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दक्षिण की फिल्में हमेशा रहीं आगे

श्रीशचन्द्र मिश्र
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(image) पहली ‘बाहुबली’ के 765 दिन बाद आए उसके दूसरे भाग की बाक्स आफिस पर रिकार्ड तोड़ सफलता को लेकर तो कोई संदेह था ही नहीं। भव्यता और तकनीकी श्रेष्ठता में एक बार फिर खुद को उसने बेहतर साबित कर दिया है। खालिस रूप से हिंदी में बनने वाली फिल्मों को ‘बाहुबली’ के नए भाग ने फिर आइना दिखा दिया है और यह धारणा तोड़ दी है कि संसाधनों व तकनीकी ज्ञान की कमी की वजह से हॉलीवुड स्तर की भव्य फिल्म भारत में नहीं बन सकती। पहली बाहुबली ने सलमान खान की ‘बजरंगी भाईजान’को कमाई के मामले में पछाड़ कर इस धारणा को गलत साबित कर दिया था कि दो बड़ी फिल्में एक साथ सफलता नहीं पा सकतीं। बाहुबली’ने एक और मिथक भी तोड़ा है। दक्षिण भारतीय कलाकार हिंदीभाषी क्षेत्रों में नहीं चल सकते, खासतौर से वे जिन्होंने हिंदी फिल्मों में चेहरा न दिखाया हो। ‘बाहुबली’ में रामय्या व तमन्ना भाटिया के अलावा राणा दग्गूबाती ही ऐसे चेहरे हैं जो हिंदी फिल्मों में आ चुके हैं। बाकी सभी प्रमुख कलाकार अनजाने हैं। इससे मूल रूप से दक्षिण में बनी फिल्मों के उत्तर भारत में सफलता पाने के आसार बन गए हैं। ‘बाहुबली’ ने एक तरह से उस परंपरा को ही आगे बढ़ाया है जो सात दशक से अलग-अलग रूप में सामने आती रही है। दक्षिण भारतीय सिनेमा एक अरसे से हिंदी फिल्मों को राह दिखता रहा है। एक समय था जब मुंबइया फिल्म निर्माता विषय की तलाश के लिए हालीवुड की फिल्मों का मुंह ताकते थे। अब तस्वीर बदल गई है। विषय और तकनीक के मामले में दक्षिण भारतीय सिनेमा में अभिनव प्रयोग होने की वजह से वहां की फिल्में उन्हें ज्यादा लुभाने लगी है। तमिल या तेलुगू की कोई फिल्म हिट होते ही उसे हिंदी में बनाने के अधिकार खरीद लिए जाते हैं। इसी का नतीजा है कि इस समय करीब तीन दर्जन फिल्में तमिल या तेलुगू फिल्मों के आधार पर बन रही हैं। दक्षिण का हिंदी फिल्मों पर प्रभुत्व नया नहीं है। यह सही है कि सिनेमा के शैशवकाल से लेकर तीन दशक के समय तक उत्तर और दक्षिण का सिनेमा अलग-अलग धारा में चलता रहा। उनमें किसी तरह का कोई तालमेल नहीं बन पाया। 1931 में फिल्मों को आवाज मिलने के बाद से आजादी तक हिंदी फिल्मों पर कलकत्ता (अब कोलकाता) के न्यू थिएटर्स से आए बंगाली मूल के या पारंपरिक रूप से मराठी फिल्मकारों का ही ज्यादा दबदबा रहा। उस समय तक दक्षिण भारत का सिनेमा स्थानीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करता रहा और जल्दी ही वहां के फिल्मकारों को यह समझ में आ गया कि हिंदी बेल्ट में दाखिल हुए बिना उन्हें ज्यादा व्यावसायिक फायदा नहीं होने वाला। यह दिलचस्प संयोग है कि हिंदी विरोध की राजनीति का प्रमुख हथियार बनाने की शुरुआत के साथ ही दक्षिण में हिंदी फिल्म बनाने का सिलसिला भी शुरू हो गया। शुरुआत की 1948 में एसएस वासन ने ‘चंद्रलेखा’ बना कर। भारतीय फिल्मों के इतिहास की इस पहली सबसे भव्य फिल्म में सभी प्रमुख भूमिकाएं दक्षिण भारतीय कलाकारों ने ही की थीं। शुरू में ‘चंद्रलेखा’ जैसी ही कुछ फिल्में बनीं। इनमें रेखा के पिता जेमिनी गणेशन ने भी एक फिल्म में काम किया। लेकिन दक्षिण भारतीय कलाकारों से हिंदीभाषी दर्शक ज्यादा तालमेल नहीं बनाए रखा पाए। इस मूड़ को दक्षिण भारतीय फिल्मकारों ने जल्दी ही भांप लिया। हिंदी फिल्मों के तबके सफल कलाकारों राजेंद्र कुमार, दिलीप कुमार, राज कुमार, गुरुदत्त आदि के साथ दक्षिण भारतीय अभिनेत्रियों बी सरोजा देवी, वैजयंतीमाला, पदमिनी, जमुना आदि को लेकर ‘एवीएम’, ‘जेमिनी’ व ‘पंछी फिल्म्स’ जैसी निर्माण संस्थाओं ने पारिवारिक-सामाजिक फिल्में बनाने का प्रयोग किया जो 1960 के दशक में काफी लोकप्रिय हुआ। उस समय की फिल्मों की कथावस्तु को इन दिनों के नाटकीय पारिवारिक टीवी सीरियलों में काफी इस्तेमाल किया जा रहा है। फिल्म निर्माण की अनुशासित व्यवस्था से इन्हीं फिल्मों ने परिचित कराया। उत्तर-दक्षिण के मेल का प्रयोग 1980 के दशक में एक नया चलन शुरू हुआ। उससे पहले तमिल फिल्म उद्योग ही हिंदी फिल्में बनाने में रुचि दिखा रहा था। तेलुगू सिनेमा भी इस होड़ में शामिल हुआ और श्रीदेवी, भानुप्रिया, जयाप्रदा, शांतिप्रिया, रेवती आदि को मुख्य रूप से जितेंद्र और समय पर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन आदि को लेकर मद्रास (अब चेन्नई) में ही नहीं, हैदराबाद में भी हिंदी फिल्में बनने लगीं। पुरुष कलाकारों का बड़े पैमाने पर हिंदी फिल्मों में अवतरण इसी दौर में हुआ। ‘एक दूजे के लिए’ से कमल हासन, ‘अंधा कानून’ से रजनीकांत, ‘प्रतिबंध’ से चिरंजीवी, ‘द्रोही’ से नागार्जुन, ‘धरतीपुत्र’ से ममूटी, ‘कालापानी’ से मोहन लाल यानी दक्षिण का कोई ऐसा सुपर स्टार नहीं रहा जो हिंदी फिल्मों में नहीं आया। मणिरत्नम ने ‘नायकन’ और बाद में ‘रोजा’ को हिंदी में डब कर नया सिलसिला शुरू किया। प्रियदर्शन ने ‘मुस्कुराहट’ से सफल दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी में रीमेक का प्रयोग किया। मुंबई में बोनी कपूर ने ‘वोह सात दिन’ और इंद्र कुमार ने ‘मोहब्बत’ में दक्षिण की फिल्मों का हिंदी रूपांतरण पेश किया। अब तो यह सिलसिला इतना विकसित हो गया है कि दक्षिण की लगभग हर सफल फिल्म डब होकर या रीमेक के रूप में हिंदीभाषी दशर्कों तक पहुंच रही है। पिछले कुछ समय से तो दक्षिण की फिल्मों पर आधारित हिंदी फिल्में सफलता के नए कीतिर्मान कामय कर रही है। पिछले दस साल में नया चलन शुरू हुआ है। दक्षिण से भी कलाकारों के आने का नया सिलसिला शुरू हो गया। राणा दग्गूबाती ‘दम मारो दम’ के बाद राम गोपाल वर्मा की ‘डिपाटर्मेंट’ में आए। अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके प्रकाश राज ‘सिंघम’ व ‘वांटेड’ में नजर आए। मणिरत्नम की ‘रावण’ में विक्रम थे। आसिन ‘रेडी’, ‘बोल बच्चन’ व ‘गजनी’ में, काजल अग्रवाल ‘सिंघम’ में, सौंदर्या ‘सूयर्वंशम’ में आ चुकी हैं। तृषा, श्रेया सरन व सिद्धार्थ का भी हिंदी फिल्मों में प्रवेश हो चुका है। ‘अइय्या’ में पृथ्वीराज सुकुमारन आए ही हैं। कुछ और लाइन में है। इलीना डी क्रुज, अनुष्का शेट्टी, रामचरण तेजा, धनुष, पल्लवी शारदा, तापसी पन्नू व तमन्ना भाटिया की फिल्में या तो आ चुकी है या जल्दी आने वाली हैं। ‘बाहुबली’ के बाद प्रभास की हिंदी फिल्मों में मांग बढ़ सकती है। दक्षिण भारतीय फिल्मों ने हिंदी फिल्मों को वे अभिनेत्रियां भी दी हैं जिनके लिए शुरू में हिंदी फिल्मों में प्रवेश पाना लगभग असंभव हो गया था। इनमें से ज्यादातर बिना गॉड फादर के या अभिनय की मामूली जानकारी लेकर दक्षिण पहुंची और वहां के निर्माताओं की कसौटी पर खरी उतरने के बाद काम पा गईं। सीधे हिंदी फिल्मों में धक्के खा कर भी प्रवेश न पाने की बजाए इन अभिनेत्रियों ने दक्षिण की सफलता के आधार पर शान से हिंदी फिल्मों में जगह बनाई है। यह दक्षिणका हिंदी फिल्मों को सबसे बड़ा सहारा है। कलाकारों के आने जाने का सिलसिला तो लगातार चलता रहा है। मुंबई में अभिनेताओं को मालदार बनाने में अगर दक्षिण का योगदान रहा तो दक्षिण ने ही कई अभिनेत्रियों को संवार-निखार कर हिंदी फिल्मों के लायक बनाया। ऐश्वर्य राय, रति अग्निहोत्री, विद्या बालन, अमीशा पटेल आदि दजर्नों अभिनेत्रियों ने दक्षिण की फिल्मों में शुरुआत कर हिंदी फिल्मों में जलवा बिखेरा। हिंदी फिल्मों की काजोल, कैटरीना कैफ, प्रीति जिंटा, प्रियंका चोपड़ा आदि ने सफलता के दौर में दक्षिण की फिल्में कीं। नेहा धूपिया, खुशबू, कोमल, हंसिका मोटवानी, प्रीति झिंगियानी जैसी कई अभिनेत्रियों को मुंबई में बेसहारा होने के बाद दक्षिण की फिल्मों में आश्रय मिला। उनमें इन दिनों दक्षिण के कुछ अभिनेता भी हिंदी फिल्मों की तरफ रुख कर रहे हैं ज्यादा संख्या उन अभिनेत्रियों की है जिन्होंने दक्षिण में सफलता के झंडे गाड़ने के बाद हिंदी फिल्मों में धावा बोला है। काजल अग्रवाल ‘सिंघम’व ‘स्पेशल छब्बीस’समेत पांच फिल्मों में आ चुकी हैं। तेलुगू, तमिल व हिंदी की 26 फिल्मों में काम कर चुकी काजल का जन्म हालांकि मुंबई में हुआ लेकिन मूल रूप से वे अमृतसर की हैं। तेलुगू फिल्म ‘लक्ष्मी कल्याणम’ में लक्ष्मी और ‘चंदा मामा’ में महालक्ष्मी की भूमिका से लोकप्रियता पाने वाली काजल अग्रवाल की रामचरण तेजा के साथ बनी फिल्म ‘मगधीरा’ने तेलुगू फिल्मों के इतिहास में सबसे ज्यादा कमाई की। इलियाना डी क्रुज अनुराग बासु की फिल्म ‘बर्फी’में रणबीर कपूर व प्रियंका चोपड़ा के साथ पहली बार दिखीं। इस फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार के लिए भारतीय प्रविष्टि के रूप में भेजा गया था। तेलुगू और कन्नड़ फिल्मों में वे जाना पहचाना नाम हैं। आसिन दक्षिण से हिंदी फिल्मों में आई इस दौर की सबसे वरिष्ठ अभिनेत्री हैं। 2008 में आमिर खान के साथ ‘गजनी’ करने के बाद आसिन ने हिंदी में जो भी फिल्में की हैं, चाहे ‘रेडी’ हो, ‘हाउसफुल-2’ या ‘बोल बच्चन’ व ‘खिलाड़ी 786’ सभी हिट रही हैं। श्रेया सरन ने दक्षिण की फिल्मों में ग्लैमर बरसा कर चारों भाषाओं- तमिल, तेलुगू, कन्नड़ व मलयालम की कई सुपरहिट फिल्मों में काम किया है। इसी का नतीजा है कि हर साल वे अपना मेहनताना बढ़ाती जा रही हैं। रजनीकांत के साथ ‘शिवाजी’ और प्रकाश राज के साथ ‘नुव्वे नव्वे’ में उनके अभिनय को काफी सराहा गया। सौंदर्य और बुद्धि का तालमेल नहीं हो सकता, इस धारणा को श्रेया ने तोड़ा है। शाहरुख खान और आमिर खान के बाद वे अकेली कलाकार हैं जिसने आईआईएम (अमदाबादा) व आईआईटी (मद्रा) में सांस्कृतिक आदान प्रदान में सिनेमा की भूमिका पर व्याख्यान दिया। हिंदी फिल्मों में श्रेया का शुरुआती सफर निराशाजनक रहा। उनकी 2004 में रिलीज हुई दोनों फिल्में ‘थोड़ा तुम बदलो थोड़ा हम’ और ‘क्रिया’कोई कमाल नहीं दिखा सकीं। 2007 में आई ‘आवारापन’ भी नहीं चली। ‘मिशन इंस्ताबुल’, ‘एक-द पावर आफ वन’ व ‘गली गली चोर है’ के फ्लाप हो जाने के बाद ‘दृश्यम’ से उन्हें सहारा मिला है।  चार्मी कौर जब 15 साल की थीं, उन्होंने 2002 में तेलुगू फिल्म ‘नी थोडू कवाली’ में पहली बार अभिनय किया। अमिताभ बच्चन के साथ ‘बुड्ढा होगा तेरा बाप’ और ‘जिला गाजियाबाद’ से उन्होंने हिंदी फिल्मों में दस्तक दे दी है। 2009 में तेलुगू फिल्म ‘स्वीट हार्ट’ से करिअर शुरू करने वाली निधि सुबैया ने जैकी भरानानी की फिल्म ‘अजब गजब प्रेम’ के साथ हिंदी फिल्मों में प्रवेश किया। तापसी पन्नू ‘चश्मे बद्दूर’ के बाद ‘बेवी’ में आईं। दक्षिण से हिंदी फिल्मों में सबसे धमाकेदार एंट्री तमन्ना भाटिया की हुई। जिनकी पहली हिंदी फिल्म ‘हिम्मतवाला’हालांकि फ्लाप हो गई लेकिन उनकी मांग कम नहीं हुई है। ‘पिंक’ और ‘बेबी’ के बाद से तापसी पन्नू की क्षमता को भी सराहा जाने लगा है। सिर्फ कलाकार देने और विषय सुझाने तक दक्षिण भारतीय सिनेमा का योगदान सीमित नहीं रहा है। हिंदी फिल्में आज तकनीकी रूप से ज्यादा दक्ष हुई हैं और फिल्म को एक निर्धारित समय में पूरा करने का जो चलन शुरू हुआ है, वह दक्षिण की ही देन है। सवाल बस अब यह है कि क्या हिंदी फिल्में अपनी तरफ से कोई विलक्षण पहल कर दक्षिण की फिल्मों को चुनौती देगी।
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