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नौ वर्षो की बरबादियां!

रणनीति

तय कर सकना मुश्किल है। इसलिए भी क्योंकि मैं नोटबंदी के बाद से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी रीति-नीति का आलोचक हूं। मोदी राज ने मुझे हिंदू बुनावट की ऐसी गुत्थियों में उलझाया है कि जहां असलियत दिखलाने के लिए नरेंद्र मोदी का धन्यवाद है वही यह निष्कर्ष भी है कि यह क्या इतिहास बनवा रहे है मोदी अपना! देश-समाज-नस्ल कीकितनी तरह की बरबादियों के बीज जिंदा कर डाले है या नए बना डाले है।  आगे कोई भी पार्टी, किसी भी नेता की सरकार बने होना अब वही है जो हम हिंदुओं का इतिहास रहा है। चिंगारियां लिए हुआ ऐसा कलही और भयाकुल देश बनता हुआ है जिसके चारों कोनों (बंगाल, पंजाब, कश्मीर घाटी और केरल) में जब भी आग भड़की तो उसे देश में फैलने से कोई फायर ब्रिग्रेड रोक नहीं पाएगी। संक्षेप में गौर करें बरबादियों के पुराने और नए बीजों के बीजारोपण पर-

सजृनात्मकता-साक्षरता विलुप्त- हां, भारत में क्रिएटिवीटी, सृजनात्मकता के हर पहलू में अब सूखा है। न रंगमंच आबाद और  न शास्त्रीय गायन-वादन, कला, चित्रकार, साहित्य- संगीत में कभी कोई धूम।  और तो औरबालीवुड का अर्थ भी अबपठान बनाम द केरला स्टोरी। दक्षिण भारतीय फिल्मों के बूते उत्तर भारत के हिंदीभाषी दर्शक बाहुबली होते हुए।  साक्षरता के नाम पर या तो डिग्रीधारी वे नौजवान जो सोशल मीडिया से टाइमपास करते हुए या भक्त हरकारे…

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