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यह एकादशी दिव्य फल प्रदात्री

अशोक प्रवृद्ध
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(image) पौराणिक मान्यतानुसार वैष्णवों के लिए प्रत्येक महीने के कृष्ण व शुक्ल में पड़ने वाली एकादशी का व्रत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। प्रत्येक वर्ष चौबीस एकादशियाँ होती हैं, लेकिन जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर छब्बीस हो जाती है। वैष्णव इन सभी एकादशी की तिथियों में विविध मनोवांछित कामनाओं की प्राप्ति के उद्देश्य से विधि - विधान पूर्वक व्रत करते हैं ।पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार प्राचीन काल से ही वर्ष की तीसरी अर्थात बैशाख मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की तिथि को भी वैष्णव जन एकादशी व्रत का आयोजन करते हैं। वैशाख कृष्ण पक्ष की एकादशी को वरूथिनी कहा जाता है। विविध पुराणों में वरुथिनी या वरूथिनी एकादशी को वरूथिनी ग्यारस भी कहा जाता है। पुण्यदायिनी, सौभाग्य प्रदायिनी एकादशी वैशाख कृष्ण एकादशी को आती है। सुख सौभाग्य की प्रतीक वरूथिनी एकादशी व्रत करने से सभी प्रकार के पाप व ताप दूर होते हैं, अनन्त शक्ति मिलती है और स्वर्गादि उत्तम लोक प्राप्त होते हैं। पौराणिक मान्यतानुसार सौभाग्य का आधार संयम है। हर प्रकार संयम रखने से मनुष्य के सुख और सौभाग्य में वृद्धि होती है। यदि प्राणी में संयम नहीं है तो उसके द्वारा किये गए तप, त्याग व भक्ति-पूजा आदि सब व्यर्थ हो जाते हैं। अन्न दान और कन्या दान का महत्त्व हर दान से ज़्यादा है और वरूथिनी एकादशी का व्रत रखने वाले को इन दोनों के योग के बराबर फल प्राप्त होता है। इस व्रत को करने वाला दिव्य फल प्राप्त करता है। पौराणिक मान्यतानुसार भगवान विष्णु को प्रिय एकादशी तिथियों में बैशाख कृष्ण पक्ष के इस एकादशी का फल अन्य सभी एकादशियों से बढ़कर है। अन्न दान और कन्या दान का महत्त्व हर दान से ज़्यादा है और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने वाले को इन दोनों के योग के बराबर फल प्राप्त होने की मान्यता होने से इस दिन जो पूर्ण उपवास रखते हैं, दस हज़ार वर्षों की तपस्या के बराबर फल प्राप्त होता है। उसके सारे पाप धूल जाते हैं। जीवन सुख-सौभाग्य से भर जाता है। मनुष्य को भौतिक सुख तो प्राप्त होते ही हैं, मृत्यु के बाद उसे मोक्ष भी प्राप्त हो जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने वाले सभी लोकों में श्रेष्ठ बैकुंठ लोक में जाते हैं। पुष्टिमार्गी वैष्णवों के लिए तो इस एकादशी का बहुत महत्त्व है। यह महाप्रभु वल्लभाचार्य की जयंती है। सुपात्र ब्राह्मण को दान देने, करोड़ों वर्ष तक ध्यान मग्न तपस्या करने तथा कन्यादान के फल से बढ़कर वरुथिनी एकादशी व्रत को माना जाता है। वरुथिनी शब्द संस्कृत भाषा के वरुथिन् से बना है, जिसका मतलब है- प्रतिरक्षक, कवच या रक्षा करने वाला। वैशाख कृष्ण एकादशी का व्रत भक्तों की हर संकट से रक्षा करता है, इसलिए इसे वरुथिनी ग्यारस कहा जाता हैं। पद्म पुराण के कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण इस व्रत से मिलने वाले पुण्य के बारे में युधिष्ठिर को बतलाते हुए कहते हैं- पृथ्वी के सभी मनुष्यों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखने वाले भगवान चित्रगुप्त भी इस व्रत के पुण्य का हिसाब-किताब रख पाने में सक्षम नहीं हैं। पापी से पापी व्यक्ति भी इस व्रत का पालन करे तो उसके पाप विचार धीरे धीरे लोप हो जाते हैं व स्वर्ग का अधिकारी बन जाता है। पृथ्वी के राजा मान्धाता ने वैसाख कृष्ण पक्ष में एकादशी का व्रत रखा था जिसके फलस्वरूप मृत्यु पश्चात उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। त्रेतायुग में जन्मे राम के पूर्वज इक्ष्वाकु वंश के राजा धुन्धुमार को भगवान शिव ने एक बार श्राप दे दिया था। धुन्धुमार ने तब इस एकादशी का व्रत रखा जिससे वह श्राप से मुक्त हो कर उत्तम लोक को प्राप्त हुए। बैशाख कृष्ण एकादशी के दिन भक्तिभाव से भगवान मधुसूदन की पूजा करने से भगवान मधुसूदन की प्रसन्नता प्राप्ति,सम्पूर्ण पापों का नाश व सुख-सौभाग्य की वृद्धि होती है तथा भगवान का चरणामृत ग्रहण करने से आत्मशुद्धि होती है। व्रती को दशमी तिथि को ही अर्थात व्रत रखने से एक दिन पूर्व ही हविष्यान्न का एक बार भोजन करना चाहिए । इस व्रत के लिए निषेधित वस्तुओं का पूर्णतया त्याग करना ही श्रेयस्कर माना गया है। व्रत रखने वाले के लिए उस दिन पान खाना, दातून करना, परनिन्दा, क्रोध करना, असत्य बोलना, जुआ खेलना, तेलयुक्त बोजन का सेवन और निद्रा का भी पूर्णतः त्याग करना चाहिए । रात्रि में भगवान का नाम स्मरण करते हुए जागरण करें और द्वादशी को माँस, कांस्यादि का परित्याग करके व्रत का पालन करना चाहिए । एकादशी के दिन प्रात: स्नान करके श्री विष्णु की पूजा विधि सहित करनी चाहिए। विष्णु सहस्त्रनाम का जाप एवं उनकी कथा का रसपान करना चाहिए। श्री विष्णु के निमित्त निर्जल रहकर व्रत का पालन करना चाहिए। किसी के लिए अपशब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए व परनिन्दा से दूर रहना चाहिए। रात्रि जागरण कर भजन, कीर्तन एवं श्री हरि का स्मरण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन एवं दक्षिणा सहित विदा करने के पश्चात स्वयं तुलसी से परायण करने के पश्चात अन्न जल ग्रहण करना चाहिए। दिव्य फल प्रदात्री वरूथिनी एकादशी के सम्बन्ध में भी एक पौराणिक कथा प्रचलित है, जो अन्य एकादशी व्रत की कथाओं की भांति ही भगवान श्रीकृष्ण ने पांडुनन्दन युद्धिष्ठिर को सुनाई है। पद्मपुराण में वरूथिनी एकादशी के सम्बन्ध में विस्तृत विवरण अंकित हैं।इस एकादशी के विषय में प्रचलित कथा के अनुसार अनुसार इक्ष्वाकु वंशीय नरेश मांधाता की प्रसिद्धि दूर दूर तक थी। इन्हें सौ राजसूय तथा अश्वमेध यज्ञों का कर्ता और दानवीर, धर्मात्मा चक्रवर्ती सम्राट् जो वैदिक अयोध्या नरेश मंधातृ जैसा अभिन्न माना जाता था। यादव नरेश शशबिंदु की कन्या बिंदुमती इनकी पत्नी थीं जिनसे मुचकुंद, अंबरीष और पुरुकुत्स नामक तीन पुत्र और पचास कन्याएँ उत्पन्न हुई थीं जो एक ही साथ सौभरि ऋषि से ब्याही गई थीं। मान्धाता के जन्म के सम्बन्ध में प्राप्त विवरण के अनुसार पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ के हवियुक्त मंत्रपूत जल को प्यास में भूल से पी लेने के कारण युवनाश्व को गर्भ रह गया जिसे ऋषियों ने उसका पेट फाड़कर निकाला ।वह गर्भ एक पूर्ण बालक के रूप में उत्पन्न हुआ था जो इंद्र की तर्जनी उँगली को चूसकर रहस्यात्मक ढंग से पला और बढ़ा हुआ था। इंद्र द्वारा दूध पिलाने तथा पालन करने के कारण इनका नाम मांधाता पड़ा। यह बालक आगे चलकर पर पराक्रमी राजा बना। इन्होंने विष्णु जी से राजधर्म और वसुहोम से दंडनीति की शिक्षा ली थी। राजा मान्धाता के एकादशी व्रत की ओर उन्मुख होने के सम्बन्ध में प्रचलित इस पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा नदी के तट पर यह अत्यंत दानशील तथा तपस्वी मान्धाता नामक राजा राज्य करता था। एक दिन जब वह जंगल में तपस्या कर रहा था, तभी न जाने कहाँ से एक जंगली भालू आकर राजा का पैर चबाने लगा। फिर भी राजा पूर्ववत अपनी तपस्या में लीन रहा। कुछ देर बाद पैर चबाते-चबाते भालू राजा को घसीटकर पास के जंगल में ले गया। राजा बहुत घबराया, मगर तापस धर्म अनुकूल उसने क्रोध और हिंसा न करके करूँ भाव से भगवान विष्णु को पुकारते हुए अत्यंत आर्तभाव से प्रार्थना की। उसकी पुकार सुनकर भक्तवत्सल भगवान श्री विष्णु प्रकट हुए और चक्र से भालू को मार डाला। राजा का पैर भालू पहले ही खा चुका था। इससे राजा बहुत ही शोकाकुल हुआ। उसे दुखी देखकर भगवान विष्णु बोले- वत्स ! शोक मत करो। तुम मथुरा जाओ और वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर मेरी वराह अवतार मूर्ति की पूजा -अर्चना करो। उसके प्रभाव से तू पुन: सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे। इस भालू ने तुम्हें जो काटा है, यह तुम्हारे पूर्व जन्म का अपराध कर्म का फल था। भगवान की आज्ञा मान राजा ने मथुरा जाकर श्रद्धापूर्वक बैशाख कृष्ण पक्ष की वरूथिनी एकादशी का व्रत किया। इसके प्रभाव से वह शीघ्र ही पुन: सुंदर और संपूर्ण अंगों वाला हो गया। कथा के अनुसार इसी वरूथिनी एकादश के प्रभाव से राजा मान्धाता स्वर्ग को गए थे क्योंकि गर्व से चूर होकर और स्वयं को उच्च मानते हुए इनके द्वारा कई गलत कार्य भी हुए जिनके प्रभाव स्वरूप इन्हें स्वर्ग की प्राप्ति नहीं हुई अत: अपने पापों से मुक्ति पाने हेतु क्षमायाचना स्वरूप इन्होंने इस एकादशी व्रत का पालन किया जिसके प्रभाव से इन्हें स्वर्ग की प्राप्ति संभव हो सकी। इसी प्रकार त्रेतायुग में जन्म को प्राप्त श्रीराम के पूर्वज इक्ष्वाकु वंशीय राजा धुन्धुमार को भगवान शिव ने एक बार क्रोद्धवश श्राप दे दिया था। जिसके कारण उन्हें बहुत सारे कष्टों की प्राप्ति हुई उनसे मुक्ति के मार्ग के लिए। धुन्धुमार ने तब इस एकादशी का व्रत रखा जिससे उन्हें श्राप से मुक्ति प्राप्त हुए और वह उत्तम लोक को प्राप्त हुए।
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