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बी. बी. कुमार पर यह बौद्धिक दुराग्रह

शंकर शरण
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(image) हाल में डॉ. बी. बी. कुमार को भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध परिषद (आई.सी.एस.एस.आर.) का अध्यक्ष बनाया गया। डॉ. कुमार पूर्वोत्तर भारत के मामलों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने दो दशक से भी अधिक समय नागालैंड में कॉलेज अध्यापन किया है। पूर्वोत्तर भारत की चालीस भाषाओं के हिन्दी-अंग्रेजी कोश प्रकाशित किए हैं। इस के अतिरिक्त केवल पूर्वोत्तर के इतिहास, संस्कृति, शिक्षा और राजनीति से संबंधित 12 पुस्तकें लिखीं और संपादित की। साथ ही भारत की जाति परंपरा पर भी उन की उत्कृष्ट पुस्तक है। इन में कई दिल्ली के अच्छे प्रकाशनों से छपी हैं। फिर वे विगत सत्रह वर्ष से तीन अकादमिक त्रै-मासिक पत्रिकाओं ‘डायलॉग’, ‘क्वेस्ट’ एवं ‘चिन्तन-सृजन’ का संपादन भी कर रहे हैं। ऐसे जानकार, अनुभवी और परिश्रमी विद्वान के आई.सी.एस.एस.आर. का अध्यक्ष बनाए जाने पर एक बड़े अंग्रेजी अखबार ने समाचार शीर्षक दिया “ ‘पत्रिकाओं का संपादक’ आई.सी.एस.एस.आर. अध्यक्ष बनाया गया”। शीर्षक में उपहास का पुट था, मानो इस अध्यक्ष की योग्यता इतनी हल्की कि उस के परिचय में अनाम यानी मामूली ‘पत्रिकाओं का संपादक’ के सिवा क्या कहा जा सकता है! जबकि समाचार विवरण में लिखा हुआ था कि डॉ. कुमार कुल 136 पुस्तकों के लेखक-संपादक हैं। फिर समाचार में डॉ. कुमार द्वारा ‘डायलॉग’ में लिखे संपादकीयों से कुछ विचारों को उद्धृत किया गया था, जिस से केवल यह झलकता था कि डॉ. कुमार नरेंद्र मोदी के प्रशंसक और सेक्यूलर-वामपंथी बौद्धिक वर्ग के आलोचक हैं। बस। पाँच दिन बात उस अंग्रेजी अखबार के सहयोगी प्रकाशन हिन्दी दैनिक ने उसी समाचार को हू-ब-हू अनुवादित कर छापा। जब मूल समाचार में दर्ज था कि डॉ. कुमार हिन्दी त्रैमासिक ‘चिन्तन-सृजन’ के भी संपादक हैं, तब भी इस बौद्धिक हिन्दी अखबार को जरूरत न महसूस हुई कि तनिक इस हिन्दी पत्रिका या डॉ. कुमार की किसी हिन्दी पुस्तक को ही उलट-पुलट कर देखा जाए, और तब कोई विशेष राय या मूल्यांकन दिया जाए! यह किस प्रकार की पत्रकारिता है? इस में दुराग्रह के अलावा आलस्य और अज्ञान का भी भरपूर मिश्रण है। देश की बड़ी अकादमिक संस्था का नया अध्यक्ष कौन, कैसा है, के बारे में संयत रूप से कुछ बताने के बदले फौरन हँसी उड़ाने की जिद को और क्या कहें! हिन्दी पाठक डॉ. कुमार की केवल एक पुस्तक ‘राष्ट्रीय समस्याएः चिन्ता एवं चिन्तन’ (2014) से उन की विद्वता, अनुभव और प्रखर स्वतंत्र दृष्टि की पूरी झलक पा सकते हैं। मगर हमारे रेडिकल, राजनीति-ग्रस्त पत्रकारों को इस की कोई परवाह नहीं। वे हिन्दू समाज और संघ-भाजपा की खिल्ली उड़ाने के अलावा पत्रकारिता का कोई उद्देश्य नहीं जानते। अंग्रेजी के दुमछल्ले अखबारों की और दुर्गति है – वे अपने मूल अंग्रेजी अखबार के समक्ष बौद्धिक हीनता से दबे और भी दासोचित नकल करते रहते हैं। सच यह है कि डॉ. कुमार का अकादमिक, सामाजिक जीवन किसी भी लेखक और अध्यापक के लिए अनुकरणीय है। जब भारत पर चीन का आक्रमण हुआ था, तब प्रसिद्ध गाँधीवादी आचार्य बिनोबा भावे बिहार की यात्रा पर थे। तब डॉ. बी. बी. कुमार ने बिनोबा से पूछा थाः “चीन के आक्रमण का सामना करने के लिए आप अपने शान्ति-सैनिकों को सीमा पर क्यों नहीं भेजते?” बिनोबा ने उन के प्रश्न का उत्तर लंबी चुप्पी से दिया था। तब से पचपन वर्ष से भी अधिक बीत गए। डॉ. कुमार में आज भी वही तीक्ष्ण अवलोकन क्षमता और देश व समाज के हित में सच्चे और कठिन प्रश्न उठाने की सामर्थ्य है। ऐसे प्रश्न जो अधिकांश बुद्धिजीवी या तो देखते नहीं, या देखकर भी अनदेखा करते हैं। हमारे अधिकांश लेखक, पत्रकार ऐसी मानसिक जड़ता के शिकार हैं, जिन से कोई दैवी हस्तेक्षेप ही उन्हें निकाल सकता है! कुछ वर्ष पहले राजगृह-नालंदा में हुए एक भव्य सेमिनार-सम्मेलन में दलाई लामा, बिहार के राज्यपाल, मुख्यमंत्री समेत तीन सौ विद्वानों, लेखकों ने भाग लिया था। उस का स्मरण करते डॉ. कुमार ने लिखा कि वहाँ एक प्रतिष्ठित, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान ने कहा कि “राजगृह में, जो बुद्ध की भूमि रही है, हथियार कारखाने की स्थापना नहीं की जानी चाहिए थी।” इस बात को पुनः प्रसिद्ध गाँधीवादी – और उन्हीं बिनोबा भावे की शिष्या – निर्मला देशपाण्डे, तथा वरिष्ठ कांग्रेस नेता अम्बिका सोनी ने भी दुहराया। उस पर डॉ. कुमार की टिप्पणी, ‘मैं छिपाना नहीं चाहता कि मुझे ... निर्मला देशपाण्डे, अम्बिका सोनी तथा उन जैसे लोगों की समझ पर तरस आता है। ऐसे लोग न किसी चीज की जड़ तक जाकर उसे समझना चाहते हैं और न चुप रहना जानते हैं। नालन्दा के खंडहरों पर खड़े होकर तो इस की अनुभूति होनी ही चाहिए थी कि नालन्दा ध्वस्त ही इसीलिए हुआ कि उसे के पीछे शस्त्र की शक्ति नहीं थी, जो बख्तियार खिलजी जैसे आततायी का सामना कर सके। शस्त्र-बल रहता तो चीन का तिब्बत पर कब्जा जमाना संभव न होता।’ अत्यंत कड़े शब्द, और वह भी एक बड़े विद्वान के विचारों पर! किन्तु यह डॉ. कुमार की सत्यनिष्ठा ही दिखाता है। विगत छः दशकों से भारतीय शैक्षिक-वैचारिक जगत के उन के अवलोकन तथा लेखन, संपादन की विशेषता रही है कि उन्होंने असुविधाजनक सचाइयों से आँखें नहीं मोड़ी। न ऐसा करने पर किसी को क्षमा किया। वस्तुतः जो शोध-छात्र और उन के निदेशक सचमुच कुछ काम करना, कराना चाहते हैं, उन के लिए डॉ. कुमार के लेखन और संपादकीय टिप्पणियों में अनेकानेक विचारोत्तेजक, अछूते विषय मिलते हैं जिन पर तथ्यों, आकंड़ों का संग्रह कर बड़े मूल्यवान शोध किए जा सकते हैं। उदाहरणार्थ, नालन्दा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना संबंधित अनेक कमियों, गड़बड़ियों की चर्चा करते हुए डॉ. कुमार ने ऐसे भ्रामक, प्रमादी विचारों पर प्रकाश डाला है जो यहाँ वामपंथी इतिहासकारों ने व्यापक रूप से फैला दिए हैं। डॉ. कुमार के अनुसार, ‘बौद्ध धर्म के लोप का कारक शंकराचार्य को मानने वाले इस का उल्लेख नहीं करते कि नालंदा जैसा सशक्त बौद्ध विद्या केंद्र शंकराचार्य की मृत्यु के शताब्दियों बाद तक कैसे बना रहा? इसी संदर्भ में भाषायी सातत्य का उल्लेख भी होना चाहिए कि चीनी एवं तिब्बती भाषाओं में बौद्ध साहित्य का अनुवाद संस्कृत पुस्तकों से हुआ था, पालि से क्यों नहीं?’ इस भाषायी सातत्य वाले, तथ्य पर कम लोगों ने ध्यान दिया है। बौद्ध ग्रंथों का संस्कृत में होना भी बताता है कि हिन्दू पंडितों ने मनोयोग पूर्वक बुद्ध-चिंतन का अध्ययन, पारायण और उस पर लेखन किया था। ऐसी संस्कृत पुस्तकें हजारों की संख्या में थीं। उन में से चीनी भाषा में तीन हजार और तिब्बती भाषा में पाँच हजार अनुवाद किए गए थे, जो अभी भी काफी संख्या में तिब्बत में उपलब्ध हैं। इस प्रकार, मूल पालि में दिए गए बुद्ध उपदेशों पर हजारों संस्कृत टीकाएं उस महत्वपूर्ण तथ्य का ध्यान दिलाती हैं, जिस से शोध की नई दिशाएं खुलती हैं। उसी तरह, विगत पाँच-छः दशकों से हिन्दी साहित्य और सामाजिक विमर्श की विडंबना दिखाते हुए डॉ. कुमार ने एक अनोखा प्रश्न उठाया है, ‘‘ऐसा क्यों हुआ? आजादी के बाद ‘अर्थ’ एवं अर्थोपार्जन के विरुद्ध बोलने वाला वर्ग वाचाल बना रहा। ‘पूँजी’ एवं ‘पूँजीपति’ गंदे शब्द बन गए थे। तब आज ऐसा क्या हो गया कि पूँजी से जुड़े लोग चोटी पर हैं, तथा विचार एवं लेखन से जुड़े लोग हाशिए पर भी इक्के-दुक्के ही दिखाई देते हैं?’’ ध्यान दें, यह भी एक मौलिक शोध-परक प्रश्न है। न केवल हमारे वाचाल वामपंथियों की तोता-बौद्धकता पर, बल्कि इस परिदृश्य पर भी कि भारत के उद्योग, व्यापार उन्नतिशील हैं जबकि बौद्धिकता में आज भारत की कोई गिनती नहीं है! डॉ. कुमार के ऐसे अनेकानेक अवलोकन विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, पत्रकारों के लिए चुनौतीपूर्ण मुद्दे देते हैं। जरूरत है कि हमारे संपादक और समाज विज्ञान प्रोफेसर बनी-बनायी रेडिकल वामपंथी लकीरें पीटने के बजाए खुले दिमाग से समाज, देश और दुनिया को देखना आरंभ करें। तभी वे कुछ समझ सकेंगे और नए छात्रों, प्राध्यापकों को भी प्रेरित कर सकेंगे कि मौलिक अवलोकन, चिंतन-मनन से बौद्धिक क्षेत्र में भी भारत को विश्व-मंच पर प्रतिष्ठित करने की ओर अग्रसर हों।
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