फिल्मों में प्रेम के बदलते मायने

श्रीशचन्द्र मिश्र
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यह संयोग नहीं है कि पिछले कुछ समय में रिलीज हुई कई फिल्मों में प्रेम और रिश्तों की एक नई व्याख्या दिखाई गई है। यह समाज में बदल रही मानसिकता का असर है जिसका अक्स फिल्मों में दिख रहा है। भले ही फिल्मों पर आक्षेप लगे कि वे समाज को प्रभावित करती हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि समाज में आ रहे बदलाव से फिल्में भी अछूती नहीं रह पातीं। उदाहरण है ‘सलाम नमस्ते’, ‘तमाशा’, ‘बार-बार देखो’, ‘ओक के जानू’ व ‘बेफिक्रे’ जैसी फिल्में जो रिश्तों की पारंपरिक मान्यताओं को तोड़ कर स्वच्छंद और वर्जना रहित रिश्तों की वकालत करती हैं। 

सहजीवन आज समाज में एक फैशन बन गया है। उपरोक्त फिल्में इसी फैशन को बढ़ावा दे रही है, यह मान कर कि युवा दर्शकों को बंधन रहित प्रेम का अंदाज लुभाएगा। यह अलग बात है कि इस तरह की ज्यादातर क्रांतिकारी फिल्में बाक्स ऑफिस पर नाकाम साबित हुई हैं। सराही वही फिल्में जा रही हैं जिनमें प्रेम की गहराई और उससे जुड़ी आस्था का चित्रण हुआ। 

असल में समय के साथ चलने के जुनून में कुछ फिल्में सोच और प्रस्तुतिकरण के मामले में सब कुछ बदल डालने की कवायद में जुट जाती हैं और यह बदलाव लोगों को हजम नहीं होता। वही बदलाव लुभा पाता है जो तार्किक हो और भावनात्मक हो। फिल्मों में प्रेम का अंदाज बदलने की कोशिश पहली बार नहीं हुई है। इतिहास की तरफ नजर दौड़ाएं तो चालीस पचास के दशक की फिल्मों के प्रेम और आज के फिल्मी प्रेम में जमीन आसमान का फर्क आ गया है। यह फर्क स्वाभाविक तरीके से आया और उसमें परंपराओं की जड़ों को पूरी तरह काटा नहीं गया तो यह बदलाव पसंद किया गया। 

समय और स्थितियों का असर प्रेम को अभिव्यक्त करने के तरीकों पर पड़ा है। हीरोइनों का नजरिया भी बदला है। निजी और फिल्मी जीवन में अपनी निजी पसंद को पिछले दिनों खुलेआम स्वीकार कर दीपिका पादुकोण ने इस बहस को फिर गरमा दिया कि प्रेम की अभिव्यक्ति के नाम पर हीरोइनों को एक वस्तु की तरह चित्रित करने की सीमा क्या होनी चाहिए? विमर्श का मुद्दा यह है कि क्यों फिल्में प्रेम जैसे कोमल अनुभूति वाले भाव को फूहड़ता और अश्लीलता में लपेट रही है? प्रेम जताने के अंदाज क्यों विकृत हो रहे हैं? प्रेम को एक अधिकार की तरह हासिल करने के तौर-तरीके सीमा क्यों लांघ रहे हैं?

दो साल पहले दो फिल्में इसी मुद्दे पर विवादास्पद भी हुईं। ‘रांझना’ को लेकर तो अच्छी खासी बौद्धिक बहस शुरू हुई। शोभा डे, शबाना आजमी सरीखी कई हस्तियों ने लड़कियों से छेड़छाड़ के तरीके को गौरवान्वित करने पर सख्त एतराज उठाया और इस तरह का गलत संदेश देने वाली फिल्म को पास करने के लिए सेंसर बोर्ड को भी कटघरे में खड़ा कर दिया। दूसरा विवाद एक तमिल फिल्म के प्रोमो पर हुआ जिसमें समुद्र तट पर नायिका को नायक के पैर पकड़ कर घिसटते हुए दिखाया गया था। 

दिलचस्प बात यह है कि नायक को नायिका से प्रेम था और नायिका की स्वीकृति पाने के लिए उसने यह अंदाज अपनाया था। हालांकि दक्षिण भारतीय फिल्मों में इस तरह के दृश्य पहली बार नहीं आए। तमिल और तेलुगू की जितनी फिल्में आ रही हैं उनमें हिंसा का प्रचुरता के बाद अभिनेत्री को एक वस्तु मान कर श्लील-अश्लील तरीके से उनसे प्रेम व्यक्त किया जा रहा है। हिंदी फिल्में भी अब यही फार्मूला अपना रही है। यह स्थिति पिछले कुछ दशकों में ज्यादा पनपी है और शालीनता की सीमा लांघ कर विकसित हुई है। हिंदी फिल्मों की बात करें या भारतीय फिल्मों की, सिर्फ उन्हीं में नहीं दुनिया भर की फिल्मों का प्रेम शाश्वत हिस्सा रहा है। यह समय के साथ साथ बदलता रहा है। 

कभी परदे की ओट से या पेड़ की टहनी सहलाते हुए नायिका अपने प्रेम का इजहार करती थी। प्रेम सामाजिक बंदिशों और रीति रिवाज में भी उलझा। एक दौर में प्रेम का दुखांत काफी पसंद किया गया। फिर नायिका विद्रोही हुई तो नायक बेवफा साबित हुआ। कैशोर्य प्रेम का बगावती अंदाज कुछ फिल्मों में दिखा। समय बदलने के साथ-साथ नायक-नायिका की चारीत्रिक खूबियां भी बदली। 

छत्तीस गुणों से संपन्न नायक की चमचमाती उजली छवि दागदार हुई तो साड़ी का पल्लू मुंह में ठूंस कर हर दुख दर्द चुपचाप सहने वाली। नायिका ने अपने व्यक्तित्व को विकसित करना शुरू कर दिया। रिश्तों को चुनने की अपनी प्राथमिकता उसने तय की। पिछले कुछ सालों से फिल्में पारंपरिक तौर तरीके बदलने लगी हैं। प्रेम भी इससे अछूता नहीं रहा है। आज की युवा पीढ़ी की प्रेम को लेकर मान्यताएं और प्रेम को महसूस करने के उनके तरीके फिल्मों में खूब अभिव्यक्त हुए हैं।

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