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विकास की कसौटी और हकीकत

कामयाबी या नाकामी के मुकाम के पर हम कहां खड़े हैं, यह हमें दुनिया के पैमानों से पता चलता है। दुनिया में यह व्यवस्था लंबे समय से चला आ रही है जिसमें वैश्विक संस्थानों के पायदान और रेटिंग तुलना करके देशों की उपलब्धियों और खामियों को दुनिया के सामने रखते हैं। इनमें कुठ हद तक सच्चाई होती भी है और कुछ हद तक नहीं भी। जबकि हर देश अपनी अलग हकीकत लिए होता है। ऐसे में सवाल यह सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि हकीकत की कसौटी पर ये पैमाने कितनी सही तस्वीर पेश करते हैं।

हाल की बात तो यह है कि अर्थव्यवस्था के मामले में भारत ने जी-20 देशों को पछाड़ा है। यह बात विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) ने अपनी एक रिपोर्ट में कही है। रिपोर्ट में बताया गया है कि न केवल घरेलू मोर्चे पर, बल्कि वैस्विक व्यापार में भी भारत समूह बीस के देशों से आगे है। इसी पैमाने पर भारत पिछले साल 62 अंकों पर था, और इस बार 58 अंक पर आ गया है। जबकि हमारे पड़ोसी पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेस सौ अंक से भी नीचे हैं। डब्ल्यूईएफ ने दुनिया के एक सौ चालीस देशों की अर्थव्यवस्था पर यह रिपोर्ट बनाई है। विकसित देसों पर नजर डालें तो यह रिपोर्ट बता रही है कि स्विटजरलैंड इस बार पहले से चौथे नंबर खिसक गया है, जो पिछले नौ साल से पहले नंबर बना हुआ था। इनोवेशन यानी नया करने की दिसा में अमेरिका दुनिया में सबसे आगे हो गया।

पर सवाल है हमारी अर्थव्यवस्था में क्या ऐसा कुछ होता नजर आ रहा है जिसे संतोषप्रद माना जा सके। भारतीय अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत से ऐसे संकेत नहीं मिल रहे हैं। देश में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कुपोषण, भष्ट्राचार, बुनियादी सुविधाएं सब में हालात खराब हैं। देश में बेरोजगारी जिस तेजी से बढ़ रही है, उसका सरकार के पास कोई समाधान नहीं है। सरकार ने भारी तादाद में सरकारी नौकरियों में कटौती की है। इससे सरकारी नौकरियों के दरवाजे तो एक तरह से बंद हो ही चुके हैं। हालांकि इसे बड़े आर्थिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है। निजी क्षेत्र में तो रोजगार के हालात और बदतर हैं। श्रम कानूनों को आसान और उदार बनाने के नाम मालिकों के हितों में बनाया जा रहा है। कई क्षेत्रों में छंटनी जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। इसी तरह जहां तक शिक्षा क्षेत्र का सवाल है प्रथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा क्षेत्र तक दिशाहीनता की स्थिति में है। आज भी ग्रामीण भारत के बड़े हिस्से में प्राथमिक शिक्षा की स्थिति खराब है। स्कूलों के लिए इमारतें नहीं हैं। छतें टूट कर गिर जाती हैं और बच्चे घायल हो जाते हैं, शहरों तक में ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। आज भी देश में बड़ी संख्या में स्कूल ऐसे हैं जहां बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं और खासतौर से लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं हैं, इस वजह से बच्चे बीच में स्कूल जाना छोड़ देते हैं। यह ड्रॉप-आउट दर काफी ज्यादा है। छीक दूसरी ओर उच्च शिक्षा क्षेत्र निजी क्षेत्र के हवाले कर शिक्षा को गुणवत्ता के नाम पर इतना महंगा बना दिया गया है कि आम आदमी उसके बारे में सोच ही नहीं पाता। स्वास्थ्य क्षेत्र तो खुद ही बीमार है। देश के दूसरे शहरों और गांव-कस्बों की बात तो दूर की है, राजधानी दिल्ली तक के अस्पतालों में लोगों के हाथ-पैर फूल जाते हैं। 

सुविधाएं नहीं हैं, डॉक्टरों की बेहद कमी है। हाल ही में दिल्ली में डिप्थीरिया से कई बच्चे मर गए और इसकी वडह यह थी कि इस बीमारी के टीके अस्पताल में नहीं थे। कहने को हम भले दावा करते रहें कि हम फ्रांस से आगे हैं, जी-20 से आगे निकल रहे हैं, पर आंकड़ों का ये विकास बेमानी है। खुशहाल और विकास के रास्ते पर बढ़ने वाला देश वह होता है जहां लोग खुश होते हैं। सेचिए जरा, क्या भारत में ऐसा है!
 

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