उन्मुक्त होता प्रेम

यह सही है कि पिछले कुछ सालों में प्रेम की फिल्मी अभिव्यक्ति ने शालीनता की सीमा लांघ दी है। लेकिन यह सब अचानक नहीं हुआ। अतीत से इसका सिलसिला लगातार जुड़ता रहा। यह अपने आप में दिलचस्प बात है कि चुंबन के जरिए प्रेम जताने के हॉलीवुड की फिल्मों के जिस तरीके को अपनाने से फिल्मकार एक अरसे तक परहेज करते रहे, वह मूक फिल्मों के दौर में धड़ल्ले से इस्तेमाल हुआ। ‘इंद्र सभा’ के तो हर दूसरे-तीसरे दृश्य में चुंबन था। इसे सामाजिक मान्यता दिलाने का काम किया देविका रानी ने 1924 में ‘कर्म’ में अपने पति नायक हिमांशु राय को प्रगाढ़ चुंबन देकर उन्होंने खासा तहलका मचाया। 

आजादी के बाद भारतीय सेंसर बोर्ड बना और उसने कई कड़े नियम बना कर फिल्म निर्माताओं के हाथ बांध दिए। समस्या यह थी कि बदलते समय ने फिल्मों का ढांचा ही बदल दिया था। घर में रहने वाली नायिका बाहर निकल आई थीं। पारंपरिक दबी ढकी पोशाक छोड़ कर उसने आधुनिक कपड़े पहनना शुरू कर दिया था। नायक भी अपनी गंभीरता त्याग कर उछल कूद मचाने लगा था। उनके प्रेम की प्रगाढ़ता को दिखाने का कोई माध्यम नहीं था। नायक-नायिका के गले मिलते ही दो फूलों को सटा कर या कबूतरों की चोंच लड़वा कर उसे चुंबन का संकेत बताने की कोशिश अरसे तक की जाती रही। 

खोसला कमेटी ने 1969 में सिफारिश की कि मर्यादित रूप से चुंबन के दृश्य दिखाने की इजाजत दे दी जानी चाहिए। बहरहाल सेंसर बोर्ड की बाधा हटने के बाद भी फिल्मों में चुंबन दृश्य इसलिए नहीं दिखे क्योंकि तब के लगभग सभी   चोटी के कलाकारों ने परदे पर चुंबन देने से साफ मना कर दिया। राज कपूर ने ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में इसके लिए अपने भाई शशि कपूर व जीनत अमान को बड़ी मुश्किल से राजी किया। उसके बाद भी चुंबन के दृश्य फिल्मों में कम ही दिखे। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उस समय के चोटी के लगभग सभी सितारों ने न सिर्फ चुंबन करने से बल्कि अंतरंग दृश्य करने में भी रूचि नहीं दिखाई। चुंबन को प्रेम जताने का सहज जरिया लेकिन फिल्म वालों ने बने नहीं रहने दिया।

दिलचस्प बात यह है कि हालीवुड की फिल्मों में जहां इस तरह के दृश्य सीमित हो गए वहीं पिछले दस साल में हिंदी फिल्मों में उनकी बाढ़ आ गई है। यही वजह है कि पिछले दिनों हुए एक विश्वव्यापी सर्वे में हिंदी फिल्मों को महिलाओं को सेक्स के प्रतीक के रूप में दिखाने में सबसे आगे पाया गया। नए चलन का श्रेय मल्लिका शेरावत को दिया जाए या महेश भट्ट को? हालांकि उनसे पहले विनोद पांडे ने खुद को नायक रख कर बनाई फिल्म ‘सच’ में चुंबन को उत्तेजना व आवेग की शक्ल दे दी थी। लेकिन वह फिल्म नहीं चली तो अरसे तक उस तरह का कोई प्रयोग नहीं हुआ। 

मल्लिका शेरावत ने ‘ख्वाहिश’ में चुंबन का रिकार्ड कायम किया। फिल्म चल गई तो महेश भट्ट ने मल्लिका और उस फार्मूले को लेकर ‘मर्डर’ बना डाली। तब से यह हालत हो गई है कि महेश भट्ट की फिल्म हो और उसमें नायक इमरान हाशमी हो तो अश्लीलता और कामुकता की तमाम हदें पार कर जाने वाले दृश्यों की भरमार होना लाजिमी मान लिया गया है। हाल फिलहाल के सालों में फिल्मों में चुंबन दृश्य होना आम होता जा रहा है। बड़े कलाकार इससे भले ही परहेज करते रहे हों, नए कलाकार इस तरह के दृश्यों में ज्यादा सहज दिखने लगे हैं। 

अब तो अभिनेत्रियां भी इस मामले में ज्यादा उत्साहित व उदार होती जा रही हैं। फिल्मों का चेहरा भी काफी बदला है। न सिर्फ फिल्मी चरित्रों की पांरपरिक पहचान में नाटकीय मोड़ आया है बल्कि प्रेम के मायने भी बदल गए हैं। वह जमाना लद गया जब नायिका प्रेम में धोखा खा कर आत्महत्या कर लेती थी या चरित्र पर लगे लांछन को दूर करने के लिए रोती गाती थी। नायक के प्रणय निवेदन पर फिदा हो जाने वाली नायिकाओं का जमाना भी अब नहीं रहा है। 

प्रेम और करिअर के बीच चुनाव करने में अब उसे दिक्कत नहीं होती। नायक की मर्यादित छवि तो खैर कब की खुरच चुकी है, प्रेम भी उसके लिए निष्ठा और विश्वास का प्रतीक नहीं रह गया है। उसमें हिंसा और प्रतिशोध का असर भी दिखने लगा है। संस्कार और परंपरा का आदर्श स्थापित करने वाले नायक-नायिका को अब फिल्में दैवीय पहचान देने से छिटकने लगी है। 

कुछ साल पहले आई ‘एक हसीना थी’ में जब नायिका को पता चलता है कि नायक ने उसे धोखा दिया तो वह इसे अपना दुर्भाग्य न मान कर प्रतिशोध लेती है और बेहद क्रूर तरीके से। ‘गैंगस्टर’ में भी प्रेम का यही हिंसक रूप दिखा। अब फिल्मों में प्रेम की परिभाषा बदल गई है। अब दोनों प्रेम की स्थितियों को नापते तोलते हैं। सभी तरह के संशय दूर होने के बाद ही अंतिम फैसला करते हैं। 

पहले जैसी सामाजिक व पारिवारिक बाधाएं उनके प्रेम में रोड़ा नहीं बनतीं। आज के फिल्मी नायक-नायिका का जीवन जीने का अपना स्वच्छंद अंदाज है। रिश्तों की गहनता को समझने के लिए उन्हें समय चाहिए। प्रेम स्वीकार करने में वे हर तरह की उलझन का सामना करते हैं और खुद ही सही रास्ता तलाशते हैं। एक समय त्याग और समर्पण का प्रतीक रहा हिंदी फिल्मों का प्रेम समय के साथ-साथ अपना अंदाज बदलते हुए अगर ज्यादा हिंसात्मक और उत्तेजनात्मक हो गया तो इसकी वजह समाज की सोच और जीवन शैली में आया बदलाव है। बस फर्क यह है कि फिल्मकार अक्सर इस परिवर्तन को अधिक विकसित कर फिल्मों में कुछ ज्यादा ही भौंडे अंदाज अपना लेते हैं। सीमा तो उन्हें खुद बांधनी होगी। 

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