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टूटती नहीं फिल्मी भेड़चाल

श्रीशचन्द्र मिश्र
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(image) पिछले कुछ सालों में हिंदी फिल्मों में एक अलग तरह का बदलाव महसूस हुआ है। पारपंरिक तौर तरीकों को त्याग कर नए विषयों को नए नजरिए से परिभाषित करने की फिल्मकारों में रूचि जागी है। लेकिन यह हो रहा है सीमित स्तर पर। ज्यादातर फिल्मों में मौलिकता की जगह नकल की भेड़चाल हावी है। यह प्रवृत्ति आज की नहीं है। आजादी से थोड़ा पहले जब यह स्थापित हो गया था कि फिल्म निर्माण एक व्यवसाय के रूप में फलने फूलने लगा है, तभी से नब्वे फीसद से ज्यादा फिल्मकारों के लिए फिल्म बनाना लागत से ज्यादा मुनाफा कमाने का जरिया बन गया है। इसमें विशुद्ध रूप से कारोबारी मानसिकता का दबदबा रहा है। फिल्म बनाना एक उत्पाद पहले भी था, आज भी है। व्यावसायिकता की यह आंधी फिल्मों को विचार, मंथन और नैतिकता को पूरी तरह ध्वस्त नहीं कर पाई तो इसलिए कि हर दौर में कुछ फिल्मकारों ने सिनेमा की उपयोगिता और उसके सौंदर्य को बचाए रखा। लेकिन हिंदी फिल्मों पर कुल मिला कर नकल करने की होड़ किसी दौर में खत्म नहीं हो पाई। इसे एक अनिवार्य मजबूरी की तरह स्वाभाविक कहा जा सकता है। नए प्रयोग करने के उत्साह में लीक तोड़ने वाले कई निर्माताओं का हश्र सामने है। उन्हें एक बार लुढ़क जाने के बाद उठने का मौका ही नहीं मिल पाया। दो दशक पहले तक तो सार्थक प्रयोगवादी फिल्में बनाने वालों को सरकार से आर्थिक मदद भी मिल जाती थी। अब कारपोरेट के फिल्म निर्माण के क्षेत्र में आ जाने के बाद मौलिक विषय फिल्माने वालों को सहूलियत तो हुई है लेकिन कुल मिला कर फिल्म बाजार का गणित मुनाफे पर ज्यादा केंद्रित हो कर रहा गया है। ऐसे में फिल्म एक कलात्मक अभिव्यक्ति कम और बिजनेस प्रोजेक्ट ज्यादा हो गई है। जो ढर्रा एक बार सफल हो जाता है उसी को बार-बार दोहराने की कोशिश की जाती है। नकल के मामले में सिर्फ किसी भाषा या प्रांत तक ही सीमित नहीं रहा जाता। इसके लिए हालीवुड का मुंह ताकने का चलन भी काफी पुराना रहा है। इसे नकल की बजाए प्रेरणा बता कर हमेशा तर्कसंगत ठहराया गया है। वैसे तो सौ साल से ज्यादा का फिल्मी इतिहास हॉलीवुड या पश्चिमी देशों से मिलने वाली खुराक पर ही फला फूला है। यह अजीब इसलिए नहीं लगता क्योंकि सिनेमा क्रांति का सूत्रपात ही वही हुआ। भ्रम और छलावे से भरी मायावी दुनिया को अपनाने के लिए जो उपकरण चाहिए थे वे भारत में उपलब्ध ही नहीं थे। 7 जुलाई 1896 को मुंबई के अखबारो में एक विज्ञापन छपा था जिसमें लोगों को एक रुपए का टिकट लेकर चलती फिरती तस्वीरें देखने के लिए वाटसन होटल बुलाया गया था। ल्यूमियर बंधुओं ने ट्रेन के प्लेटफार्म पर आने, लोगों के समुद्र में नहाने, एक दीवार के गिरने, बच्चे को दूध पिलाती महिला, फैक्ट्री से बाहर निकलते मजदूर, जैसे कुछ चलते फिरते छायाचित्रों को दिखा कर लोगों को चौंकाया तो कुछ उत्साही लोगों को विज्ञान के इस नए चमत्कार को अपनाने की प्रेरणा भी दी। कोलकाता में हरिश्चंद्र सखाराम भातवडेकर ने कुश्ती के दृश्य जुटाए तो मुंबई में हीरालाल सेन ने पुणे की घुड़दौड़ और प्लेटफार्म पर ट्रेन रुकने के दृश्य दिखा कर इस मोर्चे पर भारतीय पहल कर दी। और यह सब वाटसन होटल के शो के दो साल के भीतर हो गया। हालांकि उसके लिए सेन और भातवडेकर को कैमरे की व्यवस्था अमेरिका व इंग्लैंड से करनी पड़ी। भातवेडकर ने ल्यूमियर बंधुओं का कैमरा किराए पर लिया और उन्हें उसके एवज में एक हजार रुपए देने पड़े। कथा सूत्र पर हालीवुड में ‘लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ बनी तो अपने यहां दादा साहेब फालके ने ‘राजा हरिश्चंद्र’ बना दी। 1929 में विदेशों में पहली बोलती फिल्म बनी ‘दे मेलडी आफ लव’ के दो साल बाद खान बहादुर आर्देशिर ईरानी ने ‘आलामआरा’ बना दी। वहां फिल्म में रंग आए तो शांताराम अपनी फिल्म ‘सैरन्ध्री’ को रंगीन कराने जर्मनी ले गए। विदेश में पहली टेक्नीकलर फिल्म बनी तो सोहराब मोदी ने 1953 में ‘झांसी की रानी’ को टेक्नीकलर कर दिया। हालांकि इसके लिए उन्हें विदेशी तकनीशियनों की मदद लेनी पड़ी। हॉलीवुड में सिनेमा स्कोप में पहली फिल्म बनी ‘द प्रोब’ 1953 में। उसे भारत में दोहराने में छह साल लग गए। वजह थी तकनीकी जानकारी उपलब्ध न होना। आखिर 1959 में गुरुदत्त ने ‘कागज के फूल’ बना कर यह कमी पूरी कर दी। विदेशों में थ्री डी फिल्में बनीं तो अपने यहां भी यह सिलसिला शुरू हो गया। स्पेशल इफेक्ट्स का वहां कंप्यूटरीकरण हुआ तो उस तकनीक को भी अपने यहां हाथों हाथ लपक लिया गया। लेकिन यह सब विशुद्ध रूप से नकल की श्रेणी में नहीं आता। इसे प्रेरणा लेना कहा जा सकता है या अनुसरण करना। आखिर जब तकनीक से लेकर कच्ची फिल्म तक के लिए कई साल जर्मनी, इंग्लैंड या अमेरिका पर निर्भर रहना पड़ा तो उनके दिखाए रास्ते पर चलने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था। लेकिन बाद में कई मौके ऐसे भी आए जब कथानक के स्तर पर विदेशी फिल्मों की हूबहू नकल की गई। ऐसा करने वाले लाख कहें कि उन्होंने सिर्फ प्रेरणा ही ली लेकिन नकल तो नकल ही होती है। पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ के 1913 में बनने के बाद 1931 तक बनी करीब आठ सौ फिल्मों में लकीर पीटने की प्रवृत्ति ज्यादा हावी रही। करीब अस्सी फीसद फिल्में पौराणिक या ऐतिहासिक आख्यानों पर बनाई गई और आमजन में प्रचलित प्रसंगों को ही बार बार दोहराया गया। 1931 में फिल्मों को आवाज मिलने के बाद जब यह तय हो गया कि यह माध्यम व्यापक असर के साथ लंबे समय तक चलने वाला है तो इसमें नई संभावनाएं तलाशी गईं और विषय व प्रस्तुतीकरण में नवीनता लाने के लिए फिर विदेशी फिल्मों का मुंह ताकने का सिलसिला शुरू हो गया। सौ से ज्यादा फिल्में ऐसी रही हैं जिनमें विदेशी फिल्मों का कथानक उड़ाने में कोई कोताही नहीं बरती गई। दिलचस्प बात तो यह है कि एक ही फिल्म की नकल पर कई कई फिल्में बनीं। मिसाल के तौर पर ‘इट हैपंड इन वन नाइट’ पर ‘चोरी चोरी’, ‘सोलहवां साल’ व ‘दिल है कि मानता नहीं’ बनीं। ‘युअर्स माइंस एंड अवर्स’ पर ‘खट्टा-मीठा’ व ‘हमारे तुम्हारे’ आई। अंग्रेजी फिल्म ‘द पेरेंट ट्रैप’ पर पहले 1968 में ‘दो कलियां’ बनी और फिर 1986 में इसी कहानी को ‘प्यार के दो पल’ का नाम दे दिया गया। ‘केप फियर्स’ का क्लाइमैक्स तो ‘कमायत’ व ‘डर’ में हूबहू उड़ा लिया गया। जूलिया राबर्ट्स की चर्चित फिल्म ‘स्लीपिंग विथ एनिमी’ को ‘अग्निसाक्षी’, ‘दरार’ व ‘याराना’ में निचोड़ा गया। विदेशी कथानक को अपना बता कर फिल्म बनाने में बड़े फिल्मकार भी पीछे नहीं रहे हैं। इसमें किसी भी भाषा की फिल्म की नकल उतारने से उन्होंने परहेज नहीं किया। गुलजार की एक फिल्म ‘परिचय’ हालीवुड की विश्व विख्यात फिल्म ‘द साउंड आफ म्यूजिक’ की नकल थी तो दूसरी फिल्म ‘कोशिश’ जापानी फिल्म ‘हैप्पीनेस टू अस आलवेज’ की कापी। एफसी मेहरा ने हालीवुड की फिल्म ‘डर्टी हैरी’ को हिंदी में ‘खून खून’ नाम से परोस दिया। शम्मी कपूर के निर्देशन में बनी ‘मनोरंजन’ के ज्यादातर दृश्य फ्रेंच फिल्म ‘इरमा ल ड्यूस’ की नकल थे। ‘गॉडफादर’ पर फिरोज खान ने ‘धर्मात्मा’ बनाई। सुभाष घई की ‘कर्ज’ हालीवुड की ‘द रिइन्कार्नेशन आफ फीटर प्राउड’ से बुरी तरह प्रभावित थी। बलदेव राज चोपड़ा ने ‘लिपस्टिक’ पर ‘इंसाफ का तराजू’ और ‘डेथ विश’ पर ‘आज की आवाज’ बनाई। ‘फोर्टी एट्थ आवर्स’ पर ‘अंदर बाहर’, ‘सेवन ब्राइड्स फार सेवन ब्रदर्स’ पर ‘सत्ते पे सत्ता’, ‘माय फेयर लेडी’ पर ‘मनपसंद’, ‘टेन लिटिल निगर्स’ पर ‘गुमनाम’, ‘द एक्जार्सिस्ट’ पर ‘जादू टोना’, ‘डायल एम फार मर्डर’ पर ‘एतबार’, ‘मीट जान डो’ पर ‘मैं आजाद हू’ जैसी फिल्में बनी। यह सिलसिला अभी थमा नहीं है। ‘रॉ वन’, ‘डॉन-2’ और ‘धूम’ व ‘कृश’ कड़ी की तीनों फिल्में हों या तमिल व हिंदी में बनी ‘रोबोट’ और ‘गजनी’ हो, सभी में अंग्रेजी फिल्मों की छाप दिखती है। इन फिल्मों के स्पेशल इफेक्ट्स के लिए विदेशी तकनीशियनों की मदद ली गई। उन्नीस सौ चालीस के दशक के बाद हालांकि कुछ फिल्मकारों ने सार्थक और समाजोपयोगी सिनेमा से नाता जोड़े रखा लेकिन ज्यादातर फिल्म निर्माताओं में जो प्रवृत्ति पनपी वह थी लीक पर चलने की। कोई फिल्म सुपरहिट हुई तो यह सोचे समझे बिना कि उसकी सफलता किन कारणों से हुई, उसकी नकल शुरू होने लगी। लकीर के फकीर बनने की इस होड़ में निर्माताओं को मुंह की भी खानी पड़ी लेकिन आदत एक बार बनी तो गई नहीं। अपनी तरफ से कोई नया विषय सोचने की बजाए वे आजमाए जा चुके नुस्खों को ही अपनाना ज्यादा पसंद करते रहे। एक तो उसमें अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती और दूसरे यह उम्मीद तो रहती ही है कि एक बार जो फार्मूला चल गया, वह चलता ही रहेगा। कम से कम ऐसा करने में उन्हें कोई व्यावसायिक खतरा महसूस नहीं होता। सीधे सीधे दोष निर्माताओं को नहीं दिया जा सकता। कुछ ही निर्माता होते हैं जो दिल से फिल्म बनाते हैं। कुछ दिमाग का सहारा लेते हैं। कुछ ही ऐसे गिने चुने फिल्मकार हैं जो दिल और दिमाग का बेहतर इस्तेमाल कर पाते हैं। लेकिन ज्यादा संख्या उन फिल्मकारों की है जो फिल्म निर्माण को एक कारोबार की तरह लेते रहे हैं। पैसा लगा कर ज्यादा पैसा कमाने की प्रवृत्ति उन्हें कोई जोखिम नहीं उठाने देती। इसीलिए उनकी सारी कोशिश इसी बात की रहती है ऐसी बेहद सुरक्षित फिल्म बनाई जाए जिसमें हर वर्ग के दर्शकों की पसंद के तत्व हों ताकि फिल्म पिठने की कोई आशंका न रहे। यह बात अलग है कि इसके बावजूद ज्यादातर फिल्में फ्लाप हो जाती हैं। 1931 में ‘आलमआरा’ से फिल्मों को आवाज मिलने के बाद से एक साल में हिट फिल्मों का औसत आठ-दस से ज्यादा कभी नहीं रहा है। जबकि पिछले पचास साल से ज्यादा के अरसे में कोई साल ऐसा नहीं गया है जब सवा सौ से ज्यादा हिंदी फिल्में न बनी हों। यह सही है कि हर साल वही फिल्में हिट नहीं होती जिनमें नया विषय होता है। फिर भी उन फिल्मों का अनुपात हमेशा ज्यादा रहा है जिनमें मनोरंजन के नए आयाम तलाशे गए। आजादी के बाद फिल्में एक बंधे बंधाए फार्मूले में ज्यादा उलझने लगीं। हालांकि यह विवशता फिल्म वालों ने शुरू से ही ओढ़े रखी। मूक फिल्मों का 18 साल का दौर तो खैर किसी नए प्रयोग की संभावना तलाश ही नहीं सकता था। तब बुनियादी लक्ष्य तो किसी तरह अपने पैरों पर टिके रहने का था। फिल्मों को आवाज मिलने के बाद सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक फिल्मों का ही दबदबा रहा। आजादी के आसपास दुखांत प्रेम कथाओं का सिलसिला शुरू हुआ। जल्दी ही उसने एक फार्मूले का रूप ले लिया और उसे दर्जनों फिल्मों में भुनाया गया। उन्नीस सौ साठ के दशक के शुरू में फिल्मों पर रंगीनी छाने लगी। स्टार सिस्टम शुरू हुआ। फिल्म निर्माण की परिभाषा बदल गई और गीत संगीत प्रधान रोमांटिक फिल्मों का एक नया फार्मूला बाजार में आ गया। ‘लव इन शिमला बनी’ तो ‘कश्मीर की कली’ व ‘लव इन टोक्यो’ तक बात जा पहुंची। ‘राम और श्याम’ से दोहरी भूमिका के खेल ने लोगों को चमत्कृत किया तो उस फार्मूले को ‘दो कलियां’, ‘सीता और गीता’, ‘चालबाज’, ‘जैसे को तैसा’ जैसी दर्जनों फिल्मों में दोहराया गया। राजकपूर ‘संगम’ में लोगों को विदेश क्या ले गए कि विदेशी लोकेशन पर शूटिंग करने का नया रिवाज चल निकला। फिल्मों के नाम भी ‘एन इवनिंग इन पेरिस’, ‘नाइट इन लंदन’ व ‘स्पाइ इन रोम’ जैसे होने लगे। ‘अराउंड द वर्ल्ड’ में तो पूरी दुनिया घुमा दी गई। यह चलन आज भी जारी है। लंदन, पेरिस व स्विटजरलैंड जैसे पारंपरिक स्थलों का रंग चटका तो जोर्डन, मिस्र, लाटविया, इराक, बेल्जियम, द. कोरिया, थाईलैंड, न्यूजीलैंड व आस्ट्रेलिया में नई लोकेशन तलाश ली गई। एक जमाने में कश्मीर में फिल्म की शूटिंग करना अनिवार्य मान लिया गया था। ऐसा ‘जंगली’ की सफलता से हुआ। कश्मीर में आतंकवाद व अलगाववाद के चरम तक पहुंचने से पहले तक कश्मीर एक ऐसा फार्मूला बन गया था जिसके बिना फिल्म की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। अब घाटी में स्थिति थोड़ी शांत हुई है तो वहां फिर से फिल्मों की शूटिंग होनी शुरू हो गई है। एक और फार्मूला पचास साल पहले फिल्म ‘वक्त’ से चलन में आया। वैसे तो उससे पहले भी ‘मुसाफिर’, ‘चार दिल चार राहे’ जैसी फिल्मों में भी सितारों का जमावड़ा लगाया गया था लेकिन ‘वक्त’ सरीखी जबर्दस्त सफलता किसी को नहीं मिल पाई थी। ‘वक्त’ के बाद ढेरों सितारों को जमा कर फिल्म बनाने की ऐसी होड़ शुरू हो गई कि कुछ निर्माता तो मालामाल हो गए लेकिन कइयों के दफ्तर बंद हो गए। ‘जंजीर’ ने प्रतिशोधात्मक फिल्मों का फार्मूला थमा दिया बीस साल तक फिल्में हिंसा से लथपथ होती रहीं। ‘दीवार’ में माफिया ने जरा सा सिर उठाया था। आने वाले सालों में तो माफिया फिल्मों के सिर चढ़ कर बोलने लगा। ‘सत्या-2’ सरीखी फिल्में नए माफिया गढ़ने में जुट गई। ‘शूल’ से कस्बाई संस्कृति को फिल्मों में उभारने का जो सिलसिला शुरू हुआ उसमें पिछले दस साल में काफी इजाफा हुआ है। छोटे शहरों व कस्बों पर केंद्रित फिल्में अब धड़ल्ले से बन रही हैं। पहले फिल्म में गालियां देना वर्जित माना जाता था। ‘देल्ही वेल्ही’ ने बेहूदा गालियों को ऐसा स्थापित किया कि आज अभिनेत्रियां तक खुल कर गाली देती दिख रही हैं। निर्माताओं की एक बड़ी बिरादरी हमेशा इस ताक में रहती है कि कोई कामयाब नुस्खा मिल जाए जिसे झपट कर वह फटाफट अपनी फिल्म बना डाले। पिछले कुछ सालों से फिल्मों का सीक्वल बनाने या किसी पुरानी हिट फिल्म का रीमेक करने का जादू खूब छाया हुआ है। सीक्वल यानी एक फिल्म के केंद्रीय पात्रों को लेकर कहानी का विस्तार करते हुए दूसरी या तीसरी फिल्म बनाना और रीमेक मतलब अपनी ही बनाई फिल्म को नए सितारों और नए माहौल में ढाल कर फिर बनाना। ये दोनों शब्द इन दोनों खूब प्रचलन में हैं। हालांकि यह कोई नई पहल नहीं है। लेकिन पिछले एक दशक में तो सीक्वल की आंधी आ गई है। यह चलन हॉलीवुड में ज्यादा रहा है। अब इसे मुंबइया निर्माता लगातार भुना रहे हैं। ‘धूम’, ‘कृश’, ‘मर्डर’ और ‘राज’ तीन बार बन चुकी है। वहीं ‘डॉन’, ‘जन्नत’, ‘हाउसफुल’, ‘आशिकी’ के दो दो रूप सामने आए। जहां तक रीमेक का सवाल है तो तमिल और तेलुगू फिल्मों के निर्माता सालों साल अपनी सफल फिल्मों के अधिकार हिंदी फिल्म निर्माताओं को बेच कर मालामाल होते रहे या खुद ही अपनी फिल्मों का हिंदी में रीमेक कर उन्होंने चांदी काटी। यह सिलसिला नहीं बनता तो बोनी कपूर सफल नहीं हो पाते। उनकी ज्यादातर उन्हीं फिल्मों ने पैसा कमा कर दिया जो तमिल या तेलुगू फिल्मों का रीमेक थीं। आज हालत यह है कि दो दर्जन फिल्मों को फिर बनाया जा रहा है। सैफ अली खान अपनी पसंदीदा फिल्म ‘आराधना’ को फिर बनाना चाहते हैं। मूल फिल्म के निर्माता या अधिकारधारक से प्रति फिल्म तीस लाख से डेढ़ करोड़ रुपए की कीमत पर फिर वही फिल्म बनाने का ठेका खरीद कर ‘अंगूर’, ‘साहब बीवी और गुलाम’, ‘मुझे जीने दो’, ‘बैजू बावरा’, ‘खेल खेल में’, ‘सीता और गीता’, ‘जलवा’, ‘कालिया’, ‘नमक हलाल’, ‘जब जब फूल खिले’, ‘हीरो’ जैसी फिल्मों को जिंदा करने की तैयारी चल रही है। दस साल पहले तक किसी हस्ती की जीवनी पर फिल्म बनाने के बारे में कोई सोचता तक नहीं था। वह तो ब्रिटिश फिल्मकार रिचर्ड एटनवरो ‘गांधी’ बना गए। नहीं तो राष्ट्रपिता पर फिल्म बनाने की कोई पहल ही नहीं हुई। सरदार पटेल, बाबा साहब अंबेडकर व सुभाष चंद्र बोस पर फिल्में बनीं जरूर लेकिन उन्हें उन नेताओं के नाम पर बने ट्रस्ट ने बनाया व्यावसायिक स्तर पर किसी हस्ती के जीवन को अरसे तक फिल्मों में नहीं उतारा गया। किसी हस्ती की जीवनी पर फिल्म बनाने में आम तौर पर किसी हस्ती की जीवनी पर फिल्म बनाने में आम तौर पर संकोच किया गया तो सिर्फ इसलिए ही नहीं कि खतरा विवाद में उलझने का रहा, ऐसी फिल्मों के लिए पर्याप्त दर्शक न जुट पाने की आशंका भी बनी रही। इस संकोच के बावजूद कुछ जीवनीपरक फिल्में (बायोपिक) बनीं। अब ऐसी फिल्मों के लिए अतिरिक्त उत्साह दिखने लगा है तो इसकी खास वजह है। इस तरह की कुछ फिल्में हिट हो गई है। जाहिर है नकल का रास्ता खुल गया है। निर्माताओँ को अब यह भरोसा हो गया है कि विख्यात लोगों की जीवनी पर फिल्म बनाना अब घाटे का सौदा नहीं रह गया है। इसी का असर है कि हस्तियों की जीवनी पर आधारित बायोपिक के करीब एक दर्जन प्रोजेक्टों पर काम हो रहा है। यह जरूर है कि इस मामले में राजनीति से जुड़ी हस्तियों से परहेज किया जा रहा है। इसमें समस्या यह भी रही है कि किसी राजनीतिक हस्ती पर फिल्म बनाते समय निष्पक्षता बरतने से उसके अंध समर्थकों की तात्कालिक हिंसक प्रतिक्रिया होने का डर हमेशा लगा रहता है। समर्थक अपने नेता की गौरवशाली छवि के अलावा उसके व्यक्तित्व के काले सफेद पहलू को हजम करने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। इसीलिए जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी व सोनिया गांधी तक पर करोड़ों की लागत से भव्य फिल्में बनाने की घोषणा तो हुई लेकिन कोई भी प्रोजेक्ट सिरे नहीं चढ़ पाया। बायोपिक बनाने में सबसे बड़ी समस्या है ऐसी हस्ती को चुनने की जिसकी जीवन गाथा में रोमांच और भरपूर नाटकीयता हो और उसे लेकर कोई विवाद खड़ा न हो। समस्या यह भी है कि किसी जीवनी में नाटकीय उतार-चढ़ाव ढूंढ़ने और उसे मार्मिक तरीके से पेश करने में ज्यादा मेहनत चाहिए और उसमें स्वाभाविकता का ध्यान रखा जाना भी जरूरी है। आम फिल्मों की पटकथा लिखने में कल्पना की भरपूर उड़ान ली जा सकती है लेकिन बायोपिक में संयमित रह कर फिल्म को सहज रूप से दर्शनीय बनाने पर जो देना पड़ता है। ‘द डर्टी पिक्चर्स’ में तथ्यों से तोड़ मरोड़ हुआ। फिल्म चल गई तो फिल्म को तथ्यपरक बनाने की अब कोई जरूरत नहीं समझता सिर्फ सनसनी मचाना लक्ष्य हो गया है। बायोपिक के लिए विख्यात या कुख्यात लोगों पर भी निर्मताओं का मोह हिलोरे मान रहा है। मसलन अनुराग कश्यप और पूजा भट्ट अंतरराष्ट्रीय अपराधी चार्ल्स शोभराज को हीरो बनाने की फिराक में हैं। वैसे तो डॉन वरदराजन मुदलियार पर पहले तमिलमें ‘नायकन’ और फिर हिंदी में ‘दयावान’ अरसे पहले बन चुकी है। ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन की भूमिका पर तस्कर हाजी मस्तान का असर बताया गया था। पिछले दस साल में तो दाऊद इब्राहिम का गुणगान करने वाली कई फिल्में बन चुकी है। और तो और छोटो मोटे माफिया और गैंगस्टर भी फिल्मों के केंद्रीय पात्र बन चुके हैं। कुछ में उनके असली नाम का जिक्र किया गया तो कुछ में सांकेतिक रूप से उनका नाम देकर गुजारा कर लिया गया। तिग्मांशु धूलिया बेगम समरू पर, अनंत महादेवन गौर हरि पर और केतन मेहता दशरथ मांझी पर फिल्म बना रहे हैं। एकता कपूर ने तो सलीम-जावेद तक पर फिल्म बनाने का सोच लिया है। फिल्म शायद बन न पाए क्योंकि जावेद अख्तर चाहते हैं कि उनकी भूमिका उनके बेटे फरहान अख्तर करें और सलीम खान की सलमान खान। सलीम खान इस पर राजी नहीं है। उनका कहना है कि उनकी और सलमान की शख्सियत में जमीन-आसमान का फर्क है। भेड़चाल की फिल्मकारों की प्रवृत्ति शीर्षकों तक में दिखती है। उन्नीस सौ पचास व साठ के दशक में शांताराम ने लंबे शीर्षक वाली फिल्में- ‘डा. कोटनीस की अमर कहानी’, ‘झनक झनक पायल बाजे’ आदि क्या बनाई कि ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे, ‘जब प्यार किसी से होता है’, ‘दिल ने फिर याद किया’, ‘फिर वही दिल लाया हूं’ टाइप शीर्षक सैकड़ों फिल्में में नजर आने लगे। यह सिलसिला आने वाले सालों में ‘राम तेरी गंगा मैली’ तक चला और आज भी कभी कभार इस तरह के शीर्षक पर बनी फिल्में आ जाती हैं जैसे ‘मटरू की बिजली का मंडोला।’ शीर्षक में हिंदी व अंग्रेजी का मेल हुआ तो ‘दाग द फायर’, ‘जब वीमैट’, ‘लव आज कल’ जैसे शीर्षक वाली फिल्में आने लगीं। अंग्रेजी शीर्षक वाली फिल्में पहले भी बनती थीं। अब उनकी बहुतायत हो गई है। एक ही शीर्षक पर तीन चार फिल्में बनने का भी खूब रिवाज रहा है। ‘मिलन’, ‘पुकार’, ‘बाजी’, ‘जाल’, ‘बंधन’, ‘दिल्लगी’ जैसे शीर्षकों पर कई फिल्में बनी हैं। एक शीर्षक को ही जब सफलता का आधार मान लिया जाए तो इससे फिल्म निर्माताओं की मानसिकता को समझा जा सकता है। फिल्मी दुनिया का सच दिखाने के मामले में आमतौर पर निर्माता बंधी बंधाई लीक पर ही चलते रहे। कुछेक अपवाद जरूर रहे।
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