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पटरी से तो खूब दौड़ती अपनी फिल्में!

श्रीशचन्द्र मिश्र
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(image) यह अपने आप में दिलचस्प संयोग है कि 1886 में जब ल्यूमियर बंधुओं ने बंबई के वाटसन होटल में एक रुपए के टिकट पर चलती फिरती तस्वीरें दिखा कर लोगों को चमत्कृत किया, तब से ट्रेन फिल्मों का हिस्सा बनी हुई है। ल्यूमियर बंधुओं के खजाने में कुछ चलती फिरती तस्वीरें थी। उनमें से एक में ट्रेन पर चढ़ती एक महिला की तस्वीर भी थी। शीर्षक था ‘द अराइवल आफ ए ट्रेन’। विज्ञान के उस नए जादू की देखादेखी जब भारतीयों ने वही प्रयोग किया तो उनका ज्यादा जोर प्लेटफार्म पर आती ट्रेन का दृश्य चित्रित करने पर रहा। यह चलन शुरू होने में करीब डेढ़ दशक लग गया कि इन चलती फिरती तस्वीरों को कथा सूत्र में बांध कर दर्शकों को लुभाया जा सके। भारत में मूक फिल्मों के शुरुआती दौर में क्योंकि पौराणिक आख्यानों व ऐतिहासिक प्रसंगों पर ज्यादा फिल्में बनीं इसलिए ट्रेन से फिल्मों का नाता जुड़ने में थोड़ा समय लग गया। पहल की वाडिया मूवीटोन की स्टंट फिल्मों में। इन फिल्मों के नायक या तो राबिन हुड टाइप के लुटेरे हुआ करते थे या फिर खलनायक की करतूतों का जवाब देने वाले जांबाज फुर्तीले लड़ाके। उन फिल्मों में ट्रेन पर तलवारबाजी दिखाई जाती थी या घोड़े को ट्रेन के समानांतर दौड़ा कर दर्शकों को मोहा जाता था। इस दौर में फियरलेस नाडिया ने चलती ट्रेन पर हैरतअंगेज स्टंट दिखा कर खासी वाहवाही लूटी। उन दिनों डुप्लीकेट का चलन नहीं था। नाडिया जान जोखिम में डाल कर अपने स्टंट खुद किया करती थी। ट्रेन की छत पर कलाबाजी दिखाने और दौड़ते घोड़े से ट्रेन के डिब्बे में छलांग लगा देने के उनके स्टंट लोगों को दंग कर देते थे। फिल्मों को आवाज मिलने के बाद तो ट्रेन से फिल्मों का नाता अभिन्न हो गया। शायद ही कोई ऐसी फिल्म बनी है जिसमें ट्रेन का किसी न किसी रूप में इस्तेमाल न किया गया हो। यह एक तरह से स्वाभाविक है। स्टूडियो की चार दीवारी से निकल कर जब फिल्में बाहर की दुनिया में निकलीं तो आम जीवन शैली का प्रमुख हिस्सा रहीं ट्रेन उनका हिस्सा बन गईं। सैकड़ों फिल्मों में ट्रेन को पीड़ा, वियोग या उत्साह के प्रतीक के रूप में इस्तेमाल किया गया। डाकू विषयों पर बनी फिल्मों में तो ट्रेन हमेशा अनिवार्य हिस्सा रही। हादसे के जरिए फिल्म की कहानी में नाटकीय मोड़ लाने में भी फिल्में मददगार साबित हुईं। कई बार तो ट्रेन फिल्म की कहानी का मुख्य आधार रहीं। मुंबई के मराठा मंदिर सिनेमाघर में एक हजार से ज्यादा हफ्ते तक चल कर विश्व रिकार्ड बनाने वाली फिल्म ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ में वैसे तो यूरोपीय ट्रेनों का जलवा दिखा। लेकिन फिल्म का क्लाइमैक्स पंजाब के एक स्टेशन पर फिल्माया गया और यह दृश्य मील का पत्थर साबित हुआ। रेंगती ट्रेन के दरवाजे पर हाथ फैलाए खड़े शाहरुख खान और उस हाथ को पकड़ने के लिए दौड़ती काजोल का यह क्लाइमेक्स प्रेम की विजय का प्रतीक बन गया। करीब दो दशक बाद रोहित शेट्टी ने यह दृश्य कॉमिक अंदाज में ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में फिल्माया। हाथ शाहरुख खान का ही था लेकिन उसे पकड़ कर डिब्बे में चढ़ने वाले थे चार मुस्टंडे। ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ के कई दृश्य ट्रेन के डिब्बे में फिल्माए गए थे। इसके अलावा दक्ष सिनेमेट्रोग्राफी की मदद से दौड़ती ट्रेन को कई कोणों से दिखाया गया। नायिका के डॉन पिता का नायक का स्वागत करने वाला दृश्य तो पटरियों पर शूट किया गया। ट्रेन को पात्रों के मनोभावों से जोड़ने का प्रयोग भी कई फिल्मों में हुआ है। ‘जब वी मैट’ इसकी बेहतरीन मिसाल है। सपनों को पूरा करने को लालायित नायिका (करीना कपूर) के मोहभंग को ट्रेन छूट जाने के डर से जोड़ा गया। शुरू में ट्रेन पकड़ लेने का उत्साह, फिर उसके छूट जाने की खीझ और एब कुछ खत्म हो जाने के बाद फिर ट्रेन पकड़ लेने की खुशी नायिका के जीवन में आए उतार-चढ़ाव को उभारने में सहायक रही। ‘विरासत’ का छोटे से स्टेशन पर गाड़ी रुकने का दृश्य कहानी की धार से जोड़ा गया। नायक (अनिल कपूर) जब अपनी प्रेमिका (पूजा बत्रा) के साथ स्टेशन पर उतरता तो उमंग और उल्लास का माहौल बन जाता है। गांव वाले पेड़ से कूद कर नृत्य करते हुए दोनों का स्वागत करते हैं। सामाजिक दबावों की वजह से नायक की एक गरीब लड़की से शादी हो जाती है। निराश प्रेमिका ट्रेन से लौटती है तो स्टेशन पर स्तब्धता छा जाती है। ‘कटी पतंग’ का ट्रेन हादसा तो कहानी में एक नाटकीय मोड़ ले आता है। शादी वाले दिन घर से भाग गई नायिका (आशा पारिख) की ट्रेन में पुरानी सहेली से मुलाकात होती है जो विधवा है और अपने बच्चे के साथ ससुराल जा रही होती है। तभी ट्रेन हादसा हो जाता है। सहेली मर जाती है। नायिका को विधवा के रूप में उसकी जगह लेनी पड़ती है। ट्रेन का इस्तेमाल कई फिल्मों में अलग-अलग अंदाज में हुआ है। ‘साथिया’ में लोकल ट्रेन नायक-नायिका (विवेक ओबराय व रानी मुखर्जी) के परिचय को प्रेम में बदलने का आधार बनती है। दो प्रेमियों के बीच फंसी नायिका (विद्या सिन्हा) की दुविधा को ‘रजनीगंधा’ में ट्रेन के माध्यम से उभारा गया। ‘इजाजत’ में बरसो बाद मिले प्रेमी-प्रेमिका (नसीरुद्दीन शाह व रेखा) के रिश्तों की गांठ स्टेशन के वेटिंग रूम में खुलती है। ‘दो अनजाने’ में महत्वपूर्ण मोड़ तब आता है जब खलनायक (प्रेम चोपड़ा) चलती ट्रेन से नायक (अमिताभ बच्चन) को नीचे फेंक देता है। उसे मरा हुअा मान लिया जाता है। नए रूप में आकर वह उलझे हुए रिश्तों की थाह लेता है। ‘दोस्त’ में आदर्शवादी नायक (धर्मेंद्र) व मजबूरी में अपराध करने वाले सहनायक (शत्रुघ्न सिन्हा) की मुलाकात ट्रेन में होती है। नायक के संपर्क में आने पर रास्ता भटक गया सहनायक सुधर जाता है। विरह और इंतजार की वेदना को अभिव्यक्त करने के लिए भी कई फिल्मों में ट्रेन का सहारा लिया गया। ‘सोलहवां सावन’ में नायिका (श्रीदेवी) हर रोज स्टेशन पर उस ट्रेन के आने का इंतजार करती है जिससे उसे अपने रक्षक (अमोल पालेकर) के लौट आने की उम्मीद होती है। नायिका एक फैशनेबल लड़के के प्रेम में पड़ जाती है। गांव का एक विकलांग नायिका से मन ही मन प्रेम करता है। उसे जब उसके ढोंगी प्रेमी की असलियत पता चलती है तो वह उसकी हत्या कर देता है। सजा काट कर वह लौटेगा, इसी इंतजार में नायिका रोज ट्रेन के आने की बाट जोहती है। यही दृश्य ‘गुलामी’ में धर्मेंद्र व रीना राय पर फिल्माया गया। शौर्य व रोमांच को सहारा 999नायक का शौर्य दिखाना हो या रोमांच की स्थिति पैदा करनी हो तो ट्रेन का सहारा हमेशा मददगार साबित होता रहा है। ट्रेन क छत पर नायक और खलनायक के बीच मुकाबला तो सैकड़ों फिल्मों का हिस्सा बन चुका है। हॉलीवुड की फिल्मों में ट्रेन का ज्यादा व्यापक इस्तेमाल हुआ। उसकी छाप हिंदी फिल्मों पर भी पड़ी। 1965 में फ्रैंक सिनात्रा की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘वान रयांन एक्सप्रेस’ में नाजियों के शिकंजे से मालगाड़ी में छिप कर भागने वाले कैदियों की संघर्ष गाथा थी। इसी तरह का एक दृश्य ‘कच्चे धागे’ में आतंकवादियों से बच कर भागते दो भाइयों व उनकी प्रेमिकाओं का था। ‘बुच कैसिडी एंड द संडेस किड’ में ट्रेन में लूटपाट का जो दृश्य था वह ‘लज्जा’ समेत कई फिल्मों में दिखा। ट्रेन में हत्या या डकैती का रोमांचक चित्रण 1974 की हॉलीवुड फिल्म ‘मर्डर आॅन द आॅरिएट एक्सप्रेस’ व 1978 की फिल्म ‘द ग्रेट ट्रेन राबरी’ में हुआ। हिंदी फिल्मों में भी ऐसी सिचुएशन को नाटकीयता लाने के लिए गढ़ा गया। ‘दो भाई’ व ‘द ट्रेन’ में चलती ट्रेन में हुई हत्या का संबंध उभरने वाले तनाव से जोड़ा गया। ‘तीसरा कौन’ में ट्रेन में हुई हत्या का रहस्य इतना गहरा जाता है कि कई लोग शक के दायरे में आ जाते हैं। जहां तक ट्रेन में डकैती का सवाल है तो दसियों हिंदी फिल्मों में इसका रोमांचक चित्रण हुआ। ‘गंगा जमना’ में व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने के लिए डाकू बन गए दिलीप कुमार का चलती ट्रेन के साथ घोड़ा दौड़ाने और पुलिस अफसर भाई नासिर खान का उन्हें रोकने की कोशिश करने का दृश्य इतनी खूबसूरती से शूट किया गया था कि वह फिल्म का विशेष आकर्षण बन गया था। जेम्स बांड सीरिज की ‘स्काई फाल’, ‘फ्राम रशिया विथ लव’, ‘आक्टोपसी’ हो या ‘स्पीड’ कड़ी फिल्में, सभी के महत्वपूर्ण स्टंट का ट्रेन गवाह रही। हिंदी फिल्मों में ‘धर्म संकट’ जैसी कई फिल्में डाकुओं को ट्रेन में ले जाए जा रहे खजाने को लूटते दिखाया गया। लेकिन तकनीकी रूप से बेहद दक्ष फिल्म रही ‘रूप की रानी चोरों का राजा।’ इसमें हेलिकाप्टर का भी सहारा लिया गया था। अपने समय की इस सबसे महंगी हिंदी फिल्म के तकनीकी दृश्यों के लिए विदेशी विशेषज्ञों की मदद ली गई थी। लेकिन फिल्म अपेक्षा के अनुरूप सफलता नहीं पा सकी। करीब बीस साल बाद शाहरुख खान की फिल्म ‘रा वन’ में ट्रेन पर हैरत अंगेज स्टंट दृश्य में दर्शकों को ज्यादा नहीं लुभा पाए। वजह यह रही कि स्पेशल इफेक्ट्स के जरिए विशेष कारनामे दिखाने वाली अंग्रेजी फिल्में दर्शकों के बीच पहले ही पैठ बना चुकी थीं। ट्रेन का भारतीय परिवेश में जब भी सहज इस्तेमाल हुआ, उसे ज्यादा लोकप्रियता मिली। ‘शोले’ इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। चलती ट्रेन में डाकुओं से मुकाबला करने वाला दृश्य काफी सशक्त रहा। ट्रेन हादसों का फिल्मों में इस्तेमाल आमतौर पर किसी परिवार के बिखरने में हुआ है। अक्सर ऐसा फिल्मों में बच्चे अपनी मां या पिता से बिछुड़ जाते हैं। हादसे पर केंद्रित सबसे चर्चित फिल्म ‘द बर्निंग ट्रेन’ रही। रवि चोपड़ा के निर्देशन में बनी यह फिल्म हॉलीवुड की फिल्म ‘द टावरिंग इनफर्नो’ से प्रेरित थी। उस फिल्म में गगनचुंबी इमारत में आग लग जाने और उससे लोगों को बचाने का संघर्ष था। ‘द बर्निंग ट्रेन’ में साजिश की वजह से ट्रेन में आग लग जाती है। ट्रेन में फंसे लोगों को किस तरह बचाया जाता है, इसी का फिल्म में चित्रण था। ट्रेन रिश्तों को समझने व बनाने में भी सहायक रही है। ‘27 डाउन’ एक ऐसी ही फिल्म थी। टिकट निरीक्षक और बूढ़े पिता का जिम्मा संभालने वाली नायिका के बीच एक रिश्ता बनना शुरू होता है कि परिस्थितियां उन्हें यथार्थ के धरातल पर पटक देती है। ट्रेन में नायक-नायिका की नोकझोंक भरी पहली मुलाकात का दृश्य कई फिल्मों में दिखा है। नासिर हुसैन को ऐसी सिचुएशन से गहरा लगाव था। ‘तीसरी मंजिल’ में उन्होंने इस तरह का प्रसंग बेहद रोमांचक अंदाज में फिल्माया था। नायक या नायिका के रूठ कर या दिल टूटने पर शहर छोड़ कर जाने के दृश्यों की भी ट्रेन कई बार गवाह बनी है। ‘कुछ कुछ होता है’ में शाहरुख खान व रानी मुखर्जी के बीच बढ़ती नजदीकी से आहत काजोल का ट्रेन से घर वापस जाने का दृश्य काफी मार्मिक रहा था। नायक का शौर्य दिखाने के लिए ट्रेन का इस्तेमाल हमेशा से होता रहा है। दक्षिण की फिल्मों की तरह हिंदी फिल्मों में इसे फंतासी का रूप तो नहीं दिया गया लेकिन जो कुछ दिखाया गया, वह अकाल्पनिक तो रहा ही। ‘गुलाम’ के उस दृश्य को याद किया जाए जिसमें आमिर खान चलती ट्रेन से होड़ लगाते हुए दौड़ते हैं और आगे निकल कर इंजन के सामने से छलांग लगा कर दूसरी तरफ जा कूदते हैं तो सिर्फ शर्त जीतने की खातिर। आमिर खान की ताजा फिल्म ‘पी के’ में उन्होंने दूसरे ग्रह का दिखाने के लिए उन्हें रेल की पटरियों के बीच निर्वस्त्र दिखाया गया, आवरण के लिए सिर्फ ट्रांजिस्टर का इस्तेमाल हुआ। सलमान खान ने अपनी दबंगई ट्रेन में खूब दिखाई। चाहे वह ‘दबंग’ हो या ‘वांटेड’, ‘किक’ में तो दौड़ती ट्रेन के आगे से वे ऐसे निकल जाते हैं मानों चहलकदमी कर रहे हों। स्पेशल इफेक्ट्स का सहारा लेकर इस तरह के दृश्यों को ज्यादा से ज्यादा सजीव व रोमांचक बनाया जा रहा है। कमाल कैमरे का होता है और तालियां मिल जाती हैं नायक को। उसे आसानी से सुपर हीरो का तमगा मिल जाता है। दुराचारियों को ट्रेन में सबक सिखाने के प्रयोग खूब हुए हैं। ‘आज की आवाज’ में नायक (राज बब्बर) के सामने उसकी बहन से बलात्कार किया जाता है। दोषियों की उसकी तलाश लोकल ट्रेन में सफर करते हुए पूरी होती है। ‘जागो’ में लोकल ट्रेन में अपनी अल्प वयस्क बेटी से हुए बलात्कार का बदला उसकी मां ट्रेन में ही लेती है। ‘गजनी’ में देह व्यापार के लिए ले जा रही नाबालिग लड़कियों को ट्रेन से छुड़ा कर नायिका (आसिन) माफिया के निशाने पर आ जाती है और उसकी कल्पनाओं में रची बसी प्रेम कथा का त्रासद अंत हो जाता है। हास्यपूर्ण स्थितियां रचने के लिए ट्रेन ने एक उपयुक्त मंच फिल्मों को दिया है। सत्येन बोस के निर्देशन में बनी ‘हाफ टिकट’ हो या ‘पिया का घर’ अथवा ‘रफूचक्कर’ या फिर हाल ही में रिलीज हुई ‘तनु वेड्स मनु’। ‘मिस्टर संपत’ तो नायक (मोतीलाल) के जीवन में आए उतार-चढ़ाव को सहजता से अभिव्यक्त करने वाली फिल्म थी। नायक जिस हुलिए में फिल्म को शुरू में ट्रेन से उतरता है उसी अंदाज में अंत में वापस जाने के लिए ट्रेन पकड़ता है। आते समय उसके पास अठन्नी होती है और लौटते समय भी अठन्नी ही उसकी मुट्ठी में होती है। बीच में वह अपनी चालबाजी से शहर के तमाम लोगों को बेवकूफ बनाता रहता है।
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