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रंगमंच से मिला मजबूत आधार

ऐसे ढेरों कलाकार हुए हैं जिन्होंने रंगमंच से शुरुआत कर फिल्मों में धाक जमाई। किसान परिवार में नौवीं संतान के रूप में जन्मे अक्किनेनी नागेश्वर राव को पूरा बचपन लड़की बन कर गुजारना पड़ा। वजह यह थी कि उनसे पहले के आठ बच्चों में से चार की मौत हो जाने के बाद पंडितों ने उनके मरने की भी भविष्यवाणी कर दी थी। तोड़ यह निकाला गया कि उन्हें लड़की की तरह पाला जाए। अभिनय का शौक नागेश्वर राव को घुमक्कड़ नाटक मंडली तक ले गया। पांच रुपए प्रति शो के वेतन पर उन्होंने ‘राजा हरिश्चंद्र’, ‘तुलसी’, ‘जरासंध’, ‘विप्रनारायण’ आदि नाटकों में नारी भूमिकाएं की। 

उनकी ख्याति इतनी हो गई थी कि उन्हें नाटकों की ग्लैमर क्वीन कहा जाने लगा था। बाद में नागेश्वर राव की तेलुगू फिल्मों में आदर्श अभिनेता की इमेज बनी। कर्नाटक के महान अभिनेता राज कुमार निरक्षर थे। पिता जल्लाद। खुद रंगमंच पर काम करते थे सो जिद ठान ली कि राज कुमार भी नाटकों में काम करे। दब्बू और हकला कर बोलने वाले राज कुमार को नाटकों से ऐसा आत्मविश्वास दिया कि फिल्मों में किसी तरह की भूमिका निभाने में उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई। तमिल फिल्मों के महानायक शिवाजी गणेशन नाटक कंपनी में काम करने के लिए छह साल की उम्र में ही घर से भाग गए थे। एमआर राधा की नाट्य संस्था ‘सरस्वती गणसभा’ के कई नाटकों में काम किया। 

बाद में सीएन अन्नादुरै के लिखे कई नाटकों में उन्होंने अभिनय के गुर सीखे। मद्रास क्रिश्चियन कालेज में लेक्चरार की नौकरी करते हुए जेमिनी गणेशन ने शेक्सपियर के नाटकों में अभिनय कर समझ लिया कि उनका असली करिअर तो फिल्मों में है। श्रीलंका के कैंडी शहर में जन्मे एमजी रामचंद्रन ने सात साल की उम्र में पांच रुपए महीने के वेतन पर नाटक कंपनी में काम करना शुरू किया। पंद्रह नाटकों में उन्होंने अभिनय किया और वहीं से फिल्मों की राह खुली।

गुजराती रंगमंच पर ख्याति पाने के बाद हरिभाई जरीवाला संजीव कुमार के नाम से हिंदी फिल्मोंम सहज अभिनय के पर्याय बने। ज्यॉफ्री केंडल के घूमंतू थिएटर ‘शेक्सपियराना’ से प्रेरणा पाकर नसीरुद्दीन शाह ने अलीगढ़ में पढ़ाई करते हुए कई नाटकों में अभिनय किया। जबलपुर में जन्मे रघुबीर यादव बोर्ड की परीक्षा में बैठने की बजाए घर से भाग कर घुमक्कड़ कंपनी भोपाल थिएटर का हिस्सा बने गए और मध्यप्रदेश के कई शहरों में घूम कर नाटक किए। उसी अनुभव ने उन्हें 1986 में ‘मैसी साहब’ के जरिए अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। अमोल पालेकर ने फिल्मी व्ययस्तता के बीच भी रंगमंच पर अपनी सक्रियता लगातार बनाए रखी। यही फारुख शेख ने भी किया। 

रंगमंच से घर का खर्च न चल पाने की विवशता की वजह से उन्होंने फिल्मों का रुख किया लेकिन आखिरी समय तक रंगमंच को ही अपनी गतिविधियों का मुख्य केंद्र बनाए रखा। मनमोहन कृष्ण ने ‘इप्टा’ के नाटकों ‘आखिरी शाम’ व ‘लाल गुलाब’ की वापसी से अपनी पहचान बनाई। ओम शिवपुरी, नितिन सेठी, मनोहर सिंह, अच्युत पोद्दार, टॉम आल्टर, अनुपम खेर जैसे दर्जनों चरित्र अभिनेता हैं जिन्होंने रंगमंच से मजबूत शुरुआत कर फिल्मों में भी अपनी छाप छोड़ी। महिला कलाकारों में दीना पाठक, उत्तरा बावकर, सुप्रिया पाठक, भक्ति वर्वे, रोहिणी हटटनगडी, सुषमा सेठ आदि भी इसी राह पर चल कर खासी सफल हुई हैं।

कलाकारों की दुविधा हमेशा यही रहती है कि रंगमंच से गहरे लगाव के बावजूद वे उसके लिए पूरी तरह समर्पित नहीं रह पाते। आर्थिक मजबूरी उन्हें फिल्मों की तरफ धकेल देती है। लेकिन कुछ कलाकार ने इस स्थिति के आगे हार नहीं मानी। उत्पल दत्त ने अपना अभिनय क्षेत्र हमेशा व्यापक बनाए रखा। फिल्मों से कमाए गए पैसों को वे नाटकों का मंचन करने में खर्च करते रहे।

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