा है।

इससे पहले बीते साल अगस्त में एक संगठन ओप्टम ने अपने सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा था कि भारत में लगभग आधे कर्मचारी किसी ने किसी तरह के तनाव के शिकार हैं। उसने 70 बड़ी कंपनियों के लगभग आठ लाख कर्मचारियों के बीच सर्वेक्षण के बाद अपनी यह रिपोर्ट तैयार की थी। ओप्टम इंडिया ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि काम, पैसा और परिवार तनाव की प्रमुख वजहें हैं। इसके अलावा माता-पिता की जिम्मेदारी निभाना, गर्भधारण, तबादले के बाद शहर बदलना और समाज से कट जाने जैसी चीजों की भी तनाव को बढ़ाने में अहम भूमिका रहती है। संगठन के व्यापार प्रमुख (भारत) अंबर आलम कहते हैं, निजी व पेशेवर वजहों से होने वाली चिंता तनाव बढ़ाती है। इसका असर कर्मचारियों की उत्पादकता पर पड़ना लाजिमी है। वह कहते हैं कि बीते खासकर डेढ़-दो वर्षों कंपनियों में होने वाले ढांचागत बदलावों ने कर्मचारियों को मन में नौकरी के प्रति असुरक्षा की भावना पैदा कर दी है।

नौकरीपेशा लोगों को अपना सामाजिक स्टेट्स बनाए रखने के लिए हर साल देश-विदेश घूमने भी जाना होता है। इस पर होने वाला खर्च भी उन पर दिमागी बोझ बढ़ाता है। आईबीएम इंडिया के मानव संसाधान विभाग के प्रमुख चैतन्य एन। श्रीनिवास कहते हैं, तेजी से होने वाले शहरीकरण ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है। लोग नौकरी के लिए बड़े शहरों में पहुंच रहे हैं। वहां परिवार का समर्थन नहीं मिलता है। उनको घर से दफ्तर आने-जाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे कामकाज और जीवन का संतुलन गड़बड़ा जाता है। आरपीजी समूह भी अब कर्मचारियों की सहायता के लिए काउंसेलरों की नियुक्ति पर विचार कर रहा है। रेकेम आरपीजी के मानव संसाधन प्रमुख प्रतिमा सालुंखे बताती हैं, हर जगह एक-एक ऐसे काउसंलेरों की नियुक्ति की जाएगी। इसके अलावा तनाव कम करने के कई अन्य उपायों पर भी विचार किया जा रहा है।

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