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घाटा कम मुनाफा ज्यादा

(image) श्पछले दस बारह साल में फिल्म का कारोबारी गणित तेजी से बदला है। कुछ समय पहले तक फिल्म निर्माण जहां जोखिम भरा काम माना जाता था वहीं पिछले कुछ सालों में व्यवस्थित तरीके से बाजार के अर्थशास्त्र को ध्यान में रख कर फिल्म बनाना मुनाफे का सौदा बन गया है। कई कारक इससे जुड़ गए हैं। फिल्म बड़े बजट की हो, उसमें नामी स्टार हों तो आसानी से लागत वसूल कर अच्छा खासा मुनाफा कमा लेने की संभावना अब ज्यादा बढ़ गई है। नए सितारों हों लेकिन विषय मे ताजगी हो तो भी सफलता की राह अब ज्यादा आसान हो गई है। पिछले एक दशक में करीब अस्सी फिल्मों ने सौ करोड़ से ज्यादा का कारोबार किया है। किसी फिल्म का दो सौ या तीन सौ करोड़ कमा लेना भी अब चौंकाता नहीं। बात क्योंकि अब पांच-सात सौ करोड़ को लांघ कर डेढ़ हजार करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। 2009 में ‘थ्री इडियट्स’ की कुल कमाई 556 करोड़ रुपए आंकी गई थी। ओवरसीज यानी विदेशों की कमाई मिला कर फिल्म ने 15 करोड़ 90 लाख डालर का कारोबार किया। 2013 के आखिर में आई ‘धूम-3’ का कारोबार करीब 15 करोड़ साठ लाख डालर का रहा। ‘पी के’ ने यह रिकार्ड तोड़ा और अब ‘दंगल’ ने नया इतिहास रच दिया है। अब तो होड़ एक एक दिन में ज्यादा कमाई को लेकर हो रही है। ऋतिक रोशन की ‘अग्निपथ’ ने 25 करोड़ से ज्यादा जुटा कर ‘बॉडीगार्ड’ (2011) का 21 करोड़ रुपए का पिछला रिकार्ड तोड़ दिया तो अगले साल ‘एक था टाइगर’ ने 33 करोड़ रुपए का रिकार्ड बना दिया। 2013 में एक एक करके ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘धूम-3’, ‘कृष03’ ने इसे ध्वस्त कर दिया। अब पचास साठ करोड़ जुटाना मामूली बात हो गया है।‘अग्निपथ’ को सौ करोड़ रुपए का कारोबार करने में ग्यारह दिन लग गए थे। उससे पहले ‘बॉडीगार्ड’ ने हालांकि सात दिन में ही यह आंकड़ा छू लिया था लेकिन उसके आंकड़ों को विश्वसनीय नहीं माना गया था। दो साल में आधा दर्जन फिल्में तीन चार दिन में ही यह कारनामा दिखा चुकी हैं। 1960 में बनी के आसिफ की ‘मुगल-ए-आजम’ ने बीस करोड़ रुपए कमा कर तहलका मचा दिया था। तीस साल पहले तक एक करोड़ में फिल्म बनाना बड़ी बात मानी जाती थी। दस साल पहले तक पांच-सात करोड़ में भव्यतम फिल्म बना जाती थी और वह अगर 15 से 20 करोड़ का कारोबार कर लेती थी तो उसे बहुत बड़ी उपलब्धि माना जाता था। तीस-चालीस करोड़ रुपए में फिल्म बनाना तो पिछड़ेपन की निशानी हो गया है। सौ करोड़ में फिल्म न बने तो क्या मजा? ‘कृश-3’ को कहते हैं दो सौ करोड़ रुपए में बनी। बाहुबली-2 की लागत पांच सौ करोड़ रुपए बताई गई। एक समय सौ करोड़ रुपए की कमाई करने वाली फिल्म चर्चा का विषय बन जानी थी। आज सौ करोड़ कमाना किसी भी फिल्म के लिए चुटकी बजाने जैसा हो गया है। एक समय था जब फिल्म को सुपरहिट का दर्जा पाने में कई हफ्ते लग जाते थे। अब तो फिल्में कुछ दिन में निर्माताओं को अरबपति बनाने लगी हैं। इस बदलते चलन का सबसे रोचक पहलू यह है कि शुरुआती दिनों में दनदनाती सफलता पा लेने वाली फिल्में लंबी रेस का घोड़ा नहीं बन पातीं। दो तीन हफ्ते में उनकी कमाई के आंकड़े पर विराम लग जाता है और दो महीने बाद छोटे परदे पर उनका वर्ल्ड प्रीमियर दिखाई देने लगता है। दरअसल फिल्मों के प्रदर्शन का तौर तरीका काफी बदल गया है। खासतौर से 1999 में मल्टीप्लेक्स प्रचलन में आने और देखते ही देखते छोटे कस्बों में उनके छा जाने के बाद। अब एक सिनेमाघर मे किसी फिल्म के 25, 50 या सौ हफ्ते लगातार चलने की परंपरा खत्म हो चुकी है। शुक्रवार को ही फिल्म रिलीज हो, यह नियम बदल गया है। चार शो और उनके निर्धारित समय का रिवाज भी नहीं रहा है। मल्टीप्लेक्स में एक दिन में आठ से दस शो हो जाना मामूली बात है। फिल्मों के तेजी से फैलते कारोबार की कुछ और वजह भी हैं लेकिन प्रमुख वजह है मल्टीप्लेक्स। पहले एक हफ्ते में फिल्म के अधिकतम 28 शो हो पाते थे। अब चालीस-पचास तो कभी उससे भी ज्यादा शो हो जाते हैं। टिकट की दर भी दिन के हिसाब से तय होती है। इसीलिए कोई फिल्म लोगों को भा जाती है तो फटाफट पैसा उगलने लगती है। फिल्मों की हालत आज उस रॉकेट की तरह हो गई है जो कई तरह की रोशनी बिखरेता तेजी से आसमान की तरफ जाता है और फिर फुस्स हो जाता है। फास्ट फूड, फास्ट लाइफ की तरह फिल्मों का सफर भी फास्ट होता जा रहा है। फिल्मों को अरबपति बनाने के लिए कई तरह के नुस्खे इस्तेमाल किए जाने लगे हैं। इसमें मार्केटिंग का भी अच्छा खासा योगदान है। 2004 में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कारपोरेट क्षेत्र ने कदम रखा। इससे फिल्म का बजट तो बढ़ा ही, प्रयोगात्मक फिल्म बनाने के लिए आर्थिक आधार भी मिला। साहसिक प्रयोग का रास्ता खुला। इसी वजह से 2013 में नौ करोड़ रुपए की लागत से ‘नो वन किल्ड जेसिका’ जैसी फिल्म का बनना संभव हो पाया। फिल्म ने करीब चालीस करोड़ रुपए का कारोबार कर इस फार्मूले पर सफलता की मोहर भी लगा दी। मार्केटिंग के बदले तौर तरीके ने भी फिल्मों का रंग रूप बदला। फिल्म के सैटेलाइट, संगीत व ओवरसीज के अधिकार बेचने में अब ज्यादा सावधानी बरती जाने लगी हैं। इस आधार पर अगर कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि आज फिल्म बनाने में जोखिम कम हो गया है। शर्त यही है कि रिलीज से पहले फिल्म किसी न किसी कारण से चर्चित हो जाए। अब फिल्में हिट या फ्लाप की पारंपरिक परिभाषा से मुक्त हो गई हैं। हिट हो जाएं तो निर्माता का घर भर देती हैं। फ्लाप हो जाए तो खींचतान कर लागत तो निकाल ही लेती हैं। फिल्म की सफलता की गारंटी माने जाने वाले शाहरुख खान अपने ही घर की फिल्म ‘रा-वन’ में जादू नहीं चला पाए। फिल्म उनकी अपेक्षाओं के हिसाब से नहीं चली, यह उन्होंने खुद कई बार सार्वजनिक मंचों पर अपनी और फिल्म की खिल्ली उड़ा कर स्वीकार भी किया। ‘रोबोट’ से ज्यादा लागत से शाहरुख खान ने ‘रा-वन’ बनाई थी लेकिन ‘रोबोट’ के मुकाबले वह आधा मुनाफा भी नहीं कमा पाई। लेकिन व्यापार की नजर से देखें तो ‘रा-वन’ ने छप्पर फाड़ कमाई भले ही नहीं की तो ऐसी दुर्गति तक भी नहीं पहुंची कि शाहरुख के छप्पर उड़ जाए। वितरकों को फिल्म के अधिकार उन्होंने 77 करोड़ रुपए में बेचे सेटेलाइट अधिकार से 35 करोड़ रुपए मिले। संगीत 15 करोड़ रुपए में बिका। फिल्म से जुड़े गेम पांच करोड़ दे गए और 50 करोड़ का ब्रांड का सौदा हो गया। पैसे लगे 150 करोड़ और बैठे ठाले मिल गए 182 करोड़ रुपए।
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