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पटरी पर लौटे पुराने मतभेद

(image) फिल्म उद्योग में मनमुटाव के बीच कभी-कभी बिगड़े हुए रिश्ते पटरी पर भी आ जाते हैं। लेकिन यह भी आ जाते हैं। लेकिन यह भी होता है व्यावसायिक हित साधने के लिए। असल में स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और व्यावसायिकता की बुनियाद पर मुख्य रूप से खड़े फिल्म उद्योग में शाश्वत कुछ भी नहीं होता। सालों तक जो अच्छे ‘दोस्त’ एक दूसरे की शक्ल तक देखना गंवारा नहीं करते उनके रिश्तों में अचानक मिठास आ जाती है। पंद्रह साल बाद सलमान खान और निर्देशक सूरज बड़जात्या का ‘प्रेम रत्न धन पायो’ से फिर साथ आना भले ही सामान्य नजर आए लेकिन दोनों की आज की मजबूरी देखी जाए तो यह स्वाभाविक है। सलमान खान पहली बार ‘बीवी हो तो ऐसी’ की एक छोटी सी भूमिका में आए। उसके बावजूद निर्देशक सूरज बड़जात्या ने अपने करिअर की पहली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ में उन्हें नायक बना दिया। फिल्म बनी और सुपरिहट हुई। सलमान स्टार बन गए। सूरज बड़जात्या की दूसरी फिल्म ‘हम आपके हैं कौन’ को भले ही कुछ समीक्षकों ने रईस परिवार की शादी की वीडियो फिल्म बता कर उसका मजाक उड़ाया हो पर फिल्म ने सफलता के नए कीतिर्मान कायम कर सभी को गलत साबित कर दिया। 1999 में ‘हम साथ साथ हैं’ के बाद सलमान और सूरज साथ-साथ नहीं रहे। सलमान खान स्टार बन चुके थे। रोमांटिक और पारिवारिक छवि से वे मुक्त होना चाहते थे। सूरज को शायद लगा कि वे किसी को लेकर भी हिट फिल्म बना सकते हैं। सलमान के बिना सूरज ने ‘मैं प्रेम की दीवानी हूं’ बनाई। अपने ही बैनर की फिल्म ‘चितचोर’ से प्रेरित होकर बनाई इस फिल्म में सूरज ने पहली बार विदेश में शूटिंग की। लेकिन फिल्म बुरी तरह पिट गई। इसके बाद ‘विवाह’ अपने विषय की वजह से चल गई लेकिन सूरज की पहले वाली चमक नहीं ला पाई। उधर सलमान कॉमेडी व एक्शन फिल्मों में उलझ गए। आज एक्शन हीरो के रूप में वे प्रतिष्ठित हैं। लेकिन 50 साल की उम्र में वे इस इमेज से मुक्ति पाना चाहते हैं। ऐसे में सूरज बड़जात्या का हाथ थामना उन्हें ज्यादा मुफीद लग रहा है। ‘प्रेम रतन धन पायो’ के बाद इस जुगलबंदी के आगे जारी रहने के आसार बन गए हैं। नृत्य निर्देशन में अच्छा खासा नाम कमा चुकीं फराह खान को निर्देशक बनाने के लिए शाहरुख खान ‘मैं हूं ना’ के निर्माता बने। भाई-बहन का यह रिश्ता उस समय दरक गया जब संजय दत्त की पार्टी में शाहरुख खान और निर्देशक शिरीष कुंदर के बीच तमाशा हुआ। तीन दिन तक दोनों पक्ष के लोग एक दूसरे पर आग उलगते रहे। एक कहना था कि शाहरुख को शिरीष पर हाथ नहीं उठाना चाहिए था। शाहरुख गुट का दावा था कि इसके अलावा शिरीष की बदतमीजी रोकने का कोई और रास्ता नहीं था। तीन दिन बाद ‘दोस्ताना’ माहौल में दोनों में सुलह हो गई। ‘जानेमन’ व ‘जोकर’ के निर्देशक शिरीष की पहचान फराह खान के पति के रूप में ज्यादा है। फराह के निर्देशन में बनी ‘मैं हूं ना’ व ‘ओम शांति ओम ’ में शाहरुख खान थे और उनमें पैसा भी शाहरुख ने ही लगाया था। फराह-शाहरुख के बीच भाई बहन का रिश्ता प्रचारित होने के बाद सवाल यह था कि दो सुपरहिट फिल्मों के बाद बहन ने भाई का साथ छोड़ कर अक्षय कुमार को तीसरी फिल्म ‘तीसमार खां’ में क्यों थामा? बताया जाता है कि शिरीष कुंदर अपनी फिल्म में शाहरुख को लेना चाहते थे, इस आग्रह के साथ कि फिल्म भी शाहरुख ही बनाएं। शाहरुख के शिरीष की पटकथा जंची नहीं। दूसरी दिखाई। वह भी पसंद नहीं आई। इसे प्रोफेशनल नजरिए से भी लिया जा सकता था। लेकिन लिया गया भावनात्मक स्तर पर। इससे रिश्तों में गांठ पड़ गई जो एक घटना और बाद में गुटबाजी के रूप में बदल गई। लेकिन व्यावसायिक मजबूरी फराह खान को फिर शाहरुख के सामने ले आई। अक्षय कुमार पिटा हुआ मोहरा साबित हो गए। सलमान खान से नजदीकी बढ़ाने की कोशिश रंग नहीं ला पाई। लिहाजा शाहरुख से दोस्ती करना फराह खान की मजबूरी बन गया। ‘हैप्पी न्यू ईयर’ के बाद उनकी ताजी दोस्ती कब तक चलेगी, यह देखना है। रचनात्मक मतभेद की वजह से किसी निर्देशक और अभिनेता में दूरी हो जाने की बात आसानी से हजम नहीं होती। लेकिन ‘गंगाजल’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ के बाद प्रकाश झा और अजय देवगन से उनका रचनात्मक मतभेद हो ही नहीं सकता था। निर्माता के रूप में अजय रचनात्मकता का कोई प्रमाण नहीं दे पाए हैं। बहरहाल ‘आरक्षण’ व ‘चक्रव्यूह’ में और विकल्प आजमाने के बाद प्रकाश झा ने अगर फिर अजय देवगन की तरफ रुख किया है तो शायद इसकी वजह व्यावसायिक भी हो सकती है या फिर यह भी संभव है कि दोनों के मनमुटाव दूर हो गए हों। प्रकाश झा से अजय का रिश्ता काफी पुराना है। 1999 में निर्माता अजय की फिल्म ‘दिल क्या करें’ का निर्देशन प्रकाश झा ने ही किया था। फिल्म फ्लाप हुई लेकिन 2003 में ‘गंगाजल’, 2005 में ‘अपहरण’ और 2010 में ‘राजनीति’ में उनका साथ जो धमाका कर गया, वह प्रकाश झा की अजय के बिना बनी ‘आरक्षण’ व ‘चक्रव्यूह’ नहीं कर पाई। पिछले छह साल से करीब आधा दर्जन फिल्मों में रोहित शेट्टी के साथ अजय देवगन की अच्ची छन रही है लेकिन एक अभिनेता के रूप में उनका सबसे बेहतरीन इस्तेमाल प्रकाश झा ने ही किया है। अब ‘सत्याग्रह’ के बाद ‘गंगाजल’ के प्रीक्वल व ‘राजनीति’ के सीक्वल से अजय देवगन प्रकाश झा के सहारे नई बुलंदी छू लेने की उम्मीद बांधे हुए हैं। बिगड़े हुए रिश्तों के फिर बनने की ढेरों मिसाले हैं। यह सुनने में सुखद लगता है कि जो रिश्ते कभी किन्हीं कारणों से टूट गए थे उनमें फिर से मिठास लाने की कोशिश हुई। कई बार दोनों पक्षों को लगता है कि उनका साथ एक दूसरे के लिए फायदेमंद हो सकता है। गोविंदा को स्टार बनाने में निर्माता पहलाज निहलानी का सहारा तो रहा लेकिन गोविंदा को लगातार एक से स्तर पर टिकाए रखने में सबसे बड़ा योगदान निर्देशक डेविड धवन का रहा। दोनों का साथ करीब एक दर्जन फिल्मों में रहा। उनकी फिल्मों को फूहड़ बता कर आलोचना खूब हुई लेकिन बाक्स आफिस पर इन सभी फिल्मों की सफलता ने इस आलोचना का कोई मतलब नहीं रह गया। लेकिन सफलता गोविंदा के सिर पर ऐसी चढ़ी कि जिन लोगों ने उन्हें आगे बढ़ाया उन्हीं की वे उपेक्षा करने लगे। करिअर अब जब ढलान पर है वे उन्हीं पुराने सहारों को वे टटोल रहे हैं। खबर है कि डेविड धवन पिछली नाराजगी भुला कर गोविंदा को लेकर जल्दी ही फिल्म शुरू करने जा रहे हैं। इसमें गोविंदा के साथ करिश्मा कपूर भी हो सकती हैं। डेविड धवन के निर्देशन में बनी गोविंदा-करिश्मा की सभी फिल्में हिट हुई थीं। वैसे गोविंदा का हाथ पकड़ने में डेविड धवन की भी मजबूरी है। गोविंदा के बिना उनकी पहले वाली चमक ही नहीं रही है। पारिवारिक रिश्तों में तनाव से जोड़ियां पहले भी टूटती रही हैं और टूट कर फिर जुड़तीं रही हैं। देवआनंद को ग्लैमरस व रोमांटिक छवि देने में और उनकी फिल्म निर्माण संस्था ‘नवकेतन’ को स्थापित करने में उनके बड़े भाई चेतन आनंद का विशेष योगदान रहा। ‘टैक्सी ड्राइवर’ की शूटिंग के बीच से भाग कर जब देव आनंद ने फिल्म की हीरोइन कल्पना कार्तिक से शादी कर ली तो दोनों भाइयों के रिश्तों में खटास आ गई। चेतन आनंद अपने बैनर से फिल्म बनाने लगे। प्रिया राजवंश से बढ़ती उनकी करीबी देव आनंद को रास नहीं आई लिहाजा दोनों के बीच की दूरी बढ़ती चली गई। चेतन आनंद की जगह सबसे छोटे भाई विजय आनंद ने ले ली और उन्होंने देवआनंद के लिए ‘काला बाजार’, ‘नौ दो ग्यारह’, ‘गाइड’, ‘ज्वैल थीफ’ व ‘जॉनी मेरा नाम’ जैसी हिट फिल्मों का निर्देशन किया। आचार्य रजनीश के शिष्य विजय आनंद ने जब अपनी भानजी से शादी कर ली तो दोनों भाइयों से उनके रिश्ते टूट गए जो आखिर तक नहीं जुड़े। लेकिन वक्त बीतने के साथ चेतन आनंद व देव आनंद के संबंधों की खटास कम हो गई। ‘टैक्सी ड्राइवर’ के रीमेक ‘जानेमन’ का निर्देशन चेतन आनंद ने किया। ‘अफसर’ का रीमेक ‘साहब बहादुर’ के नाम से बनाया तो देव आनंद राजी खुशी प्रिया राजवंश के साथ काम करने को तैयार हो गए। भट्ट परिवार में भी यह मिलना-बिछड़ना खूब चला। महेश भट्ट का लंबा चौड़ा परिवार सही ठिकाने लग पाया तो उन्हीं की वजह से। एक भाई मुकेश भट्ट को निर्माता बना दिया, रॉबिन भट्ट फिल्में लिखने लगे तो प्रवीण भट्ट सिनेमेटोग्राफी में लग गए। जब महेश भट्ट का मन निर्देशन से उखड़ गया तो एक और भाई विक्रम भट्ट को उन्होंने यह जिम्मा सौंप दिया। अपने भानजे इमरान हाशमी को महेश भट्ट ने 2003 में ‘फुटपाथ’ से अभिनय के मैदान में उतारा। फिल्म का निर्देशन विक्रम ने ही किया था। अचानक उनके महेश भट्ट से मतभेद हो गए। विक्रम अलग से फिल्म बनाने लगे। उनका और इमरान हाशमी का नाता भी टूट गया। ‘राज-3’ से विक्रम अपने परिवार में लौट आए और ‘फुटपाथ’ के बाद उन्होंने इमरान को दूसरी बार निर्देशित किया।
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