स्टार अब फिल्म हिट की गांरटी नहीं!

श्रीशचंद्र मिश्र। इस सदी के अट्ठारह साल में यह पहला मौका है जब एक साल में तीनों खान की ख्याति बॉक्स आफिस पर धुंधला गई। इससे पहले हर साल किसी न किसी खान की फिल्म सुपर हिट होती रही है। शुरुआत सलमान खान की ‘रेस-3’ के लुढ़कने से हुई तो आमिर खान की ‘ठग्स आफ हिंदोस्तान’ को अमिताभ बच्चन का साथ भी डूबने से नहीं बचा पाया। साल खत्म होते-होते ‘जीरो’ ने शाहरुख खान की प्रतिष्ठा को धूल चटा दी। 

इन तीनों खान की असफलता ने कुछ मिथकों और गलत धारणाओं को गले से लगाए बैठे फिल्मी लोगों को उसने एक करारा झटका दे दिया है। किसी खास दिन फिल्म रिलीज करने से बंपर कमाई होने की गारंटी मिलने का मिथक इससे टूट जाना चाहिए। यह धारणा भी बदल जानी चाहिए कि सिर्फ साख के बल पर सफलता नहीं पाई जा सकती। जहां तक साख का सवाल है तो उसके बल पर कभी कभार सफलता मिल भी जाती है जैसा दो साल पहले दिवाली और क्रिसमस पर रिलीज हुई दो फिल्मों के साथ हुआ।

उन पर उनके दिग्गज निर्देशकों की साख कसौटी पर थी। दिवाली पर सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘प्रेम पतन धन पायो’ से साबित होना था कि क्या वे सलमान खान के साथ ही हिट फिल्म दे सकते हैं। क्रिसमस पर संजय लीला भंसाली की ‘बाजीराव मस्तानी’ से टकराने को तैयार रोहित शेट्टी की थी ‘दिलवाले’। 

साल के आखिरी दो महीनों की इन सबसे बड़ी फिल्मों से यह तय भी होना था कि सलमान खान और शाहरुख खान में सुपर कौन है? ‘प्रेम रतन धन पायो’ तो ठीक ठाक चल गई पर ‘दिलवाले’ लुढ़क गई। इस बार तो किसी खान की फिल्म को बड़े टकराव का सामना नहीं करना पड़ा। फिर भी नतीजा निराशाजनक रहा। यह स्टार सिस्टम की सबसे बड़ी विडंबना ही है कि फिल्म सफल हो जाती है तो क्रेडिट हीरो को मिल जाता है और पिट जाए तो बेचारे निर्देशक को कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है।

सबसे ज्यादा बट्टा उसकी साख को ही लगता है। निखिल आडवाणी की मिसाल सामने है। पहली फिल्म ‘कल हो न हो’ से उनकी जो साख बनी थी वह चार-पांच फिल्मों के लचर नतीजे के बाद ऐसी बिगड़ गई है कि कोई बड़ा स्टार अब उनके निर्देशन में काम करने को राजी नहीं है। कितने भी दिग्गज फिल्मकार क्यों न रहे हों, एक फिल्म का पिटना झेल पाना कभी किसी के लिए आसान नहीं रहा।

सोहराब मोदी ‘झांसी की रानी’ के कड़वे अनुभव के बाद फिर कोई बड़ी फिल्म बनाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। ‘मेरा नाम जोकर’ से राजकपूर की साख इतनी खराब हो गई कि उसे बचाए रखने के लिए उन्हें उस फिल्म से वितरकों को हुए घाटे की भरपाई कर्ज लेकर करनी पड़ी। ‘त्रिमूर्ति’ की नाकामी के बाद सुभाष घई को भी यही रास्ता अपनाना पड़ा। मजबूरी जो थी। साख बिगड़ने के बाद अगली फिल्म के लिए उपयुक्त माहौल बनाना और पर्याप्त फाइनेंस जुटाना मुश्किल हो जाता। 

दरअसल लगातार हिट फिल्म बना पाना किसी निर्देशक के लिए संभव नहीं हो पाया है। कुछ बदलते समय के मिजाज से मार खा जाते हैं। शांताराम सत्तर के दशक में अपनी पुरानी शैली को नहीं चला पाए। कुछ खुद को दोहराने का मोह नहीं छोड़ पाने के शिकार हो गए। मनमोहन देसाई व प्रकाश मेहरा की आखिरी फिल्मों में इसका दुष्प्रभाव दिखा। 

अपने भाई बलदेव राज चोपड़ा, अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी और गुलशन राय सरीखे बाहर के निर्माताओं के लिए यश चोपड़ा ने करीब डेढ़ दर्जन हिट फिल्में बनाईं लेकिन उनमें निरंतरता नहीं बनाए रख पाए। बीच-बीच में ‘आदमी और इंसान’, ‘सिलसिला’,‘काला पत्थर’, ‘विजय’, ‘परंपरा’ व ‘जोशीला’ जैसी नाकाम फिल्में उन्होंने दीं।

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