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नई रणनीति अपना रहे हैं माओवादी?

पश्चिम बंगाल के पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि 1990 के दशक के आखिरी दौर में भी इलाके में इसी तरह के राजनीतिक फेरबदल की वजह से माओवादियों को अपने पांव जमाने में सहायता मिली थी। 

वर्ष 2010-11 के दौरान तो किशनजी के नेतृत्व में माओवादियों ने झाड़ग्राम के अलावा पुरुलिया, बांकुड़ा व पश्चिमी मेदिनीपुर के ज्यादातर हिस्सों पर अपनी पकड़ बना ली थी। किशनजी की मौत के बाद रातोंरात माओवादी संगठन बिखर गया था। उसके बाद राज्य समिति का  वजूद ही खत्म हो गया था। बाकी सदस्यों ने या तो हथियार डाल दिए थे या फिर पकड़े गए थे।

किसी दौर में इलाके में पांच सौ से ज्यादा माओवादी सक्रिय थे। वर्ष 2008 से 2011 के बीच इस संगठन ने लगभग सात सौ लोगों की हत्या की थी। अब आकाश की अगुवाई वाला दस्ता दोबारा राज्य समिति के गठन का प्रयास कर रहा है। वह अब अपने पुराने नेटवर्क को दोबारा बहाल करने में भी जुटा है।

सरकारी सूत्रों का कहना है कि संगठन फिलहाल नेतृत्व और काडरों की कमी से जूझ रहा है। इसे पाटने के लिए ही माओवादी अब शहरी और बुद्धिजीवी 
युवाओं के अलावा दलितों और आदिवासियों को संगठन में शामिल करने का प्रयास कर रहे हैं। अब अर्बन नक्सल के मुद्दे पर तेज होती बहस के बीच संगठन के नेता बुद्धिजीवी युवाओं की तलाश में जुट गए हैं। 

संगठन के पोलित ब्यूरो सदस्य और पूर्वी क्षेत्र के प्रमुख प्रशांत बोस उर्फ किशनदा ने भी इसकी पुष्टि की है। बोस ने पार्टी के मुखपत्र लालचिंगारीप्रकाशन में अपने ताजा लेख में कहा है कि संगठन में शिक्षित युवकों की कमी के चलते नेतृत्व की दूसरी कतार नहीं पनप सकी है। 

बोस ने अपने लेख में कहा है, ‘नेतृत्व की दूसरी कतार तैयार करना फिलहाल संगठन के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।’ इससे पहले बीते साल संगठन ने बूढ़े और शारीरिक रूप से अनफिट नेताओं के लिए एक रिटायरमेंट योजना तैयार की थी। इसके तहत ऐसे लोगों को भूमिगत गतिविधियों से मुक्त कर उनको संगठन के पुनर्गठन के काम में लगाया जाना था।

बोस ने लिखा है, ‘बंगाल के अलावा असम, बिहार और झारखंड में संगठन ने दलितों, आदिवासियों और गरीबों के बीच खासी पैठ बनाने में कामयाबी हासिल की है। शिक्षित युवाओं की कमी पूरी करने के लिए संगठन को काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। हमने तमाम समितियों से शिक्षित काडरों को अपने युद्धक्षेत्र में भेजने को कहा है। इससे नेतृत्व की दूसरी और तीसरी पीढ़ी तैयार करने में सहायता मिलेगी।’

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों से पहले माओवादी की ताजा गतिविधियां सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती हैं। इसी वजह से बंगाल और झारखंड पुलिस इन गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए सीमावर्ती इलाकों में साझा अभियान चलाने पर विचार कर रही हैं।

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