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पूरक रहा रंगमंच फिल्मों का

तकनीकी क्रांति ने आज फिल्मों को भले ही एक अलग पहचान दे दी हो लेकिन फिल्में रंगमंच का ही विस्तार तो है।भारतीय फिल्मों के इतिहास में यह तथ्य बेहद मजबूती से स्वीकार किया जा चुका है कि दादा साहेब फाल्के ने 1913 में पहली फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ बनाई थी। कुछ फिल्मी इतिहासकारों में इसे लेकर मतभेद है। रामचंद्र गोपाल तोरणे उर्फ दादा साहब तोरणे ने 1912 में ‘पुंडिलक’ बना दी थी। यह बहस का विषय हो सकता है कि ‘पुंडलिक’ भारत की पहली फिल्म थी या नहीं, लेकिन रंगमंच से नाता जोड़ने वाली यह पहली फिल्म जरूर थी। 

उन दिनों रंगकर्मी बाल कृष्ण कीर्तिकर के समूह ‘श्रीपाद संगीत मंडली’ का नाटक  ‘श्रीपुंडलिक’ खासी धूम मचा रहा था। मुंबई की इलेक्ट्रिकल कंपनी में क्लर्क दादा साहब साहब तोरणे ने नाटक को फिल्म का रूप दिया और 18 मई 1912 को कोरोनेशन थिएटर में फिल्म का प्रदर्शन किया। फिल्म दो हफ्ते चली भी। लेकिन उसे उपयुक्त मान्यता नहीं मिल पाई। खैर, वह दौर विज्ञान के चमत्कार से दर्शकों को अभिभूत कराने का था। आवाजविहीन फिल्मों के इस दौर में फिल्मों पर रंगमंच का खासा प्रभाव था।

यह 1931 में फिल्मों को आवाज मिलने के बाद भी एक दशक तक और चला। फिल्म विधा तब अपने शैशवकाल में भी। अभिनय और प्रस्तुतिकरण के लिए रंगमंचीय स्थितियों को अपनाना उस दौर के फिल्मकारों के लिए जरूरी था और मजबूरी भी। साधनों व तकनीक की कमी एक वजह थी। कैमरा ज्यादा हिलाया डुलाया नहीं जा सकता था। लिहाजा कलाकारों को रंगमंच की तरह एक सीमित दायरे में ही खुद को अभिव्यक्त करना पड़ता था। रिकार्डिंग की व्यवस्था काफी लचर थी। सवाक फिल्मों में इसीलिए पात्रों को जोर शोर से संवाद बोलने पड़ते थे। रंगमंचीय शैली का सबसे ज्यादा इस्तेमाल वी शांताराम ने किया। यहां तक कि जब वे अभिनय करने उतरे तो रंगमंच वाले अंदाज में संवाद बोलते ज्यादा सहज रहे। उम्र के आखिरी पड़ाव में इसी शैली को अपनाए रखने का आग्रह हालांकि उनकी फिल्मों के पराभव की वजह बना।

भारत में शुरुआती फिल्मों पर नाटकों का ज्यादा व गहरा प्रभाव था। महाराष्ट्र और बंगाल में रंगमंच ज्यादा विकसित था और उसकी गहरी छाया वहां बनने वाली फिल्मों पर पड़ना लाजिमी था। बाल गंधर्व का रंगमंच की दुनिया में खासा नाम था। वे हमेशा स्त्री भूमिकाएं करते ते। ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ की फिल्म ‘धर्मात्मा’ (पहले फिल्म का नाम ‘महात्मा’ रखा गया था लेकिन शीर्षक से महात्मा गांधी का आभास होने की वजह से ब्रिटिश सरकार ने आपत्ति कर दी।) में बाल गंधर्व पहली बार पुरुष भूमिका में आए। रंगमंचीय शैली से अलग हटने की कोशिश में वे निष्प्रभावी रहे और फिल्म भी नाकाम रही। बाद में ‘प्रभात’ ने लोकप्रिय मराठी नाटक ‘संत तुकाराम’ के कुछ कलाकारों को लेकर उसे फिल्म का रूप दिया। नाटक से ज्यादा सफलता फिल्म को मिली। दूर दराज के गांवों से लोग बैलगाड़ियों में बैठकर फिल्म देखने आते थे। 

पारसी रंगमंच की समृद्ध परंपरा और लोकप्रियता पिछली सदी के चालीसवें दशक तक फिल्मकारों के लिए आकर्षण व प्रेरणा का केंद्र रही। यह अनायास ही नहीं है कि उस दौर के कलाकारों की संवाद अदायगी में पारसी रंगमंच की गहरी छाप दिखती थी। सोहराब मोदी ने तो इसे अपनी फिल्मों में भी ढाला। अपने आकर्षक व्यक्तित्व और बुलंद आवाज के बल पर उनके अलावा पृथ्वीराज कपूर, जगदीश सेठी, जयराज, वास्ती, उल्हास आदि ने रंगमंचीय अंदाज को फिल्मों में मान्यता दिलाई। एक एक्स्ट्रा के रूप में फिल्मी सफर शुरू करने वाले पृथ्वीराज कपूर की नाटकों में इतनी गहरी रूचि थी कि फिल्मों से ज्यादा उन्होंने रंगमंच पर काम करने को प्राथमिकता दी। 

1942 में 150 सदस्यों के साथ घूमंतू थिएटर ‘पृथ्वी थिएटर्स’ की उन्होंने स्थापना की और उसके तहत कई नाटकों का मंचन किया। विभाजन की त्रासदी पर लिखे गए नाटक ‘दीवार’ की देश-विदेश में पांच सौ से ज्यादा प्रस्तुतियां हुईं। पृथ्वीराज कपूर के खाते में आई फिल्मों की संख्या मुश्किल से पचास होगी। लेकिन नाटकों में उनकी उपस्थिति सैकड़ों बार हुई। पृथ्वी थिएटर्स अब तक तीन हजार के करीब मंचन कर चुका है। 

मुंबई में ‘इप्टा’ के गठन के बाद से रंगमंच और फिल्मों के बीच गहरा रिश्ता जुड़ा। ‘इप्टा’ में सक्रिय रहे कई दिग्गजों ने फिल्मों को न सिर्फ समृद्ध किया बल्कि उन्हें नई दिशा भी दी। कला फिल्मों को विशिष्ट आयाम देने वाले ऋत्विक कुमार घटक के  ‘इप्टा’ में रहते हुए कई नाटक लिखे, खेले और निर्देशित किए। मृणाल सेन ‘इप्टा’ में रहे। ‘इप्टा’ में रहते हुए चेतन आनंद ने गोगोल के नाटक ‘इंस्पेक्टर जनरल’ पर हिंदी में नाटक मंचित किया। बाद में जब अपने भाई देव आनंद के साथ मिलकर उन्होंने फिल्म निर्माण संस्था ‘नवकेतन’ बनाई तो इसी नाटक को 1950 में ‘अफसर’ के नाम से फिल्म का रूप दिया। तीन दशक बाद इसे ‘साहिब बहादुर’ में उन्होंने दोहराया भी। 

चेतन आनंद के छोटे भाई विजय आनंद कालेज में पढ़ते हुए ‘इप्टा’ के नाटकों में प्राम्पटिंग किया करते थे। ‘इप्टा’ से ही आए बलराज साहनी ने गुरुदत्त के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘बाजी’ की पटकथा व संवाद लिख कर फिल्म बाजार में ‘नवकेतन’ के पैर जमाए। बाद में अभिनय की दुनिया में उन्होंने जो कमाल दिखाया, वह सभी जानते हैं। कई कलाकारों-फिल्मकारों ने रंगमंच से हुनर की बारह खड़ी सीखी और उससे फिल्मों को समृद्ध किया। उत्पल दत्त, गौतम घोष, अपर्णा सेन, मोहन सहगल, अडूर गोपाल कृष्णन, सुधीर मिश्रा, गिरीश कर्नाड, चारू राय, सत्येन बोस जैसे कई, दिग्गजों ने फिल्मों में पंख पसारने से पहले रंगमंच पर अच्छी खासी घिसाई की।

फिल्मों को आवाज मिलने के बाद से कई मौकों पर रंगमंच का असर फिल्मों में दिखा है। 1931 में तमिल में बनी पहली बोलती फिल्म ‘कालिदास’ में नाटक को हूबहू उठा कर उसे फिल्मी शक्ल दी गई। 1948 में उदय शंकर ने भारत की पहली और अब तक की एकमात्र बैले फिल्म ‘कल्पना’ बनाई। उसमें अभिनय भी किया। यह नृत्य नाटिका दर्शकों को ज्यादा रास नहीं आई लेकिन राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे खासी ख्याति मिली। 1944 में महाराष्ट्र में नाटक ‘राम शास्त्री’ काफी चर्चित हुआ। ‘प्रभात’ ने उसका फिल्मी रूपांतरण किया। गजानन जागीरदार के निर्देशन में बनी इस फिल्म के नाटक और फिल्म के बुनियादी तत्वों में गजब का तालमेल बैठाया। भालचंद्र गोपाल पेंढारकर का नाटक ‘पृथ्वी वल्लभ’ की वजह से बेहद चर्चित हुए। 

सोहराब मोदी ने जब उस पर फिल्म बनाई तो भालचंद्र ने ही उसकी कथा और पटकथा लिखी। पेशे से डाक्टर जब्बार पटेल ने 1980 में मराठी नाटक ‘सिंहासन’ पर फिल्म बना कर राजनीतिक व्यवस्था पर तीखा कटाक्ष किया। फिल्म डिवीजन के लिए उन्होंने भारतीय नाट्य शास्त्र के इतिहास पर एक वृत्त फिल्म भी बनाई। मणि कौल की ज्यादातर फिल्में एकांकियो और लोक नाटकों पर आधारित रही। विजया मेहता ने मराठी नाटकों ‘शांकुतलम’ व ‘बाडा चिरेंबदी’ पर टीवी फिल्में बनाई। उनकी फिल्म ‘राव साहब’ का मूल आधार भी नाटक था। सई परांजपे ‘स्पर्श’, ‘कथा’ व ‘चश्मे बद्दूर’ जैसी फिल्मों से चर्चा में रहीं। 

उन्होंने दो नाटकों- ‘द लिटिल टी शॉप’ व ‘जादू का शंख’ पर भी फिल्में बनाईं।असमिया फिल्मकार भवेंद्र नाथ सैकिया ने फिल्मों से राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय ख्याति पाने के साथ-साथ असम मोबाइल थिएटर से जुड़ कर चौदह नाटकों का मंचन किया। दादा कोंडके दो बातों के लिए विख्यात रहे। एक तो उन्होंने अपनी फिल्मों में द्विअर्थी संवादों का ज्यादा इस्तेमाल किया। दूसरे, लगातार नौ सुपरहिट फिल्में बनाकर गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड्स में नाम दर्ज कराया। लेकिन उनका एक अलग रूप मराठी नाटकों में दिखा। इनमें ‘बिच्छा माझी पुरी करा’ उल्लेखनीय है।

पिछले कुछ दशकों में नाटकों का फिल्मी रूपांतरण करने में फिल्मकारों ने कम ही रूचि दिखाई है। न ही रंगमंच की दुनिया में झांकने की ज्यादा कोशिश हुई है। रंगमंच पर बेहद चर्चित रहे ‘-शांतता कोर्ट चालू आहे, ‘घासीराम कोतवाल’, ‘चरणदास चोर’ जैसे नाटकों की फिल्मी रूपांतरण फ्लाप होना शायद इसकी वजह है। मंचन का रिकार्ड बना चुका नाटक ‘तुम्हारी अमृता’ फिल्मी रूप नहीं ले पाया है तो शायद इसलिए कि उसकी व्यावसायिक सफलता संदिग्ध लगती है। 1967 में दुनिया की पहली एक पात्र वाली फिल्म ‘यादें’ बता कर सुनील दत्त ने जो झटका खाया था, वह कोई और झेलना नहीं चाहता। 

फिल्म भी नाट्य विषय वस्तु पर फिल्म बनाने का जोखिम बुद्धदेव दास गुप्ता ने उठाया ही। 1987 की उनकी फिल्म ‘फेरा’ बंगाल के लोक नाट्य ‘जात्रा’  के लिए नाटक लिखने वाले नायक रंगमंच के आदर्श लोक और यथार्थ के बीच के अंतर्संबंध को बड़ी खूबी से उभारती है। गुजरात की लोक नाट्य विधा भवाई पर आधारित नाटक ‘अछूत नो वेश’ पर 1980 में केतन मेहता ने गुजराती में ‘भवनी भवाई’ बनाई। उससे पहले चालीस के दशक की मराठी लोक रंगमंच व फिल्मों की लोकप्रिय नायिका हंसा वाडकर की जिंदगी पर 1977 में श्याम बेनेगल ने ‘भूमिका’ बनाई। इस तरह के प्रयोग अब नहीं हो रहे है।

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