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‘फिल्मी गीतों में आराधना’

श्रीशचन्द्र मिश्र
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पिछले दिनों फिल्म ‘गुड्डू रंगीला’ के गीत- ‘कल रात माता का मुझे ई-मेल आया था’ पर बेवजह बवाल मचा। इसे धार्मिक आस्थाओं पर हमला बताया गया। लेकिन विरोध करने वालों को सत्संग, जागरण या धार्मिक अनुष्ठानों में कैबरेनुमा फूहड़ फिल्मी गीत की तर्ज पर बने कथित भक्ति गीतों पर कभी एतराज नहीं हुआ। जबकि फिल्मी गीतों के खजाने में ढेरों ऐसे गीत भरे पड़े हैं जिन्हें हर देवी-देवता की आराधना या विभिन्न पर्वों पर पूजा अर्चना में इस्तेमाल करने से भक्ति रस का सहज प्रवाह हो जाता है। 

आराध्यों से जुड़े उत्सवों में फिल्मी गीतों की प्रधानता हमेशा रही है। भगवान कृष्ण की आराधना और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न रूपों पर सबसे ज्यादा रचे गए फिल्मी गीतों का इस्तेमाल जन्माष्टमी और उस मौके पर विशेष रूप से महाराष्ट्र में होने वाले दही हांड़ी उत्सव में खूब होता है। अघोरी भगवान शिव की लीलाओं पर रचे गए गीत शिवरात्रि पर बजते हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आदर्श व सांस्कारिक रूप कई फिल्मी गीतों में उभरा और दशहरे के मौके पर देशभर में होने वाली रामलीलाओं में उन्हें एक परंपरा की तरह अपना लिया गया है। 

नवरात्र व दुर्गापूजा में भगवती की आराधना में उनसे जुड़े फिल्मी गीतों की प्रमुखता होने लगी है। हर आराध्य की पूजा अर्चना के लिए वैदिक मंत्र और आरती उपलब्ध होने के बावजूद फिल्मी गीतों का बढ़ता इस्तेमाल बेवजह नहीं है। वैदिक मंत्र संस्कृत में है और उनका शुद्ध उच्चारण आम व्यक्ति के बस की बात नहीं है। आरती को संगीतमय बनाने की कोशिश तो हुई है लेकिन एक तो उनके पारंपरिक स्वरूप की गुंजाइश नहीं रहती, दूसरे फिल्मी गीतों वाली सीधे मर्म को छू लेने की शाब्दिक बाजीगरी उनमें नहीं होती लिहाजा हर आराध्य से जुड़े उत्सवों में मंत्रोच्चारण व आरती गाने की रस्म निभाने के बाद फिल्मी गीतों पर आश्रित रहने की प्रवृत्ति आम हो गई है। 

भक्ति गीत फिल्म में रखते हुए हालांकि ज्यादा जोर हिंदू भगवानों पर ही दिया जाता है। लेकिन अन्य संप्रदाय के दर्शकों को लुभाने के लिए नात, कव्वाली या सूफी गीत के जरिए खुदा की बंदगी और ईसा मसीह की पनाह में जाने वाले गीतों को फिल्म में रखने से भी परहेज नहीं किया गया है।

भगवान गणेश की फिल्मी वंदना दो बार ‘अग्निपथ’ में हुई। पहली ‘अग्निपथ’ का गीत था- ‘गणपति अपने गांव चले, कैसे हमको चैन मिले।’ 2012 में जब ‘अग्निपथ’ फिर बनी तो गणपति की कई गुना ऊंची मूर्ति के सामने बेहद भव्य अंदाज में गीत फिल्माया गया- ‘देवा श्री गणेश देवा।’ सालों पहले फिल्म ‘टक्कर’ का गीत ‘मूर्ति गणेश की’ और ‘हमसे बढ़ कर कौन’ बेहद लोकप्रिय हुआ। ‘डॉन’ खैर तीन बार बन चुकी है। पहली दो ‘डॉन’ में अलग अलग अंदाज में गणेश जी की स्तुति की गई। 

अमिताभ बच्चन वाली ‘डॉन’ में ‘मोरया मोरया मोरया रे, बप्पा मोरया रे’ और शाहरुख खान वाली ‘डॉन’ में इस्तेमाल हुआ ‘तुझे अपना जलवा दिखाना ही होगा, अगले बरस आना है आना ही होगा’, ‘अतिथि तुम कब जाओगे’ के गीत ‘जय देव जय देव मंगलमूर्ति’ में पारंपरिक आरती का विस्तार किया गया। एनीमेटिड पात्रों के साथ बनाई गई बाल फिल्म ‘माय फ्रेंड गणेश’ में ‘ओ माय फ्रेंड गणेश, तू रहना साथ हमेशा’ गीत में एक अलग ही भाव दिखा।

अपनी श्रृंगारिक छवि वाले और विविध लीलाओं की वजह से भगवान कृष्ण फिल्मी गीतों में ज्यादा छाए रहे हैं। ‘मुगल-ए-आजम’ का गीत ‘मोहे पनघट पे नंदलाल छेड़ गयो रे’ हो या ‘लगान’ का ‘मधुबन में जो कन्हैया किसी गोपी से मिले’, ‘किसना’ का ‘जो है अलबेला मदनैनो वाला’ ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ का ‘भोर भए पनघट पे मोहे नटखट श्याम सताए’ अथवा ‘लम्हे’ का ‘मोहे छेड़ो न नंद के लाला’ में जहां प्यार मनुहार उभरा वहीं त्याग और भक्ति की भावना को गुलजार की फिल्म ‘मीरा’ ने विस्तार दिया। ‘मेरे तो गिरिधर गोपाल’ समेत मीरा के कई लोकप्रिय भजनों का फिल्म में इस्तेमाल हुआ। ‘अमर प्रेम’ के गीत ‘बड़ा नटखट है ये किशन कन्हैया’ और ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के गीत ‘यशोमती मैया से बोले नंदलाला, राधा क्यों गोरी मैं क्या काला’ में उलाहना था। ‘श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम, लोग करें मीरा को यूं ही बदनाम’ (गीत गाता चल), ‘एक मीरा एक राधा दोनों ने श्याम को चाहा’ (राम तेरी गंगा मैली), ‘बड़ी देर भई नंदलाला, तेरी राह तके ब्रज वाला’ (खानदान), ‘आज राधा को श्याम याद आ गया’ (चांद का टुकड़ा), ‘मैया यशोदा ये तेरा कन्हैया’ (हम साथ साथ हैं), ‘ले मटकी आजा राधा भी’ (दो दिल), ‘यमुना के तट पर जब नटखट बंसी वाले की बंसी बाजेगी, राधा नाचेगी’ (सौदागर), ‘मोहे छेड़ो न कान्हा बजरिया में’ (आज और कल), ‘होली खेले रघुवीरा, ब्रज में होली खेलें रघुवीरा’ (बागवान), ‘नंद के लाला रे आला’ (रंगरेज) और ‘बांसुरिया काहे बजाए’ (आक्रोश) जैसे गीतों में कृष्ण भक्ति  के अलग-अलग रूप नियरे। 

जन्माष्टमी के मौके पर खास कर महाराष्ट्र में मनाए जाने वाले दही हांड़ी उत्सव के दृश्य फिल्मों में रखने का चलन भी खूब रहा है। 

उसके लिए रचे गए गीतों को उत्सव के दौरान पूरी मस्ती से गाया भी जाता है। ‘गोविंदा आला रे’ (ब्लफ मास्टर), ‘तीन बत्ती वाला गोविंदा आला’ (मुकाबला), ‘शोर मच गया शोर देखो आया माखन चोर’ (वास्तव), ‘मच गया शोर सारी नगरी में’ (खुद्दार) जैसे गीत तो कुछ मिसाल भर हैं। भक्ति पर इन दिनों आधुनिकता का भी असर पड़ने लगा है। ‘राधा आन द डांस फ्लौर’ (स्टूडेंट्स आफ द इयर) और ‘गो गो गोविंदा’ (ओएमजी- ओ माय गॉड) जैसे गीतों में जब भगवान कृष्ण को नहीं बख्शा गया तो गणेश जी कैसे बच पाते। लिहाजा फिल्म ‘एबीसीडी’ में उनकी आराधना का नया अंदाज दिखा गीत- ‘साड्डा दिल भी तू, साड्डी जान भी तू ग ग ग गणपति’ में दिखा।

उन्नीस सौ साठ के दशक में संतोषी माता की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। उसी दौरान एक फिल्म भी बनी ‘जय संतोषी मां।’ इसमें प्रदीप के लिखे लगभग सभी गीत ‘मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की’, ‘यहां वहां जहां तहां जब देखो वहां वहां, हैं संतोषी मां’ आरती की तरह इस्तेमाल हुए। ‘एक चादर मैली सी’ में एक गीत ‘तूने मुझे बुलाया शेरावालिए’ से जो लोकप्रियता की शुरुआत हुई तो सिलसिला ‘चलो बुलावा आया है’ (अवतार) व ‘है नाम रे सबसे बड़ा तेरा नाम, ओ शेरों वाली’ (सुहाग) तक दर्जनों फिल्मों में चला। मनमोहन देसाई ने ‘अमर अकबर एंथनी’ में शिरडी के साईं बाबा की महिमा बखान करने वाला एक गीत ‘शिरडी वाले साईं बाबा, आया है तेरे दर पे सवाली’ रखा और गीत की समाप्ति पर अंधी मां की आंखों की रोशनी लौट आने के चमत्कार से खासी लोकप्रियता भी बटोरी।

करीब साठ साल पहले फिल्म ‘मुनीम जी’ का एक गीत काफी पसंद किया गया था। यह गीत ‘शिवजी ब्याहने चले पालकी सजइके’ शिव के औघड़ रूप पर था। बाद में राज कपूर की फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में शिव को सत्य व सुंदरता का प्रतिरूप बता कर उनकी महिमा में एक अलग गीत सुनाई दिया। शिव आराधना पर बीच बीच में कुछ और फिल्मी गीत भी आए लेकिन उनमें पारंपरिक आरती का ही ज्यादा समावेश किया गया। भगवान राम पर गीत कम ही लिखे गए। 

विजय भट्ट ने दो बार बनाई ‘रामराज्य’ में जिन गीतों का इस्तेमाल किया, उन्हीं की प्रधानता ज्यादा रही। फिल्म ‘गोपी’ के एक गीत- ‘रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा’ में भगवान राम की स्तुति कम, बदलती सामाजिक व्यवस्था की अभिव्यक्ति ज्यादा थी।

पहली सवाक फिल्म ‘आलम आरा’ के गीत ‘दे दे खुदा के नाम पे’ से खुदा व सूफी संतों की इबादत का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है। ‘जोधा अकबर’ में ‘ख्वाजा मेरे ख्वाजा दिल में समा जा’ और ‘दिल्ली-6’ में ‘दरारे दरारे बंदे पे मौला मरम्मत मुकद्दर की कर दे मौला’ जैसा गीतों ने अलग समां बांधा। ‘बजरंगी भाई जान’ का मुख्य आकर्षण अदनान सामी की कव्वाली थी। 2012 में आई ‘सन आफ सरदार’ समेत कुछ फिल्मों में गुरवाणी या शबद कीर्तन का इस्तेमाल हुआ।

धर्म निरपेक्षता और सांप्रदायिकता के नाम पर देश में राजनीति होने का भले ही पुराना रिवाज रहा हो, कुछ जागरूक फिल्मकारों ने धर्म निरपेक्षता और पंथ निरपेक्षता को उसके सही संदर्भ में मानवता से जोड़ा अनेकता में एकता की सांस्कृतिक पहचान को उन्होंने गीतों का हिस्सा बनाया। किसी भगवान या खुदा की आराधना करने की बजाए प्रकृति को संचालित करने वाली निराकार सर्वोच्च शक्ति के आगे नतमस्तक होने और प्रेम, सहिष्णुता व त्याग जैसे गुण अपना कर सही मायने में मनुष्य बनने की सीख देने वाले गीतों ने अपनी अलग जगह बनाई है। ‘ये मस्जिद है वो बुतखाना, चाहे ये मानों चाहे वो मानों’ जैसे गीत ने एक मिसाल कायम की और इस धारा को आगे बढ़ाते हुए भरत व्यास, शैलेंद्र, शकील बदायुंनी, हसरत जयपुरी, साहिर लुधियानवी, योगेश आदि गीतकारों ने मानवता को समर्पित अनेक अनमोल गीत लिखे।

भारतीय सिनेमा में मील का पत्थर मानी जाने वाली फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ में एक प्रार्थना थी- ‘ए मालिक तेरे बंदे हम ऐसे ही हमारे करम, नेकी पर चले और वदी से डरें ताकि हंसते हुए निकले दम।’ यह प्रार्थना इतनी लोकप्रिय हुई कि कई स्कूलों में इसे सुबह की प्रार्थना तक बना दिया गया। उस दौर में बनी कई फिल्मों में धर्म का भेद मिटा कर ऐसे आराधना गीतों की रचना हुई जिन्होंने मानवीय संवेदनाओं को झझकोरा और लोगों को नई राह दिखाई। ‘वैजू बावरा’ के एक गीत ‘मन तड़पत हरि दर्शन को आज’ ने भक्ति रस की एक नई धारा बहाई। 

इसी गीत को विस्तार दिया ‘संत ज्ञानेश्वर’ के गीत- ‘जोत से जोत जलाते चले प्रेम की गंगा बहाते चलो’ ने धर्म और आस्था को संकुचित न कर उसे विस्तार देने की पहल की इस गीत ने। ईश्वरीय सत्ता को उलाहना देने या उससे कुछ मांगने की बजाए उसके प्रति खुद को समर्पित कर देने की भावना का विकास भी कुछ गीतों में दिखा। मसलन ‘तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो, तुम्ही हो बंधु सखा तुम्ही हो’ जैसे गीत ने सर्व शक्तिमान की एक अलग पहचान दी।

सर्व शक्तिमान के हाथों सब कुछ छोड़ कर उससे अपनी कमजोरियों से मुक्ति पाने की ताकत मांगने वाले गीत काफी समय तक फिल्मों का हिस्सा रहे। फिल्म ‘सीमा’ का एक गीत- ‘तू प्यार का सागर है तेरी एक बूंद के प्यासे हम, लौटा जो दिया तूने’ इसी कड़ी का हिस्सा था। अपनी खामियों को बता कर यह संकोच कि जिस शक्ति ने बनाया उसका सामना कैसे दिखाएं, यह भावना व्यक्त हुई ‘दिल ही तो है’ के एक गीत ‘लागा चुनरी में दाग, छुपाऊं कैसे घर जाऊं कैसे।’ 

खुद को कमजोर मान कर आत्मा की शक्ति बढ़ाने की चाह दो प्रार्थना गीतों में उभरी। बेरोजगारी की वजह से दिशा भट गए युवकों को सही राह पर लाने के लिए निर्देशक एन चंद्रा ने अपनी पहली फिल्म ‘अंकुश’ में एक प्रार्थना गीत रखा- ‘इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।’ लगभग इसी तरह का एक प्रार्थना गीत ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म ‘गुड्डी’ में भी था- ‘हम को मन की शक्ति देना मन विजय करे, दूसरों की जय से पहले खुद को जय करे।’ ‘ए मालिक तेरे बंदे हम’ की तरह यह गीत भी कई स्कूलों का प्रार्थना गीत बना। फिल्म ‘पुकार’ का गीत ‘एक तू ही भरोसा एक तू ही सहारा’ या ‘पनाह’ का गीत ‘अपनी पनाह में हमें रखना’ अथवा ‘द बर्निंग ट्रेन’ का ‘तेरी है जमीं तेरा आसमान तू बड़ा मेहरबान तू बख्शीश कर’ जैसे गीत इन दिनों फिल्मों में सुनने को नहीं मिलते। ‘हरे राम हरे कृष्ण’ के शीर्षक गीत की फिल्म ‘दम मारो दम’ में जो दुर्गति हुई और फिर कृश-3 में जिस तरह ‘रघुपति राघव राजा राम’ को विरूपित किया गया है उससे तो यही लगता है कि आज के फिल्मकारों को मानवीय आस्था विकसित करने में कोई रूचि नहीं रह गई है। धर्म विशेष के आराध्यों पर गीत रखना उनकी व्यावसायिक मजबूरी है। ‘तू न हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा, इंसान की औलाद है इंसान बनेगा’ जैसे गीतों की शायद आज की फिल्मों में कोई जगह नहीं बची है।

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