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कहां ले जाएगी हथियारों की होड़

दुनिया एक बार फिर खुले तौर पर हथियारों की होड़ के लिए तैयार है। हालांकि पिछले छह-सात दशकों में तमाम संधियों और प्रतिबंधों के बावजूद तमाम देश हथियार बनाने, बेचने और जमा करने से बाज नहीं आए और शीत युद्ध के दौरान जो हथियार नियंत्रण का समझौता हुआ था, वह दिखावे का ही बना रहा। सिर्फ महाशक्तियां ही नहीं, छोटे देश भी हथियार संपन्न होने की दिशा में तेजी से बढ़े। बड़े देशों, विशेषरूप से अमेरिका, रूस चीन, फ्रांस जैसे देशों का तो कारोबार ही हथियार का बन गया। इसके अलावा जो छोटे देश परमाणु शक्ति संपन्न होने की दिशा में बढ़े, उन पर लगाम कसी जाने की कवायदें हुईं। इन हथियारों के लिए प्रदर्शन के लिए दुनिया के कई देशों को युद्ध के मैदान में तब्दील कर दिया गया। इससे दुनिया को यह पता चला कि ताकतकवर देश कितने हथियार संपन्न हैं कि मिनटों में दुनिया को खत्म कर सकते हैं। आधुनिक विश्व के लिए यह स्थिति आज ज्यादा चिंताजनक है।

अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एलान कर दिया है कि परमाणु हथियारों को लेकर उसने रूस के साथ तीन दशक पुरानी जो संधि कर रखी है, अमेरिका उसे अब तोड़ देगा और फिर से हथियार बनाएगा। यानी अमेरिका अब मध्मयम दूरी की एटमी मिसाइलें फिर से बनाएगा। साल 1987 में अमेरिका के राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन और तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिकाइल गोर्बाचेव ने इस तरह के एटमी हथियार नहीं बनाने को लेकर संधि की थी। इसके तहत दोनों देश इस बात पर सहमत हुए थे कि पांच हजार चार सौ बहत्तर किलोमीटर तक मार करने वाली एटमी मिसाइलों के निर्माण, तैनाती और इसके परीक्षण पर पाबंदी रहेगी। इस संधि की अवधि अगले दो साल में पूरी हो जाएगी। अगर दोनों देश इस संधि से हटते हैं तो उसके नतीजे भयानक होंगे। दोनों ही तेजी से इन मिसाइलों को बनाएंगे, अपने और अपने सहयोगी देशों के यहां तैनात करेंगे और फिर जरूरत पर इनके जरिए अपनी अपनी ताकत का एहसास कराएंगे।

पिछले तीन-चार दशकों में दुनिया का शक्ति संतुलन बदलता है। लंबे समय तक दुनिया की दो महाशक्तियां अमेरिका और रूस रहे। लेकिन रूस के विखंडन के बाद अमेरिका को ताकत समिली और वह अकेला दुनिया में सबसे ताकतवर बनता चला गया। इसी दौरान चीन ने दुनिया में अपने को बड़ी परमाणु ताकत के रूप में विकसित करते हुए अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। एक बड़ी परमाणु शक्ति के रूप में चीन के उभरने से आज के परिदृश्य में यह वैश्विक शक्ति संतुलन बदला है। आज रूस और चीन की साझा ताकत से अमेरिका से परेशान है। इसीलिए उसने रूस के साथ तीन दशक पुरानी संधि से हटने का एलान करते हुए कहा है कि जब तक रूस और चीन हमारे पास आकर यह आश्वस्त नहीं कराते कि हम तीनों में से कोई हथियार नहीं बनाएगा, तब तक अमेरिका हथियार बनाना जारी रखेगा।

सवाल है कौन हथियार बनाए और कौन नहीं। हर देश को अपनी संप्रभुता की रक्षा और सीमाओं व नागरिकों सुरक्षा के लिए वे सारे कदम उठाने का अधिकार होना चाहिए, जो दुनिया के दूसरे महाबली देशों को हैं।

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