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बदल रही फिल्मों की पहचान

श्रीशचन्द्र मिश्र
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(image) अक्षय कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर मचे निरर्थक बवाल को छोड़ दिया जाए तो इस बार के राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों ने हिंदी फिल्मों का स्वरूप बदलने की एक तरह से पुष्टि की है। ‘पिंक’ और ‘नीरजा’ जैसी फिल्मों को अलग-अलग वर्ग में मिले पुरस्कार से साफ है कि हिंदी फिल्में पारंपरिक खांचों से निकल एक नई धारा गढ़ रही हैं।  यह धारा पलायनवादी मनोरंजन से दूर है और कलात्मक फिल्मों की बोझिल बौद्धिकता से भी पूरी तरह मुक्त है। उल्लेखनीय यह है कि इस तरह की फिल्में बाजार में भी झंडा गाड़ रही हैं। उन्हें दर्शकों की खासी सराहना मिल रही है। फिल्मों के मिजाज में यह बदलाव हालांकि पिछले कुछ सालों से देखा जा रहा है। अब उपरोक्त फिल्मों के अलावा ‘रुस्तम’, ‘दंगल’, ‘अलीगढ़’, ‘एअरलिफ्ट’, ‘अनारकली आरा की’, ‘पॉर्च्ड’, ‘बेगम जान’, ‘कहानी-2’, ‘उड़ता पंजाब’, ‘हाई वे’ जैसी फिल्मों से यह रफ्तार बढ़ गई है। यह बदलाव हालांकि अभी सीमित स्तर पर है। इसकी सबसे बड़ी वजह फिल्म इंडस्ट्री पर बाजार तंत्र का हावी होना है। इस तंत्र ने एक सुनियोजित अभियान के तहत यह स्थापित कर रखा है कि बड़े सितारों की करोड़ों में बनने वाली फिल्में ही हिट हो सकती है। बॉक्स आफिस पर सौ करोड़ रुपए से ज्यादा कमाने वाली फिल्मों का जलवा कुछ ऐसा बना दिया गया है मानों वही फिल्म उद्योग की जान है। पिछले दस साल में इस तरह की फिल्मों की कमाई का आंकड़ा उछलता हुआ सात सौ करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। हजारों प्रिंट के साथ घूम धड़ाके से फिल्म रिलीज कर फटाफट माल बटोर लेने वाली ऐसी फिल्मों में न कोई कहानी होती है, न कोई भावना। सौ करोड़ से ज्यादा कमाने वाली पचास से ज्यादा फिल्मों ने फूहड़ता, हिंसा और अश्लीलता को ही बढ़ावा दिया है। लेकिन फिल्म उद्योग की यही तस्वीर अब नहीं रही है। इन बड़ी और बेतुकी फिल्मों की भीड़ में ऐसी भी कई फिल्में बन रही हैं जो विषय के प्रति संवेदनशील हैं। खास बात यह है कि इस तरह की फिल्में अपनी कमाई का ढिंढोरा नहीं पीटतीं लेकिन तथाकथित अरबपति क्लब में शामिल फिल्मों से लागत के अनुपात में ज्यादा कमा रही है। उससे बड़ी बात यह है कि घटिया मनोरंजन परोसने वाली फिल्मों की भीड़ में ये फिल्में ताजगी का अहसास तो करा रही है, आम दर्शकों को भी खूब भा रही है। पिछले एक दशक में ऐसी पचास से ज्यादा फिल्मों के नाम लिए जा सकते हैं। ‘शोले’ के बाद शुरू हुआ हिंसा और अविवेकपूर्ण फिल्मों का सफर बीच-बीच में कुछ उद्देश्यपूर्ण फिल्मों से डगमगाया जरूरी है लेकिन पिछले कुछ सालों में इस तरह की फिल्में एक बेहतर विकल्प के रूप में ज्यादा सामने आने लगी हैं। इन फिल्मों की सफलता ने बंधी बंधाई लीक तोड़ कर नए प्रयोग करने की फिल्मकारों को हिम्मत दी है। यह वजह है कि अब इस तरह के विषयों पर ज्यादा फिल्में बन रही हैं जिन पर पहले हाथ डालने में निर्माता कतराते थे। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अब अलग विषय पर फिल्म बनाने में घाटा होने का जोखिम कम हो गया है। पिछले दस साल में अच्छा खासा मुनाफा कमाने वाली फिल्मों के कारोबार का अगर जायजा लिया जाए तो पता चलता है ज्यादा मुनाफा उन फिल्मों को हुआ जिनमें कोई बड़ा स्टार नहीं था या उनका बजट करोड़ों में नहीं था। मुनाफे की सीधी सारी परिभाषा यही हो सकती है कि किसी फिल्म ने अपनी लागत के मुकाबले कितनी कमाई की। इस हिसाब से पिछले दस साल की सुपर हिट फिल्म रही है ‘भेजा फ्राइ’। 2007 में रिलीज हुई इस फिल्म में कोई स्टार नहीं था। न ग्लैमर का तड़का था। फिर भी डेढ़ करोड़ रुपए में बनी इस फिल्म ने बारह करोड़ साठ लाख रुपए कमाएं, यानी लागत से 739 फीसद ज्यादा। यह फिल्म बनाने के लिए निर्माता सुनील दोषी को अपना घर गिरवी रखना पड़ा था। ‘कृश-3’ या ‘धूम-3’ ने अगर पांच सात सौ करोड़ रुपए कमा भी लिए तो क्या हुआ? डेढ़ डेढ़ सौ करोड़ रुपए में बनीं ये फिल्में चार पांच गुना ही तो कमा पाई। इस दौर में स्थापित सितारों की 70-80 करोड़ में बनी दर्जनों फिल्मों के लिए अपनी लागत निकालना भी मुश्किल हो गया। 2013 की ‘आशिकी-2’ में नए कलाकार थे। पंद्रह करोड़ रुपए में फिल्म बनी और उसने 629 फीसद ज्यादा 109 करोड़ 40 लाख रुपए कमा कर दिए। यह सिलसिला पिछले कुछ सालों से बढ़ा है। 2006 में सूरज बड़जात्या की ‘विवाह’ आठ करोड़ रुपए में बनी और उसने 518 फीसद ज्यादा कमाई कर निर्माता को 49 करोड़ पांच लाख रुपए थमा दिए। उसी साल प्रियदर्शन के निर्देशन में बनी ‘मालामाल वीकली’ ने सात करोड़ की लागत के मुकाबले 511 फीसद से ज्यादा कमाई कर 42 करोड़ 80 लाख रुपए जुटाए। 2008 में 15 करोड़ रुपए में बनी ‘जाने तू या जाने ना’ ने 84 करोड़ बीस लाख रुपए कमा कर दिए। पिछले साल ही ‘नीरजा’, ‘हाई वे’ आदि फिल्मों ने यह कमाल दिखाया। फिल्म बाजार में मसाला फिल्मों का दबदबा बनता है, सितारों और भव्यता की वजह से। उनकी कमाई के आंकड़े आकर्षक जरूर होते हैं लेकिन अक्सर हिस्सेदारों के हाथ में ज्यादा कुछ नहीं आता। लिहाजा बाक्स ऑफिस संग्रह के आधार पर फिल्म की लोकप्रियता का सफलता का आकलन नहीं किया जा सकता। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि फिल्म मनोरंजन का माध्यम होने के साथ साथ कारोबार भी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है फिल्में बंधे बंधाए फार्मूलों में सिमट कर रह जाएं और जबरन खींच ली गई रेखा को लांघने की कोशिश ही न करें।
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