समय की बलिहारी

शुरुआती दौर में पौराणिक व ऐतिहासिक आख्यानों और अलिफ लैला की कहानियों से बाहर निकल कर फिल्मों ने अपनी सामाजिक कुरीतियों पर चोट करने वाली और सद्भाव का संदेश देने वाली फिल्मों में प्रेम का एक सात्विक रूप उभरा। उस दौर की फिल्मों में गीतों  के माध्यम से प्रेम का संकेत किया जाता था। नायक-नायिका दूर-दूर रह कर आंखों-आंखों में प्रेम करते थे लेकिन कह नहीं पाते थे। दिलीप कुमार के उदय ने प्रेम का दुखांत रूप उभारा। देव आनंद ने उसे रूमानी छवि दी तो राज कपूर ने उसे आम आदमी की भावनाओं से जोड़ा। महबूब खान ने ‘अंदाज’ में दिलीप कुमार, राज कपूर व नरगिस को लेकर त्रिकोणीय प्रेम का नया फार्मूला अपनाया। हिट रहा तो उसी तरह की कई फिल्में बन गई। 

ऐसी फिल्मों में नायिका को संशय की स्थिति में उलझाए रखना निर्माताओं को ज्यादा भाया। उसकी राय व इच्छा को महत्व नहीं दिया गया। तत्कालीन सामाजिक स्थितियों में औरत की शायद यही स्थिति थी। दिलीप कुमार दुखांत प्रेम के ऐसे पर्याय बन गए कि आजादी की चौखट पर खड़े देश में जब उल्लास छाना चाहिए था, फिल्मों में एक गमगीन माहौल बन गया। ‘मेला’, ‘अमर’,   ‘बेवफा’, ‘संगदिल’, ‘नदिया के पार’, ‘जोगन’ आदि फिल्मों में दिलीप कुमार ने प्रेम के विछोह और तड़प को ऐसी शिद्दत से उभारा है कि प्रेम सचमुच आग का ऐसा दरिया लगने लगा जिसमें डूब कर जाने के सिवाय और कोई चारा नहीं बचता। 

राज कपूर की ‘बरसात’ ने प्रेम की तड़प को उभारा। लेकिन उसके बाद लय बदल कर ‘आवारा’ में उन्होंने आवेगित प्रेम का नया रूप दिखाया। एक हाथ में वायलिन लिए राज कपूर और दूसरे हाथ में झूलती नरगिस उन्मुक्त प्रेम का प्रतीक बन गईं। दूर-दूर से प्रेम का इजहार करते रहने वाले नायक-नायिका को बेहद ग्लैमरपूर्ण अंदाज में आलिंगनबद्ध करने का सिलसिला प्रमुख रूप से इसी फिल्म से शुरू हुआ। शुरुआती करिअर में आंसू बहाते नायक की भूमिका करने वाले देव आनंद ने जल्दी ही अपना अंदाज बदला। प्रेम की पीड़ा का पर्याय मानने की परंपरा को तोड़ कर उन्होंने उसे मस्ती का रूप दिया। उनकी फिल्मों की नायिकाएं दुख, विरक्ति और उपेक्षा से बाहर निकल कर हंसती खेलती दिखाई दीं। 

मधुबाला व नूतन ने अपने करिअर की ज्यादातर बिंदास फिल्में देव आनंद के साथ ही कीं। विमल राय ने   फिल्मी प्रेम की धारा में कई प्रयोग किए। ‘सुजाता’ की नायिका अपनी जाति की वजह से नायक के प्रणय निवेदन को स्वीकार करने में जरूर हिचकिचाती रही लेकिन ‘बंदिनी’ की अनपढ़ नायिका ने बेहतर भविष्य का विकल्प ठुकरा कर अनिश्चिय और मुश्किलों में उलझे अपने पहले संबंध को स्वीकार करने का साहस दिखाया। ‘देवदास’ में विमल राय ने प्रेम का गजब का विस्तार किया। शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर पहले भी हिंदी व बंगाली में चार फिल्में बन चुकी थी लेकिन विमल राय की फिल्म में देवदास, पारो व चंद्रमुखी का द्वंद्व बेहद स्वाभाविकता से उभरा। 

फिल्मी प्रेम एक लंबे समय तक गंभीरता का लबादा ओढ़े रहा। नायक-नायिका का प्रेम का इजहार करने में ज्यादा कवायद नहीं करनी पड़ी, उसे परवान चढ़ाने में जरूर जूझना पड़ा। ‘रांझना’ को लेकर भले ही आरोप लगा कि उसमें नायक ने नायिका के पीछे हाथ धोकर पड़ कर घटिया मानसिकता का सबूत दिया लेकिन आधी सदी पहले ही फिल्मों में इस तरह का चलन शुरू हो गया था। नायक-नायिका संयोग से टकराए। उनमें नोक झोंक हुई। नायक ने नायिका का पीछा करना जारी रखा। 

कुछ रोमांटिक गीत गए और नायिका भी प्रेम करने लगी। नायक-नायिका के रूठने मनाने का संगीतमय सिलसिला फिल्म की सफलता का सबसे बड़ा आधार भी रहा है। यह बड़ा फर्क जरूर रहा कि मर्यादा और शालीनता की सीमा को इन फिल्मों में ज्यादा नहीं लांघा गया। इन फिल्मों में जात-पांत, गरीबी-अमीरी आदि की सामाजिक बाधाओं के अलावा नायक या नायिका का अतीत प्रेम को पटरी से उतारने में लगता रहा। यह अलग बात है कि कुछेक फिल्मों को छोड़ कर इस संरचना पर बनी सैकड़ों फिल्मों में जीत प्रेम की ही हुई। दक्षिण में बनी ‘चोरी-चोरी’ की नायिका ने प्रेम की खातिर घर से भागने का साहस क्या दिखा दिया कि कई फिल्मों में यह नुस्खा आजमाया गया। ‘साधना’ और ‘नर्तकी’ में वेश्या नायिका का प्रेम सामाजिक प्रताड़ना का निशाना बना। 

इसे एक क्रांतिकारी कदम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता था लेकिन फिल्म की सफलता कहीं इससे प्रभावित न हो जाए, इसलिए निर्माताओं ने यह जोखिम नहीं उठाया। बेहद बोल्ड तरीके से फिल्माई गई ‘चेतना’ में भी इस तरह के प्रेम को सामाजिक स्वीकृति दिलाने की कोशिश नहीं हो पाई। उन्नीस सौ साठ-सत्तर के दशक में गीत प्रधान प्रेम कथाओं पर ज्यादा फिल्में बनी, कुछ में तो तत्कालीन समाज का चित्रण था तो कुछ की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक थी। कुछ में धार्मिक तनाव उभरा तो कुछ फिल्मों का प्रेम वर्ग संघर्ष में तपा। ‘ताज महल’, ‘मेरे महबूब’ व ‘संघर्ष’ ऐसी ही कुछ फिल्में थीं।  अलग-अलग धर्मों के नायक-नायिका की प्रेम गाथा फिल्माने से हमेशा परहेज किया गया। 

‘कुली’ के मुस्लिम नायक के प्रेम करने के लिए ईसाई लड़की इसीलिए रखी गई। अमीरी-गरीबी का भेद तो फिल्मी प्रेम में हमेशा दीवार खड़ी करता रहा है। कुछ फिल्मों में शारीरिक विक्लांगता बाधा बनी। ‘आरजू’ में एक पैर कट जाने और ‘दो बदन’ में नायक के अंधे हो जाने से प्रेम में खलल पड़ता है। कुछ फिल्मों में नायिका खुद को गरीब बता कर नायक से प्रेम करती है। असलियत सामने आ जाने के बाद दूरी बढ़ जाती है लेकिन वह हिंदी फिल्म ही क्या जो खुशनुमा ‘द एंड’ न कर पाए। राज कपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ की नाकामी से पार पाने के लिए ‘बॉबी’ में कैशोर्य प्रेम की ऐसी उन्मादी धारा बहाई कि पारिवारिक बंदिशों, दुश्मनी व भेदभाव को अंगूठा दिखा कर प्रेम करने की नई लहर चल पड़ी। यह अलग बात है कि इस तरह की करीब एक दर्जन फिल्मों में से किसी को भी ‘बॉबी’ जितनी सफलता नहीं मिल सकी। कमल हासन की पहली हिंदी फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ में प्रांतीय व भाषाई दीवार बनी। उत्तर भारतीय नायिका व दक्षिण भारतीय नायक की यह प्रेम कथा हिट होने के बावजूद दोहराई नहीं गई, यह ताज्जुब की बात है।

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