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फिर से गोलबंद हो रहे हैं माओवादी?

साल 2011 में शीर्ष नेता किशनजी की मौत के बाद बंगाल में माओवादियों का सफाया हो गया था। उसके बाकी काडर इधर-उधर बिखर गए थे। बीती जुलाई से वह लोग दोबारा एकजुट होने का प्रयास कर रहे हैं। इसके लिए इलाके में परचे बांटे जा रहे हैं। दूसरी ओर, नेतृत्व के संकट और जमीनी स्तर पर काडरों की कमी से निपटने के लिए भाकपा (माओवादी) अब शहरी और बुद्धिजीवी युवाओं के अलावा दलितों और आदिवासियों को संगठन में शामिल करने का प्रयास कर रहा है।

पश्चिम बंगाल के झारखंड से लगे इलाकों में नए सिरे से तेज होती माओवादी गतिविधियों ने पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। भूमिगत संगठन भाकपा (माओवादी) के पश्चिम बंगाल समिति के सचिव असीम मंडल उर्फ आकाश की अगुवाई में एक सशस्त्र गिरोह के विभिन्न इलाकों में देखे जाने के बाद खतरे की घंटी बजने लगी है। इसी साल जून और जुलाई में झारखंड में सुरक्षा बल के सात जवानों की हत्या के बाद वहां माओवादियों के खिलाफ अभियान तेज होने के बाद इस गिरोह के बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में शरण लेने का अंदेशा है।

पुलिस के एक शीर्ष अधिकारी कहते हैं, किशनजी की मौत के बाद इलाके से माओवादियों का सफाया जरूर हो गया था। लेकिन पुरुलिया व झाड़ग्राम में अब भी उनसे सहानुभूति रखने वाले सैकड़ों लोग हैं। राज्य के पश्चिमी मेदिनीपुर जिले के चंद्रकोना टाउन के रहने वाले आकाश के गिरोह में रामप्रसाद मारडी, दिलीप सिंह सरदार, कमल माइती, मदन महतो और उसकी पत्नी जोबा शामिल हैं। आकाश सीधे भाकपा (माओवादी) के पूर्वी क्षेत्र के प्रमुख प्रशांत बोस उर्फ किशन दा को रिपोर्ट करता है। वर्ष 2011 में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में किशनजी समेत कई शीर्ष नेता मारे गए। अब आकाश संगठन की पश्चिम बंगाल समिति का इकलौता जीवित सदस्य है।

हाल ही में इलाके का दौरा करने वाले केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के महानदिशेक राजीव राय भटनागर कहते हैं, राज्य के पश्चिमी इलाकों में माओवादी गतिविधियां तेज हुई हैं। झाड़ग्राम में माओवादियों के दोबारा संगठित होने की खबरें भी मिल रही हैं। पहले राज्य के चार जिले माओवाद-प्रभावित जिलों की सूची में थे, लेकिन केंद्र की ओर से जारी ताजा सूची में सिर्फ झाड़ग्राम का ही नाम है।

समझा जाता है कि माओवादी इलाके में बने नए राजनीतिक समीकरणों का फायदा उठाने का प्रयास कर सकते हैं। इसी साल मई में हुए पंचायत चुनावों में इन इलाकों में बीजेपी को काफी कामयाबी मिली थी। उसके बाद इलाके में तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच हिंसक संघर्ष की घटनाएं भी बढ़ी हैं। इलाके में दो बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या भी हो चुकी है। खासकर झाड़ग्राम व पुरुलिया पर सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।

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