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क्या मतलब है फिल्मी सफलता का?

श्रीशचन्द्र मिश्र
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(image) चीन में भारी भरकम प्रचार अभियान के बल पर आमिर खान ने अपनी फिल्म ‘दंगल’ रिलीज की और वहां के सिनेमाघरों से छह सौ करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन कर अब वे कुल कमाई के मामले में ‘बाहुबली-2’ के बराबर हैं। देश-दुनिया से डेढ़-डेढ़ हजार करोड़ रुपए बटोर कर दोनों फिल्में अभी भी एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगी हुई हैं। खास बात यह है कि यह छप्पर फाड़ कमाई दोनों फिल्मों ने कुछ ही हफ्तों में कर ली। यह फिल्मों की सफलता की तेजी से बदल रही परिभाषा का नतीजा है। नहीं तो एक जमाना था जब सफलता का पैमाना किसी फिल्म के एक या कई सिनेमाघरों में लगातार पच्चीस या ज्यादा हफ्ते चलने को माना जाता था। अब इस पारंपरिक कसौटी का कोई अर्थ नहीं रह गया है। सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली जैसे शब्द इंडस्ट्री के लिए भूले बिसरे हो गए हैं और उसके अब लौटने की दूर दूर तक कोई गुंजाइश नजर नहीं आती। भूले भटके किसी ट्रेड पत्रिका में विज्ञापन के रूप में एकाध फिल्मों के सिल्वर जुबली मनाने का ढिंढोरा जरूर पीट दिया जाता है। लेकिन संबंधित निर्माता को आत्म संतोष देने के अलावा इस मुनादी का कोई महत्व नहीं रह गया है। अब यह कल्पना से परे की बात हो गई है कि कोई फिल्म लगातार 25 हफ्ते एक सिनेमाघर में चल सकती है। दो हफ्ते में बड़ी से बड़ी फिल्मों की चमक धुंधला जाती है और एक महीना पार करते करते तो उसका दम फूलने लगता है और दो महीने बाद वह टीवी पर आ जाती है। निर्माताओं की भी इसमें रूचि नहीं रही है कि उनकी फिल्म लगातार चले। बस फिल्म धड़ाधड़ चले और दस बीस दिन में करोड़ों बरसा दे। ‘दंगल’ और ‘बाहुबली-2’ ने तो उम्मीदों का दायरा और बढ़ा दिया है। पिछली सदी में दो फिल्मों ‘हम आपके हैं कौन’ व ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ ने ही सौ करोड़ रुपए के कारोबार का शिखर हुआ था। और वह भी तब जब 1995 में बनी ‘हम आपके हैं कौन’ ने 36 सिनेमाघरों में पचास या ज्यादा हफ्तों तक चल कर गोल्डन जुबली व डायमंड जुबली मनाई। ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जाएंगे’ को तो मुंबई के मिनर्वा सिनेमाघर में पंद्रह साल से ज्यादा समय तक घसीटा गया। आज की फिल्में एक हफ्ते में तूफान मचा कर उससे ज्यादा कमाई आसानी से कर रही हैं। 1943 में बनी ‘किस्मत’ कोलकाता के रॉक्सी सिनेमाघर में पौने चार साल लगातार चली लेकिन कुल सात करोड़ रुपए ही कमा सकी। ‘ऑस्कर’ के लिए नामांकित होने वाली पहली भारतीय फिल्म ‘मदर इंडिया’ (1957) 52 जगह सिल्वर जुबली या गोल्डन जुबली मना कर भी दस करोड़ ही कमा सकीं। ‘मुगल-ए-आजम’, ‘जय संतोषी मां’, ‘शोले’, ‘राम तेरी गंगा मैली’ और ‘मैंने प्यार किया’ की सिल्वर, गोल्डन, डायमंड (साठ हफ्ते) व प्लेटिनम (75 हफ्ते) जुबली ट्राफियां वितरकों, निर्माताओं, कलाकारों व तकनीशियनों के घर दफ्तर की शोभा भले ही बढ़ाती रही हो, कमाई के मामले में कोई भी फिल्म पिछले दस साल की बाक्स आफिस पर अरबों रुपए उगलने वाली फिल्मों के आसपास भी नहीं फटक पाईं। फिल्मों के सिल्वर जुबली मनाने का सिलसिला 1931 में सवाक फिल्मों का दौर आने के बाद शुरू हुआ। उससे पहले के मूक युग में भारतीय फिल्म इतिहास की पहली अधिकृत फिल्म दादा साहब फाल्के की 1913 में बनी ‘राजा हरिश्चंद्र’ बमुश्किल बीस दिन चली। उसके एक साल पहले नाटक का फिल्मांकन करने की वजह से पहली फीचर फिल्म नहीं मानी गई, एक और दादा साहब रामचंद्र गोपाल तोरणे की ‘पुंडलिक’ दो हफ्ते ही चल पाई। लेकिन इन्हीं रामचंद्र, गोपाल तोरणे की फिल्म कंपनी ‘सरस्वती सिनेटोन’ की भाल जी पेंढारकर के निर्देशन में बनी फिल्म ‘श्याम सुंदर’ ने मुंबई के तीन सिनेमाघरों में लगातार 27 हफ्ते चल कर भारत की पहली सिल्वर जुबली फिल्म होने का रिकार्ड बनाया। उसके बाद से बीसवीं सदी के अंत तक जुबली मनाने का खेल फिल्में लगातार खेलती रहीं। 1975 में ‘शोले’ के साथ रिलीज हुई और कमाई के मामले में कई केंद्रों में उसे मात देने वाली आठ लाख रुपए की लागत से बनी ‘जय संतोषी मां’ ने 71 सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली मना कर जो रिकार्ड बनाया, उसे कभी तोड़ा नहीं जा सका। शक्ति सामंत की ‘आराधना’ ने वैसे तो कई सिनेमाघरों में जुबलियां मनाई लेकिन चेन्नई में हिंदी विरोध चरम पर होते हुए भी वहां के एक सिनेमाघर में यह फिल्म लगातार 75 हफ्ते तक चली। नई सदी ने इस स्थिति को पूरी तरह ध्वस्त कर एक नया मानक तय कर लिया है जो लगातार विस्तार लेता जा रहा है।
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