महाबलियों का अखाड़ा और शांति की कोशिशें

दुनिया की नजरें एक बार उत्तर कोरिया पर टिकी हैं। साल भर के भीतर यह दूसरा मौका है जब उत्तर कोरिया के शासक किम जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फिर से शिखर वार्ता की मेज पर बैठे हैं। पिछली बार शिखर वार्ता सिंगापुर में हुई थी। इस बार इसकी मेजबानी का मौका वियतनाम को मिला है। इस वार्ता की कामयाबी को लेकर दुनिया के कई देश तो उम्मीदें लगाए हुए हैं ही, दक्षिण कोरिया सबसे ज्यादा उत्साहित है। दक्षिण कोरिया उत्तर कोरिया का एकमात्र पड़ोसी भी है और अमेरिका सबसे घनिष्ठ और भरोसेमंद सहयोगी भी। एक तरह से पूर्व में वह अमेरिका का सैन्य ठिकाना है। इसलिए इस शिखर बैठक की सफलता या नाकामी दक्षिण कोरिया को हर तरह से प्रभावित करने वाली है। उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया पिछले छियासठ साल से एक-दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहा रहे। हालांकि पिछले साल सीमा पर दोनों देसों के शासकों की मुलाकात ने उम्मीद की एक किरण तो पैदा की है। पूरी दुनिया मान रही है और दोनों कोरियाई देशों की जनता भी कि अगर जर्मनी की दावीर गिर सकती है तो दोनों कोरिया फिर से एक क्यों नहीं हो सकते। हालांकि इसके मूल कारण जर्मनी से अलग हो सकते हैं, लेकिन एकीकरण का नतीजा शांति और प्रेम का रास्ता दिखाने वाला ही होगा।

इसी उम्मीद में ट्रंप और किम फिर से बैठे हैं। ट्रंप उत्तर कोरिया को परमाणु-शक्ति विहीन राष्ट्र के रूप में देखना चाहते हैं। पिछले साल शिखर वार्ता के पहले तक किम जोंग उन और ट्रंप ने जिस तरह का अड़ियल और हमलावर रुख अपना रखा था उससे एक बार तो लगने लगा था कि कहीं ये दोनों तानाशाह प्रवृत्ति वाले सिरफिरे ये नेता दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध में तो नहीं झोंक देंगे। लेकिन पहली शिखर वार्ता ने इन आशंकाओं को खत्म कर दिया था। दुनिया इसे ट्रंप की तो जीत मान ही रही थी, लेकिन किम अपनी कूटनीति से ट्रंप से भी बड़े हीरो साबित हुए।

जो सवाल साल भर पहले थे, वही आज भी हैं। तब भी किम के पास खोने को कुछ नहीं था, सब उनके हासिल में ही जाने वाला था। अगर खोने को था तो वह ट्रंप के पास। लेकिन आज दोनों के सामने आगे बढ़ने की चुनौती पहले से कहीं बड़ी है। अगर यह वार्ता कामयाब रहती है तो दक्षिण और उत्तर कोरिया के बीच छह दशक से भी पुराना युद्ध खत्म होने का एलान हो सकता है। इसका सबसे पहला और बड़ा असर यह भी पड़ेगा कि किम जोंग उन कुछ समय से लिए परमाणु कार्यक्रम छोड़ने पर राजी हो सकते हैं। हालांकि पिछले एक साल में उत्तर कोरिया ने ऐसा कोई परीक्षण नहीं किया है जो उकसावे या उसके और परमाणु शक्ति संपन्न होने का प्रमाण देता हो। लेकिन इस हकीकत से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उत्तर कोरिया आज की तारीख में एटमी युद्ध की सारी तकनीकियां हासिल कर चुका है और दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। हाइड्रोजन बम बना लेना उसकी सबसे बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। अब मुकाबला उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया के बीच नहीं बल्कि अमेरिका और चीन के बीच है। उत्तर कोरिया के साथ चीन है तो दक्षिण कोरिया के साथ अमेरिका। ऐसे में दोनों कोरियाई प्रायद्वीपों की शांति दो महाबलियों के अखाड़े में तय होगी।  

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